औरंगाबाद। सुरक्षित प्रसव के लिए शासन ने सरकारी अस्पतालों में पहुंचने को लेकर गर्भवती महिलाओं को प्रेरित करने को कई योजनाएं चला रखी है। सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने वाली महिलाओं को आर्थिक मदद दी जाती है, बावजूद संस्थागत प्रसव का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। जनसंख्या नियंत्रण के साथ ही मातृ शिशु दर को कम करने के लिए गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था सुधारने पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। गांवों में आशा कार्यकर्ताओं की नियुक्ति की गई। इनका दायित्व गर्भवती महिलाओं की नियमित देखभाल, निर्धारित समय पर टीका लगाना एवं समय पूरा होने पर निकट के सरकारी अस्पताल में सुरक्षित प्रसव कराना है। सदर अस्पताल, अनुमंडलीय अस्पताल, तीन रेफरल अस्पताल, पांच सामुदायिक स्वास्थ केंद्र, 11 प्राथमिक स्वास्थ केंद्र, 65 अतिरिक्त स्वास्थ उपकेंद्र एवं 285 स्वास्थ उपकेंद्र है। विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2016 से 2017 में पूरे जिले में 62,030 महिलाओं को संस्थागत प्रसव कराने का लक्ष्य रखा गया था। मात्र 31,349 महिलाओं का प्रसव हो सका। यानी लक्ष्य के मात्र 51 प्रतिशत महिलाओं का संस्थागत प्रसव किया जा सका। 31,349 महिलाओं का प्रसव कराने में विभाग द्वारा 9 करोड़ 40 लाख 47 हजार रुपये खर्च कर दिए गए। वर्ष 2017 से 2018 में 63 हजार 687 महिलाओं को प्रसव कराने का लक्ष्य रखा गया था जिसमें मात्र 33 हजार 121 महिलाओं का ही प्रसव हो सका। यानी मात्र 52 प्रतिशत ही लक्ष्य पूरा किया जा सका। 33,121 महिलाओं का प्रसव कराने में विभाग द्वारा 9 करोड़ 93 लाख 63 हजार रुपये खर्च किए गए। वर्ष 2018 से 2019 में जुलाई माह तक 26,536 महिलाओं को प्रसव कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, मात्र 11293 महिलाओं का ही प्रसव हो सका। यानी लक्ष्य के मात्र 42.6 प्रतिशत महिलाओं का ही संस्थागत प्रसव हो सका। 90,223 की जगह 44,414 महिलाओं का प्रसव

यहां लक्ष्य और उसको पाने के लिए की जा रही कोशिश का मामला उल्टा है। लक्ष्य को पाने की कोशिश शायद ही विभाग कर रहा है। आंकड़े पर नजर डाले तो वर्ष 2017 से 2018 एवं 2018 से 2019 के जुलाई माह तक 90,223 महिलाओं की प्रसव का लक्ष्य रखा गया था जिसमें 44,414 महिलाओं का प्रसव हो सका। यानी लक्ष्य के मात्र 49.22 प्रतिशत लक्ष्य पूरा हो सका है। स्वास्थ विभाग की स्थिति अत्यंत दयनीय है। चिकित्सकों की लापरवाही के कारण यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। स्थिति यह है कि प्रसव का लक्ष्य आधा भी पूरा नहीं हो पा रहा है। प्रखंड का नाम लक्ष्य 2017-2018 प्राप्ति लक्ष्य 2018-2019 (जुलाई तक) प्राप्ति

औरंगाबाद 7037 7584 2933 2618

बारुण 5110 1659 2129 585

दाउदनगर 5297 1884 2207 681

देव 4359 1937 1816 664

गोह 5853 3062 2439 967

हसपुरा 3985 2456 1660 588

कुटुंबा 5799 2826 2416 1118

मदनपुर 5257 3073 2190 1095

नवीनगर 7712 2278 3216 790

ओबरा 5669 2641 2362 934

रफीगंज 7609 3721 3170 1253 अस्पताल में मिलता है रेफर का पूर्जा संस्थागत प्रसव का लक्ष्य पूरा न होना एक बड़ी समस्या है। लक्ष्य न पूरा होने का मुख्य कारण चिकित्सक की लापरवाही है। मरीज को अस्पताल में आने के साथ ही रेफर का पूर्जा थमा दिया जाता है। चिकित्सक प्रसव कराने में कतराती हैं। हालात यह है कि मरीज का परिजन निजी क्लीनिक का रास्ता देखते हैं। निजी क्लीनिक में मरीजों के साथ पैसों का दोहन किया जाता है। पैसों की चक्कर में चिकित्सक महिलाओं को ऑपरेशन कर प्रसव कराती हैं। निजी क्लीनिक में चिकित्सक द्वारा महिलाओं का प्रसव कराने में 25 से 30 हजार रुपये लेते हैं। एक तो सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक की वैसे ही कमी, दूसरे कई चिकित्सक गांव के अस्पतालों में रात में नहीं रुकते हैं। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक प्रसव के लिए आई महिलाओं को रेफर का पूर्जा थमा देती हैं। सरकारी अस्पतालों में नर्स कराती हैं प्रसव

जिले के सभी सरकारी अस्पतालों में प्रसव नर्स कराती हैं। चिकित्सक के नहीं होने के कारण मरीज के परिजन नर्स से प्रसव कराने में डर जाते हैं जिस कारण वे निजी क्लीनिक में चले जाते हैं। जिले के सदर अस्पताल, अनुमंडलीय, रेफरल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ केंद्र या स्वास्थ उपेंद्र सभी जगह चिकित्सक की जगह नर्स प्रसव कराती हैं। चिकित्सक एक से दो घंटे अस्पताल में रहते हैं, उसके बाद अपने घर चले जाते हैं। सदर अस्पताल में तीन चिकित्सक कार्यरत हैं। ड्यूटी का रोस्टर बना है परंतु एक भी चिकित्सक दो बजे के बाद ड्यूटी पर नहीं रहते हैं। अस्पताल उपाधीक्षक डा. राजकुमार प्रसाद की माने तो यहां चिकित्सक का छह पद स्वीकृत है जिसमें कार्यरत मात्र तीन है। तीन चिकित्सक के होने के कारण परेशानी होती है। फोन पर इलाज के लिए बुलाना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में सक्रिय हैं दलाल

सरकारी अस्पतालों में दलाल सक्रिय है। अस्पतालों में कई रैकेट सक्रिय है। दूर-दराज, गांव-देहात व कम पढ़े लिखे मरीजों को बरगलाकर शहर एवं निजी क्लीनिक में भेज देते हैं। इसके एवज में प्राइवेट अस्पताल एवं नर्सिंग होम के चिकित्सक दलालों को मोटा कमीशन देते हैं। गड़बड़ झाला में सरकारी अस्पतालों के कर्मचारी, आशा एवं कुछ चिकित्सक सक्रिय हैं। माना जाता है कि अस्पतालों में सक्रिय दलाल पहले तो खुद मरीज व उनके परिजन को बरगलाते हैं। संस्थागत प्रसव कराने का लक्ष्य पीछे रह गया है। हर बैठक में लक्ष्य के अनुसार काम करने की समीक्षा की जाती है। कर्मियों को निर्देश दिया जाता है। स्थिति में अगर सुधार नहीं हुआ तो कार्रवाई की जाएगी। दलालों के खिलाफ कार्रवाई जारी है। निजी क्लीनिकों में छापेमारी चल रही है।

डा. अमरेंद्र नारायण झा, सिविल सर्जन, औरंगाबाद।

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