भरत कुमार झा,सुपौल: सुपौल लोकसभा क्षेत्र के लिए तीसरे चरण में 23 अप्रैल को चुनाव की तारीख निर्धारित है। ज्यों-ज्यों तारीख नजदीक आता जा रहा है अपनी जीत के प्रति प्रत्याशी व समर्थक आश्वस्त होते जा रहे हैं। इस लोकसभा क्षेत्र से दोनों गठबंधन के बीच आमने-सामने का मुकाबला है यह सीन अब पूरी तरह स्पष्ट होता जा रहा है। सबके वोट के अपने गणित हैं। कोई अपनी जाति के अलावा गठबंधन दलों के जातीय वोट को अपना आधार मान रहा है तो कोई अपने व्यक्तित्व, विकास और सेवा के साथ-साथ कुनबाई वोटों पर भरोसा जता रहा है। किसी के पास जातीय समीकरणों के साथ-साथ हवा का भी सहारा है। लेकिन मतदाताओं की चुप्पी इनकी परेशानी बढ़ाए जा रही है। एक तो मौसम ने पूरी गर्मी का एहसास करा दिया है उपर से चुनावी तापमान। काम भले ही कोई कर रहे हों लेकिन एक से अधिक आदमी कहीं जमा हुए तो चर्चा बस चुनावी। एक दूसरे से हाल पूछने के बजाय पूछ बैठते हैं- तो आपके तरफ की हवा कैसी है। लोग किधर रूख किए है। सामने वाला जो कुछ बताए अपनी दो लाइन की टिप्पणी देने से भी बाज नहीं आते।

आइए देखते हैं चर्चाओं में हार जीत का गणित। ये शहर की सबसे बड़ी कपड़े की दुकान है। चुनाव और शादी विवाह का मौसम भी साथ ही टकरा गया है। लग्न की खरीदारी है। लड़की वाले और लड़का वाले दोनों अपने ही जिले से हैं। इसीलिए मार्केटिग के लिए दोनों ने सुपौल में ही सहमति जताई। लड़की पक्ष परिपाटी के अनुसार लड़के को मनपसंद कपड़ा देने आए हुए हैं। दोनों पक्ष की मुलाकात हुई। लड़का अपने पसंद के कपड़े देखने लगा और दोनों ओर से शुरु हो गई चुनावी चर्चा। आपके इधर कैसा माहौल चल रहा है। जवाब में कोई सोच विचार नहीं झट से उत्तर मिला स्थिति तो बिल्कुल स्पष्ट है। महागठबंधन का अपना समीकरण है। सबसे पहले तो राजद-कांग्रेस का समीकरण जिसका सबसे मजबूत आधार वोट माई को कह सकते हैं। इसमें तो कोई कितु-परंतु नहीं सोचिए। इसके बाद मांझी वाला वोट, कुशवाहा वाला वोट, वीआईपी पार्टी के वोट को भी नजर अंदाज नहीं करिए। आज के तारीख में तो सबसे ज्यादा फैनेटिक वही दिख रहा है। कम्युनिष्ट का जो कैडर है वो तो है ही। वैसे उम्मीदवार का अपना प्रभाव भी हर तबके के कुछ न कुछ लोगों पर तो है ही। लेकिन एनडीए को देखिए, गांव-गांव लहर जैसा दिख रहा है कोई मानने को तैयार नहीं। हमारी याददाश्त कहिएगा तो आज तक ऐसा नहीं देखा। ग्रामीण इलाके में लोग राष्ट्रवाद की बात करने लगे हैं और इस बार अपना वोट राष्ट्र के नाम देने की बात कहते हैं। एक ही व्यक्तित्व है जिस पर पूरा भरोसा। हालांकि अपने इलाके में तो जातीय आधार ही वोट का मूल आधार माना जाता रहा है। लेकिन जातीय गणित के अलावा ये भावना इसबार कुछ अधिक ही दिखाई दे रही है। बोल पड़े कि एनडीए में इसबार फिर नीतीश कुमार की पार्टी और भाजपा साथ-साथ है। पिछले चुनाव तो दोनों अलग-अलग चुनाव मैदान में था। ये संगठित वोट क्या नहीं जोड़िएगा और उपर से लहर तो है ही। हालांकि चर्चा में नतीजे तो नहीं निकल पाए लेकिन चुनावी गणित पूरा फिट।

Posted By: Jagran

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