सुपौल [जेएनएन]। कोसी में तो बाढ़ हर साल नियति बन गई है। बाढ़ से हर साल व्यापक बर्बादी होती है। देखते देखते लोगों के खेत-खलिहान, आशियाने उजड़ जाते हैं। हजारों ङ्क्षजदगियां तबाह हो जाती हैं। बाढ़ से उत्पन्न स्थिति के सर्वेक्षण व समीक्षा को ले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सीमांचल के इलाके में शनिवार को आगमन प्रस्तावित है।

प्रधानमंत्री के आगमन की सूचना से लोगों में तरह-तरह की आस जग रही है। लोगों को लग रहा है कि शायद कोसी का स्थाई समाधान निकल पाए और कोसीवासियों को हर साल आने वाले बाढ़ से निजात मिल जाए। जब-जब नेपाल में अधिक बारिश होती है कोसी के इलाके में तबाही मच जाती है। नदी का जलस्राव बढ़ता है और गांव के गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं।

2008 में कोसी ने जब कुसहा में तटबंध तोड़ा तो बड़ी तबाही मची थी। हालात देखते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार को इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करना पड़ा था। जहां तक कोसी नदी की बात है तो तटबंध के बीच कैद होने के बाद से भी यह नदी उधम मचाती चली आ रही है। तटबंध के अंदर के गांवों में तो कोसी का कहर हर साल बरपता है। इस वर्ष भी नेपाल में अधिक बारिश हुई, बिहार में भी मानसून की सामान्य से ज्यादा बारिश हुई।

नतीजा रहा कि सूबे के 17 जिले बाढ़ की चपेट में आ गए। जिसमें अररिया, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, खगडिय़ा, सहरसा जिले विशेष रूप से बाढ़ से प्रभावित हुए। बाढ़ से हुई बर्बादी के आकलन को लेकर प्रधानमंत्री हवाई सर्वेक्षण करेंगे। 

इधर नेपाल के प्रधानमंत्री से भी कई मुद्दों पर आपसी सहमति बनी है। बाढ़ से बचाव को ले 2003 में नेपाल सरकार से वार्ता हुई थी और हाईडैम निर्माण का प्रस्ताव रखा गया था। इसको लेकर सर्वे का कार्य भी शुरू किया गया। किन्तु अब तक हाईडैम निर्माण की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई है।

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अब जब बाढ़ से त्रस्त लोगों के बीच प्रधानमंत्री आ रहे हैं तो लोगों की आस भी जगी है। अगर प्रधानमंत्री की नजरें इनायत हुई, कोसी के स्थाई समाधान की दिशा में पहल हुई तो यह इलाका भी विकास के नक्शे पर चमकता हुआ दिखाई देगा।

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Posted By: Ravi Ranjan

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