अरवल : अरवल में सोन नदी की कलकल धारा एक नई कहानी कह रही है। ये कहानी यहां की एक बस्ती में दफन है। 300 की आबादी वाली इस बस्ती में कभी मजदूरों का जमावड़ा था। आज इनकी सूरत बदल गई है। दान में मिली जमीन में मजदूरों के पसीने ने रंग दिखाया, तो यहां की रंगत बदल गयी। आज सूबे में यह बस्ती सुर्खियों में है। यहां की उत्पादित सब्जियां दूर-दूर तक जा रही हैं। कमाई बढ़ी, तो इन मजदूरों के दिन बहुर गए। मजदूर से किसान बने और अब बड़े व्यवसायियों में गिनती होने लगी। कल के मजदूर अब अपनी गाड़ियों में सफर कर रहे हैं। लोगों को रोजगार देने लगे हैं।

सब्जी उगाकर बाजारों और गांवों में बेचकर की थी शुरुआत

अरवल में सोन नदी किनारे दो दशक पहले सरकार ने 262 भूमिहीनों को डेढ़-डेढ़ एकड़ जमीन आवंटित की थी। यहां बसने वाले सभी परिवार मजदूरी कर अपना पेट पालते थे। समय का पहिया ऐसा घुमा कि इनकी दशा और दिशा दोनों बदल गई। दान में मिली बंजर भूमि को सींचकर मजदूरों ने सोना उगा दिया। जमीन के एक हिस्से में मजदूरों ने सब्जी की खेती शुरू की। सब्जी उगाकर पास के बाजारों और गांवों में जाकर बेचने लगे। मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे यह इलाका सब्जी उत्पादन का हब बन गया। यहां उगने वाली सब्जियों की ऐसी खुशबू बिखरी कि बड़े-बड़े व्यापारी यहां खरीदारी के लिए आने लगे। एनएच-139 से सटे हसनपुर टाड़ी और अमरा चौकी को अब कौन नहीं जानता है। जहानाबाद, औरंगाबाद, पटना, गया पलामू तक के घरों में भोजन की थालियां यहां की हरी सब्जियों से ही सजती हैं। आलू, करैला, भिडी, गोभी, लौकी, मूली समेत अन्य सब्जियों का यहां बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। यहां के आलू और मूली की कई राज्यों में काफी डिमांड है। एक किसान साल में पांच से सात लाख तक की केवल मूली बेच लेते हैं। अब यहां का परिवार किसी पर आश्रित नहीं है। इनके पास बंगला और गाड़ी भी है।

लाल इलाका को कर दिया हरा-भरा

जिस समय मजदूरों के बीच भूमि का पर्चा वितरण किया गया था, उस समय यह इलाका लाल इलाका के रूप में जाना जाता था। शाम होने के बाद इस इलाके में आवाजाही बंद हो जाती थी। बंजर भूमि पर कांटेदार झाड़ी और जंगली जानवरों का बसेरा रहता था। नक्सली संगठनों का आश्रय रहता था। पुलिस से बचने के लिए 80 के दशक में चोर-डकैत भी यहीं आकर पनाह लेते थे। जब मजदूरों ने कुदाल उठाकर बंजर भूमि को सींचना शुरू किया तो नक्सली समेत डकैतों के पांव उखड़ने लगे। भूमिहीन मजदूरों ने बंजर भूमि को कृषि योग्य बनाकर मौसमी सब्जी की खेती शुरू की, जिसके बाद उनकी माली हालत सुधरने लगी। कृषि यंत्र आने पर खेती में क्रांति बढ़ी। बैल की जगह ट्रैक्टर आ गए। रफ्तार बढ़ी तो खेती का रकवा भी बढ़ा। आज यहां सैकड़ों एकड़ में सब्जी का उत्पादन हो रहा है। किसान भगवान पासवान, अजय पासवान, प्रभु पासवान कहते हैं कि सोन दियारे की भूमि पर सब्जी की खेती करना एक संघर्ष के समान था। लेकिन सामूहिक प्रयास और मेहनत से हमलोगों ने लाल भूमि को सींचकर हरा बना दिया।

Edited By: Jagran