संसू, चेरिया बरियारपुर (बेगूसराय)। नवरात्रि में विशेष पूजा पद्धति के लिए चर्चित क्षेत्र का बिक्रमपुर गांव माता की भक्तिरस में सराबोर है। यहां पर नवरात्रि में प्रतिदिन मां की आकृति बनाने के लिए फूल-बेलपत्र इकट्ठा करने में गांव वालों का उत्साह देखते ही बनता है। मां की आकृति के साथ वैदिक रीति से होने वाली पूजा देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते हैं और देर रात्रि में घर लौटते हैं। नवमी पूजा तक पूरे गांव की आस्था मंदिर परिसर को देखते ही सहज लगाया जा सकता है। गांव वालों की माने तो माता जयमंगला की असीम अनुकंपा के कारण गांव में सुख-शांति और समृद्धि है।

कब और कैसे पूजा हुई प्रारंभ 
लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व जयमंगलागढ़ में पहले बलि प्रदान को लेकर पहसारा और बिक्रमपुर गांव में ठन गई थी। दोनों गांव के लोग एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए थे। तभी नवरात्र के समय बिक्रमपुर गांव के स्व. सरयुग सिंह के स्वप्न में मां जयमंगला आई थीं और उन्होंने कहीं नवरात्रि के पहले पूजा से लेकर नवमी पूजा के बलि प्रदान तक बिक्रमपुर गांव में रहूंगी। इसके पश्चात मैं गढ़ लौट जाऊंगी। देवी ने स्वप्न में ही पूजा की विधि बताई। बताया जाता है कि देवी ने कहा, वत्स अपने हाथों से फूल बेलपत्र को तोड़कर आकृति बनाकर पूजा करने तथा धूप एवं गुंगुल से पूजा की विस्तार से विधि बताई। तभी से यहां पर विशेष पद्धति से पूजा प्रारंभ हुई। आज भी उनके वंशज पूजा करते आ रहे हैं। फलतः इस गांव की आस्था माता जयमंगला पर बनी हुई है और आज भी इस गांव के लोग कोई शुभ कार्य प्रारंभ करने से पहले जयमंगलागढ़ जाकर मंदिर में माथा टेकते हैं।

कैसे और कौन पूजा कर रहे हैं 

 कलश स्थापन के दिन स्व. सिंह के सभी वंशज मिलकर मंदिर में कलश की स्थापना करते हैं और प्रतिदिन अपने हाथों से तोड़े गए फूल-बेलपत्र आकृति बनाकर पूजा करते हैं। कालांतर में परिवार के विस्तार होने के कारण पहली पूजा तीन खुट्टी खानदान के चंदेश्वर सिंह आदि करते हैं। दूसरी पूजा पंचखुट्टी के सुशील सिंह वगैरह के द्वारा की जाती है। शेष सभी पूजा नौ खुट्टी के वंशज राजेश्वर सिंह, परमानंद सिंह, कृत्यानंद सिंह, मोहन सिंह, नीरज सिंह, शंभु सिंह, नंदकिशोर सिंह, लाला जी, रामकुमार सिंह, पुष्कर सिंह, विश्वनाथ सिंह वगैरह करते आ रहे हैं। अंत में नवमी पूजा के दिन स्व. सिंह के सभी वंशज की उपस्थिति में बलि प्रदान किए जाने के साथ पूजा पूर्ण हो जाती है।

कौन रूप देते हैं मां के स्वरूप का 

स्व: सिंह के वंश के सदस्य के द्वारा ही मां का स्वरूप दिया जाता रहा है। आज भी उनके वंशज रामबिलास सिंह के द्वारा मां का स्वरूप तैयार किया जाता है। इसके पूर्व मां का स्वरूप इनके पिता दिया करते थे।

मंदिर में धुएं का महत्व 

ग्रामीणों की मानें तो संध्या के समय मां की आकृति पूर्ण होने के साथ ही मंदिर में पूरी रात धूप-गुंगुल एवं अगरबत्ती जलाई जाती है। उससे निकलने वाले धुएं जहां तक फैलती है, वहां तक सुख-सम्वृद्धि बरसती है। इसलिए मंदिर में धुएं की व्यवस्था की जाती है।

Edited By: Rahul Kumar

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