बेगूसराय : घाटों के साथ साथ छतों पर भी अ‌र्घ्य देने पूरी तैयारी है। इसके लिए छतों पर तालाबनुमा कुंड बनाए जा रहे हैं। घाटों पर उमड़ने वाली भीड़ से बचने को कई लोग अब घर पर ही अ‌र्घ्य देते हैं। आठ तालाबों पर है संपूर्ण शहर की पांच लाख की आबादी

अपने शहर की आबादी इस समय पांच लाख की है। छठ पर्व एक ऐसा पूजनोत्सव है जिसमें हिन्दू परिवार के सभी सदस्य छठ घाटों पर जाकर अस्ताचलगामी एवं उदयागामी सूर्य को अ‌र्घ्य दान करने पहुंचते हैं। जिससे हर तालाब पर काफी गहमागहमी का माहौल बना रहता है। डाला-सूप सजाने, परिवार के लोगों को उतनी देर तक खड़ा रहने एवं पानी में व्रतियों को खड़ा रहने में काफी दिक्कत होती है। लोगों के ज्यादा देर तक तालाब पर जमे रहने के कारण जगह नहीं पा सकने वाले परिवारों को तबतक इंतजार करना पड़ता है जबतक सूर्योदय नहीं हो जाता है। शहर सहित सभी ग्रामीण तालाबों पर डाला उठने का इंतजार आधे से अधिक लोगों को करना पड़ता है। सूर्योदय हो जाने पर व्रती को पानी में खड़े होकर भगवान भास्कर को आनन फानन में अ‌र्घ्यदान करने से संतुष्टि नहीं मिलती है। अव्यवस्था और भीड़ भाड़ से बचने की कोशिश

छठ घाटों पर जाने, वहां डाला-सूप के लिए जगह बनाने एवं परिजनों के खड़े रहने की जुगाड़ करना टेढ़ी खीर बनता जा रहा है। पहले दिन के अ‌र्घ्यदान के लिए छठव्रती के परिजनों को दोपहर में और दूसरे दिन के अ‌र्घ्यदान के लिए मध्य रात्रि में ही तालाब या नदियों के घाटों पर जाने की विवशता है। लेट होने पर जगह ही नहीं मिलती है। इसके अलावा कम जगह में लोगों की आवाजाही एवं छठ घाटों पर की जाने वाली आतिशबाजी के कारण होनेवाली परेशानी से परेशान आमजनों ने घर के आंगनों व छतों पर कृत्रिम तालाब बनाकर अ‌र्घ्यदान करने को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी है। आंगन व छत पर तालाब बनने से आमजनों को जहां शारीरिक व मानसिक परेशानी से निजात मिली है वहीं सुरक्षा की ¨चता भी समाप्त हो गई।

Posted By: Jagran