बिना कार तोड़े कार सेफ्टी साबित करने की तैयारी, कैसे डसॉल्ट सिस्टम्स से बदलेगा गाड़ियों का क्रैश टेस्टिंग का तरीका
Dassault Systemes का मानना है कि वर्चुअल क्रैश टेस्टिंग ऑटोमोबाइल सुरक्षा में क्रांति लाएगी। मनीष कुमार ने 3DEXPERIENCE WORLD 2026 ...और पढ़ें

वर्चुअल क्रैश टेस्ट से बदलेगी ऑटोमोबाइल सुरक्षा की तस्वीर।
HighLights
Dassault Systemes वर्चुअल क्रैश टेस्टिंग से ऑटो सुरक्षा में क्रांति ला सकता है।
महंगे फिजिकल टेस्ट की जगह सटीक वर्चुअल सिमुलेशन ले सकता है।
BNCAP के तहत भारत में स्टार्टअप्स को बड़ा फायदा मिल सकता है।
ऑटो डेस्क, नई दिल्ली। क्या हो अगर कार की सेफ्टी साबित करने के लिए एक भी कार को तोड़ना न पड़े? यही विजन Dassault Systemes आगे बढ़ा रहा है। कंपनी के मुताबिक आने वाला समय ऐसा हो सकता है, जहां बार-बार होने वाले फिजिकल क्रैश टेस्ट की जगह बेहद सटीक वर्चुअल सेफ्टी सिमुलेशन ले लेंगे, जो रियल-वर्ल्ड क्रैश टेस्ट जितने ही भरोसेमंद होंगे।
क्रैश टेस्ट क्यों हैं जरूरी?
अब तक वाहन सुरक्षा का गोल्ड स्टैंडर्ड क्रैश टेस्ट ही रहे हैं। कार निर्माताओं को जानबूझकर गाड़ियों को बैरियर, पोल और डिफॉर्मेबल स्ट्रक्चर से टकराना पड़ता है, ताकि यह समझा जा सके कि हादसे के वक्त कार यात्रियों को कितना सुरक्षित रख पाती है। हालांकि ये टेस्ट जरूरी हैं, लेकिन ये महंगे, समय लेने वाले और पूरी तरह से तोड़-फोड़ वाले होते हैं। हर टेस्ट में एक पूरी बनी हुई कार बर्बाद हो जाती है। बड़े OEMs के लिए यह खर्च संभालना आसान होता है, लेकिन छोटे मैन्युफैक्चरर्स और स्टार्टअप्स के लिए यह इनोवेशन में बड़ी रुकावट बन सकता है।
3DEXPERIENCE WORLD 2026 में क्या बोले मनीष कुमार?

ह्यूस्टन में आयोजित 3DEXPERIENCE WORLD 2026 में मनीष कुमार ने कहा कि Dassault Systemes का मानना है कि वर्चुअल क्रैश टेस्टिंग इस पूरी तस्वीर को बदल सकती है। एडवांस फिजिक्स-बेस्ड सिमुलेशन, AI-ड्रिवन मॉडल्स और डिजिटल ट्विन्स की मदद से इंजीनियर्स अब कंप्यूटर पर ही असली दुर्घटना जैसी परिस्थितियों को बेहद सटीकता से दोहरा सकते हैं। इनमें मटीरियल बिहेवियर, स्ट्रक्चरल डिफॉर्मेशन और यहां तक कि ह्यूमन इंजरी मॉडल्स तक शामिल होते हैं। इसका फायदा साफ है कि डिजाइन में तेजी से बदलाव, डेवलपमेंट कॉस्ट में कमी और फिजिकल प्रोटोटाइप बनने से पहले ही सेफ्टी से जुड़ी खामियों को ठीक करने की क्षमता बढ़ेगी।
सेफ्टी से कोई समझौता नहीं
मनीष कुमार ने साफ किया कि वर्चुअल टेस्टिंग का मतलब यह नहीं है कि फिजिकल क्रैश टेस्ट खत्म हो जाएंगे। क्रैश टेस्ट आगे भी जरूरी रहेंगे, लेकिन उनका तरीका बदलेगा। छोटे-छोटे डिजाइन बदलावों के लिए कई कारें तोड़ने की बजाय, मैन्युफैक्चरर्स वर्चुअल वैलिडेशन पर भरोसा कर सकते हैं और सिर्फ चुनिंदा, टार्गेटेड फिजिकल टेस्ट कर सकते हैं। इससे समय, पैसा और संसाधन तीनों की बचत होगी, बिना सेफ्टी स्टैंडर्ड्स से समझौता किए।
ग्लोबल रेगुलेटर्स और सेफ्टी रेटिंग्स
दुनियाभर में वाहन सुरक्षा सख्त नियमों के तहत तय होती है। अमेरिका में National Highway Traffic Safety Administration (NHTSA) स्टैंडर्डाइज्ड क्रैश टेस्ट करता है, जिनकी रेटिंग्स कस्टमर्स के खरीद फैसलों को प्रभावित करती हैं।
यूरोप में Euro NCAP ने ऑटोमेकर्स को लगातार सेफ्टी सुधारने के लिए मजबूर किया है। एशिया में ANCAP और साउथ अमेरिका में Latin NCAP जैसे प्रोग्राम भी इसी दिशा में काम करते हैं।
भारत में BNCAP और वर्चुअल टेस्टिंग का रोल
भारत में वाहन सुरक्षा को नई रफ्तार मिली है Bharat NCAP (BNCAP) के लागू होने से, जो Global NCAP की विशेषज्ञता पर आधारित है। यह प्रोग्राम भारत में बिकने वाली कारों को लोकल कंडीशंस और स्पीड के हिसाब से टेस्ट कर स्टार रेटिंग देता है। Mahindra और Tata जैसी भारतीय कंपनियां BNCAP में शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, जहां उनकी लगभग हर नई कार ने 5-स्टार सेफ्टी रेटिंग हासिल की है।
मनीष कुमार के मुताबिक, वर्चुअल क्रैश टेस्टिंग भारत में खासतौर पर गेम-चेंजर साबित हो सकती है। इससे स्टार्टअप्स और कॉस्ट-सेंसिटिव मैन्युफैक्चरर्स कम खर्च में भी BNCAP की सेफ्टी जरूरतों को पूरा कर सकेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि Dassault Systemes, NHTSA के साथ वर्चुअल सेफ्टी टेस्टिंग को रोड-वर्थीनेस वैलिडेशन में शामिल करने को लेकर बातचीत कर रहा है।
