औरंगाबाद । तालाब व नदियां युगों युगों से मानव का हितैषी रहा है। सभ्यता की कहानी नदियों के किनारे गढ़ी गई। धार्मिक व सामाजिक विस्तार का ऐतिहासिक साक्ष्य में नदियों का वर्णन मिलता आया है। आज जब नदियां अपनी अस्तित्व से जूझ रही है तो स्वाभाविक हो जाता है इसके अतीत व वर्तमान का विश्लेषण करना। जिस देश का साहित्य गंगा यमुना और सरस्वती समेत तमाम नदियों के पास से होकर गुजरा हो वहां नदियों का विलुप्तीकरण माथा पर बल देनेवाला साबित होगा। जल संकट का दौर शुरू हो चुका है। धरती पर विचरण करनेवाले जीव भटक रहे हैं। भौतिकवादी युग के इस दौर में यह सोचने का समय किसी के पास नहीं है कि आखिर नदियां और तालाब अपने वास्तविक स्वरूप को त्याग क्यों रहा है। सूर्य की किरणें पहले की अपेक्षा तीखी क्यों हो गई। छह ऋतुओं का देश आज वर्षा और वसंत के लिए व्याकुल क्यों है? क्या चूक हो रहा कि इंद्रदेव खफा हैं। कही सुखाड़ तो कहीं अतिवृष्टि का चक्र कैसे चल पड़ा है। ये कुछ अनसुलझे सवाल हैं जिसका उत्तर है प्रकृति से छेड़छाड़ और अत्यधिक जलदोहन और प्रदूषण जनित कार्य की अधिकता। आजादी के बाद भारत की जनसंख्या 40 करोड़ आज सात दशक में डेढ़ अरब के करीब पहुंच रहा है। विरासत में मिला है बैरांव का तालाब

कुटुंबा प्रखंड के बैरांव गांव स्थित तालाब विरासत में मिला तालाब है। हालांकि उक्त तालाब में पिछले 20 वर्षों से पानी ठहर नहीं पाया। कभी आसपास के गांव की ¨सचाई का प्रमुख साधन रहा तालाब बीस वर्ष से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा था। तालाब के आस पास दर्जनों एकड़ आम गैरमजरुआ भूमि वहां के पूर्ववर्ती समय को याद दिलाता है। तालाब के संबंध में लोगों का कहना है कि यह गांव के लिए एक धरोहर है। गांव वालों ने तालाब के सूर्य मंदिर का निर्माण करा वहां फिर से हरियाली लाने के प्रयास में जुट गए हैं। सरकार के इस तालाब की खुदाई मनरेगा योजना से शुरू की गई है। पास ही नये पावर हाउस का निर्माण हो रहा है। निकट भविष्य में कुछ ऐसे संस्थान की नींव वहां रखी जा सकती है जो प्रखंड के लिए गौरवपूर्ण स्थितियों को दर्शाएगा। गांव के पूर्वी छोर पर बना तालाब प्राचीन समय का एक तोहफा है जिसे फिर से जीवंत करने की कोशिश शुरू है। गांव वाले इसकी प्राचीनता से अनभिज्ञ हैं। लगभग दो सौ वर्ष पुराना तालाब के संबंध में गांव वालों को पता नहीं है कि इसे किसने बनवाया था। उक्त तालाब भी कुटुंबागढ़ की तरह पुराना है। 20 वर्षो से सूखा पड़ा है तालाब : प्रमुख

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कुटुंबा प्रखंड प्रमुख धर्मेंद्र कुमार बताते हैं कि गांव के तालाब को सुसज्जित रूप देने के लिए सभी तैयार हैं। पुराने समय से ही यह प्रचलित है कि 'कोलारगढ़' के राजा ने यहां 52 बीघा जमीन पर तालाब का निर्माण कराया था। बाद में तालाब की जमीन सिमटती गई। हालांकि वो जमीन आज भी मौजूद है। कुछ भूमि लोगों के कब्जे में है और बाकी में पावर हाउस एवं अन्य संस्थान खोले जा रहे हैं। मनरेगा योजना से तालाब की खुदाई करायी जा रही है। इसके बाद यहां पूरे वर्ष पानी तालाब में रहे इसके लिए कार्य किए जाएंगे। सांसद सुशील कुमार ¨सह एवं विधायक राजेश कुमार ने तालाब में सीढ़ी घाट का निर्माण कराया है। छठ के मौके पर यहां आसपास के दर्जनों गांव के छठ व्रती भगवान सूर्य को अ‌र्ध्य देने यहां पहुंचते हैं। तालाब में फिर से देखना चाहते है पानी : देवानंद

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कहते हैं गांव के देवानंद महतो प्राचीन तालाब को गांव के लोग फिर से पानी भरा देखना चाहते हैं। वर्षा कम होने की वजह से अब तालाब में पानी का ठहराव कम ही हो पाता है। तालाब के पास हरे पेड़ लगाने का काम भी शुरू किया गया है। अगले वर्ष वन विभाग से तालाब के चारों ओर पेड़ लगाने की मांग करेंगे। बताया कि पेड़ का होना बहुत जरूरी है। पेड़ के बिना पशु पक्षी एवं मनुष्य को भारी कष्ट झेलना पड़ रहा है। समृद्ध ऐतिहासिक क्षेत्र है कुटुंबा : बीडीओ

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कुटुंबा बीडीओ लोक प्रकाश से जब प्रखंड के तालाब को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य कराने के संबंध में पूछा तो उन्होंने बताया कि मनरेगा योजना से सरकारी तालाब पर कार्य कराया जा सकता है। मनरेगा योजना में वृक्षारोपण एवं जल संचयन क्षेत्र का विस्तार कराने के लिए बाध्यता नहीं है। जन प्रतिनिधि इसके लिए आगे बढ़कर कार्य कर सकते हैं। कहा कि कुटुंबा एक ऐतिहासिक स्थान है। देवी मंदिर, कुटुंबागढ़, कल्पवृक्षधाम इसकी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करता है। जरूरत है भावनात्मक एवं सत्य निष्ठा से विकास करने की।

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