संसू सिकटी (अररिया): चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर देवी दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा अर्चना की गईं। इस दिन मां चंद्रघंटा की पूजा से सुख-संपदा मिलती है और जीवन आनंदित होता है। शास्त्रों के अनुसार मान्यता यह भी है कि माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना से भक्तों को सभी जन्मों के कष्टों और पापों से मुक्ति मिलती है। माता चंद्रघंटा अपने सच्चे भक्तों को इसलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती हैं और भगवती अपने दोनों हाथों से साधकों को लम्बी आयु, सुख, संपदा और रोगों से मुक्त होने का वरदान देती हैं। मां चंद्रघंटा को सुगंध अत्यधिक प्रिय है। पुजारी ज्ञानमोहन मिश्र कहते हैं कि मां चंद्रघंटा का रूप अत्यंत ही सौम्य है। भगवती चंद्रघंटा का रूप अत्यंत शांतिदायक और कल्याणकारी माना गया है। सिंह पर सवार माता के मस्तक पर घंटे के आकार का अ‌र्द्धचंद्र है, इसलिए माता को चंद्रघंटा नाम दिया गया है। मां चंद्रघंटा का शरीर स्वर्ण के समान उज्जवल है, इनका वाहन सिंह है और इनके दस हाथ हैं जो कि विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से सुशोभित रहते हैं। भक्तों ने पूजन पद्धति के अनुसार माता को गंगा जल अर्पित किया। तत्पश्चात धूप-दीप, पुष्प, रोली, चंदन और फल-प्रसाद से देवी की पूजा की। वैदिक और संप्तशती मंत्रों का जाप कर माता के तीसरे स्वरूप को प्रसन्न किया गया। सफेद चीज में दूध, शहद तथा खीर का भोग लगाया गया। मां चंद्रघंटा की पूजा में दूध का प्रयोग कल्याणकारी माना गया है।

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