दस्तावेज कह रहा जमीन है, प्रशासन कह रहा नहीं; बेगूसराय में पंचायत भवन पर घमासान
बेगूसराय के चेरिया बरियारपुर प्रखंड की पबरा पंचायत में पंचायत सरकार भवन निर्माण को लेकर विवाद गहरा गया है। प्रशासन ...और पढ़ें

सरकारी जमीन पर दबंगों का कब्जा। (जागरण)
HighLights
प्रशासन के दावे के विपरीत, सरकारी भूमि पर दबंगों का कब्जा।
पबरा पंचायत में 15 कट्ठा सरकारी जमीन अवैध रूप से कब्जाई।
बाढ़-संवेदनशील बूढ़ी गंडक किनारे भवन निर्माण पर सवाल।
केशव किशोर, मंझौल (बेगूसराय)। बिहार सरकार भले ही भू-माफियाओं के खिलाफ सख्ती के दावे कर रही हो, लेकिन चेरिया बरियारपुर प्रखंड की पबरा पंचायत का मामला इन दावों की हकीकत उजागर करता नजर आ रहा है।
यहां पंचायत सरकार भवन निर्माण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। प्रशासन जहां उपयुक्त सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं होने की बात कह रहा है, वहीं पुराने सरकारी अभिलेख इस दावे को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। उक्त सरकारी भूमि पर वर्षों से दबंगों का अवैध कब्जा है।
इसे खाली कराकर पंचायत भवन बनवाने के बजाय प्रशासन बाढ़ और नदी कटाव की दृष्टि से संवेदनशील जगहों का चयन कर रहा है, जो सवालों के घेरे में हैं।
ग्रामीणों के हाथ लगे दस्तावेजों के अनुसार, मौजा पबरा, थाना संख्या 193, खाता संख्या 288, खेसरा संख्या 647 के अंतर्गत लगभग 15 कट्ठा सात धूर गैर मजरुआ आम भूमि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है।
आरोप है कि यह जमीन वर्षों से पंचायत के कुछ प्रभावशाली लोगों के अवैध कब्जे में है। 23 जनवरी 2015 को तत्कालीन सीओ ने ज्ञापांक 122 के तहत अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी कर 31 जनवरी तक भूमि खाली करने का आदेश दिया था। यहां तक कि तीन कट्ठा भूमि जलमीनार निर्माण के लिए चिह्नित भी की गई थी। बावजूद इसके कब्जा नहीं हटाया गया।
23 फरवरी 2015 को पत्रांक 280 के माध्यम से एसडीओ मंझौल को अतिक्रमण हटाने की सूचना दी गई, लेकिन मामला फाइलों में दबकर रह गया। बाद में जलमीनार किसी दूसरे स्थान पर बना दिया गया और अतिक्रमणकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
अब करीब 10 वर्ष बाद पंचायत सरकार भवन निर्माण की योजना सामने आई है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इस बार मौजा पबरा, खाता संख्या 287, खेसरा संख्या 850 में बूढ़ी गंडक नदी से महज 30-40 मीटर दूरी पर जमीन चिह्नित की जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यह इलाका बाढ़ और नदी कटाव की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है, जहां भवन निर्माण सरकारी धन की बर्बादी साबित हो सकता है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन दबंगों से सरकारी जमीन खाली कराने के बजाय जोखिम भरे इलाके को चुन रहा है।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा है कि यह मामला अब सिर्फ भवन निर्माण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और कानून के राज की परीक्षा बन चुका है। सवाल उठ रहा है, क्या प्रशासन पुराने कब्जों पर कार्रवाई करेगा या एक बार फिर नियम रसूखदारों के सामने झुक जाएंगे।
