अररिया। प्रखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत कौआकोह के पड़रिया वार्ड संख्या एक में बकरा नदी के तेज कटान ने कई परिवारों को बेघर कर दिया। तिनका-तिनका जोड़कर बनाया घर को अपने ही हाथों से तोड़कर अन्यत्र जाने को विवश कर दिया है। नदी का कटान जब घर की देहरी छूने लगी तो घर मे रखा जरूरी सामान के साथ छत का टीना बचाने लगे। तट पर खड़े होकर मकानों के दीवार ,टाटी को नदी में विलीन होते मजबूर होकर लोग देख रहे हैं। वहीं प्रशासनिक अमला सूचना के बाद भी कटान निरोधी कार्य तो दूर कटान स्थल का निरीक्षण करना भी शायद मुनासिब नहीं समझते। जबकि बाढ़ आने के पूर्व आला अधिकारियों द्वारा द्वारा जरूरी एहतिहात बरतने का निर्देश दिया जाता है। परंतु धरातल पर बचाव के पूर्व से कोई उपाय नही किये जाते। बकरा नदी के तट पर बसे तीरा, खारदह, पड़रिया, पीरगंज आदि ऐसे के गांव हैं जहां के लोगों के लिए यह कोई पहली घटना नहीं है। इस त्रासदी को झेलना यहां के लोग अब अपनी नियति मान चुके है। बकरा नदी के तेज कटान से पीड़ित ग्रामीण बालेश्वर मंडल, गौतम कुमार मंडल, चंदन मंडल, नितिन मंडल समेत दर्जनों ग्रामीणों ने बताया कि कटान की सूचना सीओ सिकटी समेत अन्य सम्बंधित पदाधिकारी व स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी दी गई। लेकिन किसी ने भी कटान स्थल पहुंचने तक कि जहमत नहीं उठाई। उन्होंने बताया कि कई दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश से नदी किनारे बसे लोगों की जहां घर कटने पर है तो लगभग दर्जनों एकड़ धान लगी जमीन को बकरा नदी पहले ही अपने में समा चुकी है। उन्होंने बताया कि बकरा नदी द्वारा न केवल आबादी वाले गांव को निशाना बनाया जा रहा है उससे भी अधिक तेज गति से खेती योग्य जमीन भी नदी में समा रहा है । पीड़ित ग्रामीणों में स्थिर मंडल, दयानंद मंडल, कारू मंडल, धर्मानंद मंडल,लक्ष्मण मंडल, रामप्रसाद मंडल, महेश मंडल, दिलीप मंडल समेत दर्जनों परिवार बकरा नदी के तीव्र कटान को लेकर रतजगा को मजबूर हैं। पता नहीं बकरा नदी की वक्र ²ष्टि किसके घर को निशाना बनाए। गौरतलब है कि बकरा नदी की तेज कटान से पीड़ित पडरिया गांव के ग्रामीणों की तो महज छोटी सी बानगी है कमोबेश यही हाल शिशुआकोल में जारी बकरा नदी कटान की है। जहां विगत तीन वर्षों से कटान लगातार जारी है। स्थल का कटान इतना तेज है कि शिशुकोल, डहुआबाड़ी समेत अन्य गांव सहित प्रखण्ड मुख्यालय कुर्साकांटा का भी अस्तित्व खतरे में पड़ गया है । बावजूद प्रशासनिक स्तर से कटानरोधी कार्य प्रारंभ करने और विस्थापित हो रहे परिवारों की सुधि लेने वाला कोई नहीं है।

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