प्रकृति नहीं खुद को बचाने की चिंता करें! नेपाल से साइकिल यात्रा लेकर बांका पहुंचे पद्मभूषण डा. अनिल जोशी
Environmentalist Anil Joshi Cycle Yatra: प्रख्यात पर्यावरणविद डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने 'प्रकृति साइकिल यात्रा' के दौरान बांका में कहा ...और पढ़ें

Environmentalist Anil Joshi Cycle Yatra: बांका में डा. अनिल प्रकाश जोशी का पौधा भेंट कर स्वागत करते पर्यावरण प्रेमी
HighLights
डॉ. जोशी ने प्रकृति-सम्मत समृद्धि पर दिया जोर।
'प्रकृति साइकिल यात्रा' नेपाल से अयोध्या तक।
आपदाओं पर नीतिगत रिपोर्ट होगी तैयार।
जागरण संवाददाता, बांका। Environmentalist Anil Joshi Cycle Yatra: "हम मंचों से अक्सर प्रकृति को बचाने की बात करते हैं, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। प्रकृति कभी नष्ट नहीं हो सकती। यदि महाप्रलय भी आ जाए, तब भी सृष्टि का पुनर्सृजन होगा। असल चिंता हमें खुद के अस्तित्व को बचाने की करनी चाहिए। हमें खुद के लिए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहना होगा, उसकी भाषा को समझना और मानना होगा।
आज आवश्यकता विकास के नाम पर विनाश की नहीं, बल्कि प्रकृति-सम्मत समृद्धि की है। हमें जहान नहीं, अपनी जान बचाने की फिक्र करनी होगी।" ये बेबाक विचार देश के जाने-माने पर्यावरणविद डा. अनिल प्रकाश जोशी ने व्यक्त किए।
नेपाल से 16 सदस्यीय दल के साथ 'प्रकृति साइकिल यात्रा' पर निकले 70 वर्षीय डा. जोशी शुक्रवार की शाम बांका पहुंचे, जहां उन्होंने 'दैनिक जागरण' से विशेष बातचीत में पर्यावरण, मानव जीवनशैली और विकास के अंतर्संबंधों पर खुलकर चर्चा की।
बांका में पर्यावरण प्रेमियों ने पौधे भेंट कर किया अभिनंदन
देश के शीर्ष पर्यावरणविदों में शुमार डा. जोशी के बांका पहुंचने पर स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। 'हरित रजौन' के डा. रवि रंजन, अरविंद दास सहित गायत्री परिवार और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने उन्हें फूल-मालाएं पहनाने के साथ पौधे भेंट कर सम्मानित किया।
'प्रकृति साइकिल यात्रा' एक नजर में:
यात्रा नेतृत्व: 70 वर्षीय प्रख्यात पर्यावरणविद डा. अनिल प्रकाश जोशी (पद्मभूषण)।
दल का स्वरूप: 16 सदस्यीय पर्यावरणविदों व युवाओं का दल।
कुल दूरी व अवधि: 3,000 किलोमीटर से अधिक, 50 से अधिक दिन।
प्रमुख पड़ाव (कुल 47): जनकपुर (नेपाल), देवघर, बांका, जमुई, पटना, बेगूसराय, लखनऊ और अयोध्या।
मूल ध्येय: "प्रकृति और प्रभु में कोई अंतर नहीं है" का संदेश जन-जन तक पहुंचाना।
अंतिम लक्ष्य: नेपाल के भूस्खलन, बिहार की त्रासदी और यूपी की बाढ़ पर नीति-निर्माताओं के लिए विस्तृत नीतिगत रिपोर्ट तैयार करना।
इस यात्रा में डा. जोशी के साथ प्रमोद जोशी, अमर सिंह, केश राज, गीतांशु जोशी, विजयेश्वर डंगवाल, विनोद खाती, रंजना, मेघा, ज्योति कुमारी, ललित सिंह, रिशु कुमारी, आयुष कुमार, आदित्य कुमार, चंदन बोहरा, तनुजा, फरमान, अनिल डंगवाल और देवेश कोठारी शामिल हैं।
3000 किमी का सफर, 47 पड़ावों पर होगा नीतिगत संवाद
डा. जोशी ने बताया कि यह साइकिल यात्रा करीब 3,000 किलोमीटर से अधिक लंबी है, जिसे 50 से अधिक दिनों में 47 प्रमुख पड़ावों के जरिए पूरा किया जाएगा। जनकपुर (नेपाल) से आरंभ हुई यह यात्रा देवघर, बांका, जमुई, पटना, बेगूसराय होते हुए उत्तर प्रदेश के लखनऊ और प्रभु श्रीराम की पावन नगरी अयोध्या तक जाएगी।
उन्होंने कहा कि इस अभियान का मूल ध्येय यह अलख जगाना है कि "प्रकृति और प्रभु में कोई अंतर नहीं है।" यात्रा केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि मार्ग में पड़ने वाले क्षेत्रों के राजनेताओं, सामाजिक चिंतकों, अर्थशास्त्रियों, नीतिकारों और शिक्षाविदों के साथ गंभीर संवाद स्थापित किया जा रहा है।
आपदाओं पर बनेगी रिपोर्ट, सरकारों को सौंपी जाएगी
यात्रा के दौरान नेपाल में हो रहे भूस्खलन व प्राकृतिक बदलावों, बिहार में सूखे व नदियों के कटाव की त्रासदी और उत्तर प्रदेश में हर साल आने वाली बाढ़ की विभीषिका का जमीनी अध्ययन किया जा रहा है।
डा. जोशी ने बताया कि यात्रा पूरी होने के बाद एक व्यापक श्वेत पत्र तैयार किया जाएगा। इसे केंद्र और राज्य सरकारों के नीति-निर्माताओं को सौंपा जाएगा, ताकि वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों के अनुसार नीतियां बनाई जा सकें और लोग अपनी जीवनशैली को प्रकृति के अनुकूल सरल बना सकें।
