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भारत के आधार कार्ड पर नेपाल में पढ़ाई! ब‍िहार के बच्चों को नहीं पता 'जन गण मन', फर्राटे से गाते हैं पड़ोसी देश का राष्ट्रगान

Published: Tue, 20 Oct 2026 06:56 PM (IST)

Araria Border Village Students Going to Nepal School: बिहार के अररिया जिले के सीमावर्ती गांव के बच्चे भारतीय स्कूल न ...और पढ़ें

HighLights

  1. भारतीय सीमा पर स्कूल न होने से बच्चे नेपाल में पढ़ते।

  2. अररिया के छात्र भारतीय राष्ट्रगान से अनभिज्ञ, नेपाली राष्ट्रगान गाते।

  3. नेपाली शिक्षा प्रमाण पत्र भारत में आगे की पढ़ाई हेतु अमान्य।

ड‍िजि‍टल डेस्‍क, भागलपुर। Araria Border Village Students Going to Nepal School: 'जन गण मन अधिनायक जय हे...' यह वह राष्ट्रीय तराना है जो हर भारतीय बच्चे की जुबां पर प्राथमिक कक्षा से ही चढ़ जाता है, लेकिन भारत-नेपाल सीमा पर बसे बिहार के अररिया जिले के एक गांव में हकीकत बेहद चौंकाने वाली और सिस्टम की नाकामी का आईना दिखाती है।

यहां पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाली भारतीय छात्रा रीतू कुमारी को अपने देश का राष्ट्रगान नहीं आता, लेकिन वह नेपाल का राष्ट्रगान 'सयौं थुँगा फूलका हामी...' बिना रुके धाराप्रवाह गाती है। उसे भारतीय इतिहास और संस्कृति से अधिक नेपाल के संविधान और वहां की सामाजिक व्यवस्था की जानकारी है।

यह अकेली रीतू की कहानी नहीं, बल्कि अररिया के नरपतगंज प्रखंड स्थित मधुबनी गांव (वार्ड संख्या-17) के दर्जनों नौनिहालों की कड़वी जमीनी हकीकत है।

Araria Border Students Study in Nepal Don Know Indian Anthem (1)

बेलाही नदी पर पुल नहीं

मधुबनी गांव के नौनिहालों की इस लाचारी की सबसे बड़ी वजह इलाके की भौगोलिक उपेक्षा है। छात्रा रीतू कुमारी ने मासूमियत से बताया कि उनके गांव के पास भारत का कोई सरकारी विद्यालय नहीं है। जो नजदीकी भारतीय प्राथमिक व मध्य विद्यालय है, उसकी दूरी गांव से करीब 17 किलोमीटर है।

17 किमी दूर है भारतीय स्कूल

इस रास्ते में बेलाही नदी पड़ती है, जिस पर आजादी के 78 साल बीत जाने के बाद भी एक अदद पुल तक नहीं बन सका है। नदी में साल के अधिकांश महीने पानी लबालब भरा रहता है। ऐसे में छोटे-छोटे बच्चों के लिए नदी पार कर 17 किलोमीटर का दुर्गम सफर तय करना जान जोखिम में डालने जैसा है।

Araria Border Students Study in Nepal Don Know Indian Anthem (2)

भारतीय पहचान पर नेपाल में दाखिला

भारतीय स्कूल की दुर्गमता के विपरीत, गांव से अंतरराष्ट्रीय सीमा पार नेपाल का इलाका और वहां के सरकारी स्कूल काफी नजदीक हैं। मजबूरन अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए सीमा पार नेपाल भेजते हैं। नेपाली सरकारी स्कूल प्रबंधन भारतीय छात्रों के पहचान पत्र (आधार कार्ड) को स्वीकार कर उन्हें अपने यहां प्रवेश दे देता है।

Araria Border Students Study in Nepal Don Know Indian Anthem

भविष्य पर सवाल

भारतीय बच्चे वहां नियमित रूप से जाते हैं और नेपाली पाठ्यक्रम पढ़ते हैं। इसका नतीजा यह है कि इन बच्चों पर नेपाली भाषा, संस्कृति और वहां की राष्ट्रीयता का असर गहरा होता जा रहा है, जबकि वे अपनी मातृभूमि के प्रतीकों और प्राथमिक ज्ञान से पूरी तरह महरूम हैं।

नेपाली प्रमाण पत्र का भारत में लाभ नहीं

ग्रामीणों का कहना है कि वे बच्चों को सिर्फ अक्षर ज्ञान और निरक्षरता से बचाने के लिए नेपाल भेजते हैं, लेकिन इससे उनका भविष्य सुरक्षित नहीं हो रहा। नेपाल के सरकारी स्कूलों से मिलने वाले प्राथमिक शिक्षा प्रमाण पत्र की मान्यता भारत में आगे की पढ़ाई के लिए नहीं मिलती। ऐसे में जब बच्चे प्राथमिक कक्षाएं पास कर लेते हैं, तो उनके आगे की पढ़ाई का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है।

Araria Border Students Study in Nepal Don Know Indian Anthem (3)

अभिभावक चिंतित

ग्रामीणों ने आक्रोश जताते हुए कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने सांसद, विधायक, जिलाधिकारी और पंचायत प्रतिनिधियों को अनगिनत आवेदन दिए, पत्र भेजे, धरने-प्रदर्शन किए, लेकिन आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की उदासीनता के कारण आज भारतीय सीमा के भीतर पल रहे बच्चों की पहचान और भविष्य दोनों संकट में हैं।

"हिंदुस्तान में रहकर बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए नेपाल भेजना पड़े, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। इस समस्या से वरीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला। स्थानीय बच्चों के पास सीमा पार पढ़ने जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वहां के प्रारंभिक शिक्षा प्रमाण पत्र की यहां मान्यता न होने से बच्चों का भविष्य अधर में है।"