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पुश्तैनी जमीन पर गंगा का कहर, 8 किमी तक कटाव से सहमा चमथा; बेगूसराय में फिर बेघर होने का डर

Published: Fri, 16 Oct 2026 01:21 PM (IST)

बेगूसराय के चमथा दियारे में बाढ़ का पानी उतरने के बाद गंगा का कटाव तेज हो गया है, जिससे किसानों ...और पढ़ें

खेतों से घरों तक पहुंचा गंगा के कटाव का खतरा

खेतों से घरों तक पहुंचा गंगा के कटाव का खतरा

HighLights

  1. चमथा दियारे में गंगा का कटाव 8 किमी तक फैला।

  2. उपजाऊ जमीन और रिहायशी इलाके नदी में समाने का खतरा।

  3. ग्रामीणों को तीन दशक बाद फिर विस्थापन का डर सताया।

संवाद सूत्र, चमथा (बेगूसराय)। बिहार के बेगूसराय स्थित चमथा दियारे में बाढ़ का पानी उतरने के बाद गंगा का कटाव तेज हो गया है। कहीं किसानों की उपजाऊ जमीन नदी में समा रही है, तो कहीं रिहायशी इलाकों तक खतरा पहुंचने लगा है। करीब तीन दशक पहले विस्थापन का दर्द झेल चुके ग्रामीणों को अब फिर घर और जमीन छिनने का डर सता रहा है।

खेतों से घरों तक पहुंचा गंगा के कटाव का खतरा

बछवाड़ा प्रखंड के चमथा दियारे में गंगा का कटाव स्थानीय लोगों के लिए गंभीर चिंता बन गया है। चमथा पंचायत-3 के पंचखुटी, चिरैयाटोक, वसुलियाटोल, नंबर गांव और विशनपुर के आसपास जमीन तेजी से नदी में समा रही है।

ग्रामीणों के मुताबिक, हरपाटे और चिरैयाटोक से वसुलियाटोल तक करीब आठ किलोमीटर के दायरे में कटाव जारी है। लोगों का दावा है कि रोजाना कई एकड़ जमीन नदी में विलीन हो रही है। कटाव रिहायशी इलाकों के करीब पहुंचने से ग्रामीणों को अब अपने घरों की सुरक्षा की भी चिंता सताने लगी है।

पहले बाढ़ ने उजाड़ा, अब खेतों पर गंगा का कब्जा

चमथा पंचायत-1, 2 और 3 के साथ विशनपुर और दादुपुर में हाल के दिनों में आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। खबर के मुताबिक, करीब 60 हजार की आबादी इससे प्रभावित हुई थी।

लोग अभी बाढ़ के नुकसान से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे कि गंगा के कटाव ने नई मुसीबत खड़ी कर दी। किसानों के लिए यह दोहरी मार है, पहले बाढ़ से फसलों को नुकसान और अब खेती की जमीन के ही नदी में समा जाने का खतरा।

उपजाऊ जमीन छिनी तो परिवारों की आजीविका पर संकट

चमथा दियारे में बड़ी संख्या में परिवार खेती और उससे जुड़े कामों पर निर्भर हैं। यहां की उपजाऊ मिट्टी किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है। इसी जमीन पर फसल उगाकर परिवार अपनी जरूरतें पूरी करते हैं और अगली खेती की तैयारी करते हैं।

ऐसे में खेतों का कटाव सिर्फ जमीन का नुकसान नहीं है। इसके साथ परिवारों की वर्षों की मेहनत, कमाई और अगली पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य की उम्मीदें भी प्रभावित होती हैं।

ग्रामीणों को आशंका है कि यदि कटाव की रफ्तार नहीं थमी, तो उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन के साथ घर भी छोड़ना पड़ सकता है।

कटावरोधी काम भी नहीं दे सके पूरी सुरक्षा

ग्रामीणों के अनुसार, कुछ महीने पहले कटाव रोकने के लिए कई स्थानों पर बचाव कार्य कराए गए थे। लेकिन कुछ जगहों पर ये काम क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे जमीन और घर सुरक्षित रहने की उम्मीद कमजोर पड़ गई।

स्थानीय लोगों की चिंता है कि यदि समय रहते प्रभावी और टिकाऊ बचाव उपाय नहीं किए गए, तो गंगा की धारा रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ सकती है। ऐसे में कटाव प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा कार्यों की स्थिति और उनकी प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

तीन दशक पुराना विस्थापन का दर्द फिर हुआ ताजा

चमथा दियारे के लोगों के लिए गंगा का कटाव कोई नई समस्या नहीं है। करीब तीन दशक पहले भी कटाव के कारण सैकड़ों परिवारों को अपना घर और जमीन छोड़नी पड़ी थी। रिपोर्ट के अनुसार, नंबर और पंचखुटी जैसे इलाकों के कई परिवार विस्थापन का दर्द झेल चुके हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि जमीन और घर गंवाने के बाद भी कई परिवार आज तक पुनर्वास की आस लगाए हुए हैं। मौजूदा हालात ने उनके पुराने जख्म फिर ताजा कर दिए हैं। अब उन्हें डर है कि कहीं एक बार फिर उन्हें अपनी जड़ों से दूर न होना पड़े।

ग्रामीणों की नजर अब बचाव कार्यों पर

लगातार बढ़ते कटाव ने चमथा दियारे के लोगों के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है। किसानों के लिए खेत बचाना और परिवारों के लिए घर सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चिंता बन गया है।

ग्रामीणों की मांग है कि कटाव प्रभावित इलाकों में प्रभावी बचाव कार्य कराए जाएं, ताकि जमीन का नुकसान रोका जा सके और आबादी को सुरक्षित रखा जा सके। अब देखना होगा कि संबंधित विभाग कटाव की गंभीरता को देखते हुए किस तरह के कदम उठाते हैं।