बांका। प्राचीन काल से नदी के बाद कुआं मानव सभ्यता का आवश्यक अंग रहा है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में शहर की कौन पूछे गांवों में भी कुआं की संख्या तेजी से कम हो रही है। नया कुआं खुद नहीं रहा बल्कि, पुराना कुंआ भी घर बनाने की महंगी हो रही जमीन के बीच दफन हो रहा है। कुआं खोदने के नाम पर संचालित हो रही योजनाएं भी लूट की शिकार हो गई। दो साल पूर्व सांसद जयप्रकाश नारायण यादव ने जिले में 5000 कुआं खुदवाने की घोषणा की थी। इसके लिए उन्होंने केंद्र और राज्य की सरकारों को पत्र भी लिखा। इस पत्र के आलोक में विभागीय स्तर से लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण संगठन बांका को कुंआ निर्माण के लिए प्राक्कलन तैयार करने का आदेश मिला। विभागीय स्तर से पांच हजार कुआं के लिए प्राक्कलन तैयार कर निर्माण की स्वीकृत के लिए भारत सरकार को भेजा गया। इसके बाद यह कुआं तब से फाइलों में दफन हो गया। दो साल बाद भी इसके लिए ना कोई राशि मिली ना ही विभाग को कुंआ खुदाने का कोई पत्र ही मिला। योजना अटकी रह गई। लोग गांवों में कुआं खुदने का इंतजार करते रहे।

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शादी विवाह में लगहर के लिए नहीं मिल रहा कुआं :

कुआं ¨हदू संस्कृति में शादी की रस्म और परंपरा से जुड़ा है। हर युवक और युवती की शादी में कुंआ से एक हाथ के सहारे पानी ¨खचने की रस्म होती है। लेकिन, कुआं के अभाव में इस रस्म पर संकट आ गया है। शहर में खोजे भी शादी में कुआं नहीं मिलता। ऐसे में बांका शहर में ही कई लोग चापानल से इस रस्म को पूरा कर रहे हैं।

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पहले भी कागजों पर खूब खुदा कुआं :

2005 के आसपास भी एक बार जिला में कुंआ खुदने का अभियान शुरू हो रहा था। तत्कालीन सांसद के प्रयास से बड़ी संख्या कुंआ स्वीकृत हुआ था। लेकिन, यह योजना भी लूट की शिकार हो गई है। अधिकांश जगहों पर पुराने कुआं के नाम पर राशि निकाल ली गई। वहीं बड़ी संख्या कुंआ कागज से जमीन पर नहीं उतर सका। सूचना अधिकार के तहत कई लोगों ने इसकी जानकारी प्राप्त की। लेकिन सब मामला रफा दफा हो गया। कुंआ के नाम पर लाखों लाख रुपये बांका में लूट लिया गया।

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कोट

सांसद की पहल के बाद विभाग ने पांच हजार कुआं का प्राक्कलन तैयार किया था। इसे उसी वक्त विभाग को भेज दिया गया है। लेकिन, दो साल बाद भी इस दिशा में कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ है।

मनोज चौधरी, कार्यपालक अभियंता, पीएचईडी

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लोगों की राय

फोटो - 06 बीएएन 08

गांव से लेकर शहर तक कुआं देखने को नहीं मिलता है। पहले गर्मी के मौसम में गांव के लोग इकट्ठे होकर दिन भर कुंआ की सफाई करते थे। अब यह सब देखने को नहीं मिलता है।

विक्रम कुमार ¨सह, बांका

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फोटो - 06 बीएएन 09

अब शादी विवाह में भी कुआं में पानी भरने का प्रचल दिनों दिन खत्म होते जा रहा है। कुंआ हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। लोग जमीन की अधिक बर्बादी के कारण इसे समाप्त कर रहे हैं।

सचिन कुमार, बांका

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फोटो - 06 बीएएन 10

गांवों में चापाकल ने कुआं की परंपरा ही तोड़कर रख दी है। कुआं घरेलू उपयोग के साथ ¨सचाई के लिए मजबूत साधन होता था। अब कुंआ खुदाई का काम दिखता ही नहीं है।

मनोज यादव, लखनौडीह

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फोटो - 06 बीएएन 11

गांव में वर्षा जल संचय का भी साधन होता था। इससे लोग तरह तरह का काम लेते थे। लेकिन, अब कहीं कुंआ दिखता ही नहीं है। सरकारी स्तर से भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं होता है।

राजीव रंजन झा, असौता

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फोटो - 06 बीएएन 12

समय के साथ सब बदल रहा है। कुआं की सुविधा दूसरा विकल्प नहीं दे सकता है। अब पानी के कई विकल्प आ गए हैं। इसके सब के बावजूद भी हर गांव में गांव का अस्तित्व ¨जदा रखना जरूरी है। जल संरक्षण की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है।

बबलू ¨सह, डोमाखांड

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फोटो - 06 बीएएन 13

बांका में पानी की समस्या गंभीर है। गांव की कौन पूछे शहर में भी आमलोगों तक पानी पहुंचाने का सिस्टम ध्वस्त हो गया है। पहले कुंआ कई तरीके से पानी की समस्या को दूर करता था। इसे विलुप्त होने से बचाने की जरूरत है।

¨पटू कुमार, देशड़ा

Posted By: Jagran

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