न बिजली की झालर, न आधुनिक लाइटें; बेगूसराय में 350 साल से 12 दीपों की रोशनी में विराजती हैं मां दुर्गा
बेगूसराय के भवानंदपुर गांव में मां दुर्गा की 350 साल पुरानी पूजा परंपरा बंगाली रीति-रिवाजों से निभाई जाती है। यहां ...और पढ़ें

वीरपुर के भवानंदपुर गांव का दुर्गा मंदिर। जागरण
HighLights
भवानंदपुर में 350 साल पुरानी दुर्गा पूजा परंपरा।
आधुनिक रोशनी की जगह अखंड दीपों से जगमगाता मंदिर।
बंगाली पद्धति से होती है मां दुर्गा की विशेष आराधना।
धर्मेंद्र कुमार, वीरपुर (बेगूसराय)। भवानंदपुर गांव में मां दुर्गा की आराधना की परंपरा करीब साढ़े तीन सौ वर्षों से चली आ रही है।
यहां शारदीय नवरात्र के दौरान मां का दरबार पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सजता है। खास बात यह है कि मंदिर में मां की प्रतिमा और उनके दरबार दीये की रोशनी में जगमगाते हैं।
यहां पूजा की शुरुआत जिउतिया पर्व के बाद कलश स्थापना और छागर बलि से होती है। यहां बंगाली पद्धति से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है।
बंगाली कायस्थ परिवार से जुड़ा है पूजा का इतिहास
ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1680 में राजस्व वसूली के सिलसिले में तीन सहोदर भाई दान सिंह, महान सिंह और सुजान सिंह ब्रिटिश प्रतिनिधि के रूप में बंगाल के शांतिपुर, नदिया क्षेत्र के बेला ग्राम से भवानंदपुर आए थे।
तीनों भाई बंगाली कायस्थ परिवार से संबंधित थे। उस समय देवी की पूजा-अर्चना के लिए उन्हें प्रत्येक वर्ष बंगाल लौटना पड़ता था।
परिवहन के साधन सीमित होने के कारण करीब साढ़े चार सौ किलोमीटर की दूरी तय करने और फिर भवानंदपुर लौटने में लगभग एक महीने का समय लग जाता था। इस परेशानी को देखते हुए तीनों भाइयों ने भवानंदपुर में ही मां दुर्गा की पूजा-अर्चना शुरू करने का निर्णय लिया।
हर साल एक ही आकार की बनती है प्रतिमा
भवानंदपुर दुर्गा मंदिर की एक खास पहचान मां की प्रतिमा की पारंपरिक बनावट भी है। यहां प्रत्येक वर्ष एक ही आकार की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है।
प्रतिमा निर्माण की परंपरा मंसूरचक के कारीगर असिक लाल पंडित के पूर्वजों के समय से चली आ रही है। प्रतिमा बनाने के लिए मिट्टी स्थानीय कुम्हार उपलब्ध कराते हैं।
पूजा से लेकर प्रतिमा निर्माण और विसर्जन तक पुरानी परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। विसर्जन के समय मां की प्रतिमा के साथ मेढ़ का भी विसर्जन किया जाता है।
अखंड दीपों से जगमगाता है मां का दरबार
भवानंदपुर दुर्गा मंदिर में दीपों की रोशनी का विशेष महत्व है। पूजा समिति के सचिव ओमप्रकाश सिन्हा, स्थानीय ग्रामीण विकास सिन्हा और मनोरंजन सिन्हा बताते हैं कि यहां पूजा की व्यवस्था परंपरागत तरीके से की जाती है।
पूजा संपन्न कराने की जिम्मेदारी 12 मेढ़पतियों की होती है। प्रत्येक वर्ष बारी-बारी से मेढ़पति बदलते हैं और संबंधित मेढ़पति श्रद्धापूर्वक पूजा का खर्च वहन करते हैं।
सप्तमी से लेकर विसर्जन तक मंदिर में कुल 12 अखंड दीप जलाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त नवमी की रात 15 और चिराग प्रज्वलित किए जाते हैं। दीपों की लौ के बीच मां का दरबार विशेष आध्यात्मिक आभा से भर उठता है।
आधुनिक लाइटों की जगह दीपों की रोशनी को प्राथमिकता
पूजा व्यवस्थापक जनार्दन प्रसाद सिन्हा बताते हैं कि मंदिर के अंदर आधुनिक लाइटों की व्यवस्था नहीं की जाती है। यहां केवल दीपों और चिरागों की रोशनी से ही मां का दरबार प्रकाशित होता है।
इस परंपरा के पीछे धार्मिक आस्था के साथ पुरखों से मिली विरासत को सुरक्षित रखने की भावना भी जुड़ी हुई है। मंदिर के पुजारी गौरी शंकर मिश्रा के अनुसार, यहां बंगाली पद्धति से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है।
