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अर्धकुंभ 2019

  • मकर संक्रांति स्नान
    15 जनवरी

  • पौष पूर्णिमा स्नान
    21 जनवरी

  • मौनी अमावस्या स्नान
    4 फरवरी

  • बसंत पंचमी स्नान
    10 फरवरी

  • माघी पूर्णिमा स्नान
    19 फरवरी

  • महाशिवरात्रि स्नान
    4 मार्च

कुंभ समाचार

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  • 1

    बृहस्पति के कुंभ राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगा-तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

  • 2

    बृहस्पति के मेष राशि चक्र में प्रविष्ट होने तथा सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में आने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

  • 3

    बृहस्पति एवं सूर्य के सिंह राशि में प्रविष्ट होने पर नासिक में गोदावरी तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

  • 4

    बृहस्पति के सिंह राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर उज्जैन में शिप्रा तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

  • 1
    शंकर विमान मण्डपम

    दक्षिण भारतीय शैली का यह मंदिर चार स्तम्भों पर निर्मित है। जिसमे कुमारिल भट्ट, जगतगुरु आदि शंकराचार्य, कामाक्षी देवी (चारों ओर 51 शक्ति की मूर्तियां के साथ), तिरूपति बाला जी (चारों ओर 108 विष्णु भगवान) और योगशास्त्र सहस्त्रयोग लिंग (108 शिवलिंग) स्थापित है।

  • 2
    श्री वेणी माधव

    पद्मपुराण के अनुसार लोकमान्यता है कि सृष्टीकर्ता ब्रह्मा जी प्रयागराज की धरती पर जब यज्ञ कर रहे थे तब उन्होंने प्रयागराज की सुरक्षा हेतु भगवान विष्णु से प्रार्थना कर उनके बारह स्वरूपों की स्थापना करवाई थी। प्रयागराज के बारह माधव मंदिरों में सर्वप्रसिद्ध श्री वेणी माधव जी का मंदिर दारागंज के निराला मार्ग पर स्थित है। मन्दिर में शालिग्राम शिला निर्मित श्याम रंग की माधव प्रतिमा गर्भगृह में स्थापित है। श्री वेणी माधव को ही प्रयागराज का प्रधान देवता भी माना जाता है।

  • 3
    संकटमोचन हनुमान मंदिर

    दारागंज मोहल्ले में गंगा जी के किनारे संकटमोचन हनुमान मंदिर है। यह कहा जाता है कि संत समर्थ गुरू रामदास जी ने यहां भगवान हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की थी। शिव-पार्वती, गणेश, भैरव, दुर्गा, काली एवं नवग्रह की मूर्तियां भी मंदिर परिसर में स्थापित हैं। निकट में श्री राम जानकी मंदिर एवं हरित माधव मंदिर हैं।

  • 4
    मनकामेश्वर मंदिर

    किला के पश्चिम यमुना तट पर मिन्टो पार्क के निकट यह मंदिर स्थित है। यहां काले पत्थर की भगवान शिव का एक लिंग और गणेश एवं नंदी की मूर्तियां हैं। यहां हनुमान जी की भी एक बड़ी मूर्ति है और मंदिर के निकट एक प्राचीन पीपल का पेड़ है।

  • 5
    भारद्वाज आश्रम

    मुनि भारद्वाज के समय यह एक प्रसिद्ध शिक्षा केन्द्र था। कहा जाता है कि भगवान राम अपने वनवास पर चित्रकूट जाते समय सीता जी एवं लक्ष्मण जी के साथ इस स्थान पर आये थे। वर्तमान में वहां भारद्वाजेश्वर महादेव मुनि भारद्वाज, तीर्थराज प्रयाग और देवी काली इत्यादि के मंदिर हैं। निकट ही सुन्दर भारद्वाज पार्क एवं आनन्द भवन है।

  • 6
    श्री अखिलेश्वर महादेव

    चिन्मय मिशन के अधीन प्रयागराज में रसूलाबाद घाट के निकट लगभग 500 वर्ग फिट क्षेत्र में श्री अखिलेश्वर महादेव संकुल स्थापित है। इसकी आधारशिला 30 अक्टूबर, 2004 को चिन्मय मिशन के परमपूज्य स्वामी तेजोमयानन्दजी एवं पूज्य स्वामी सुबोधानन्द जी द्वारा रखी गयी थी।

  • 7
    दशाश्वमेघ मंदिर

    यह मंदिर दारागंज में गंगा नदी के किनारे स्थित है। कहा जाता है कि भगवान बह्मा जी ने यहां अश्वमेघ यज्ञ किया था। दशाश्वमेघेश्वर महादेव-शिवलिंग, नंदी, शेषनाग की मूर्तियां एवं एक बड़ा त्रिशूल मंदिर में स्थापित किये गये हैं। चैतन्य महाप्रभु की स्मृति में उनके पदचिन्हों की बिम्ब धारित करती हुई एक संगमरमर की पट्टी भी यहां लगी हुई है। इस मंदिर के निकट में ही देवी अन्नपूर्णा भगवान हनुमान एवं भगवान गणेश के मंदिर हैं।

  • 8
    तक्षकेश्वर नाथ मंदिर

    तक्षकेश्वर भगवान शंकर का मंदिर है जो प्रयागराज की दक्षिण दिशा में स्थित दरियाबाद मोहल्ले में यमुना तट पर स्थित है। इससे थोड़ी दूर पर यमुना में तक्षकेश्वर कुंड है। जन श्रुति यह है कि तक्षक नाग ने भगवान कृष्ण द्वारा मथुरा से भगाये जाने के पश्चात् यहीं शरण ली थी।



  • 1
    विंध्याचल

    विंध्याचल गंगा नदी के किनारे मिर्जापुर जिले में है। यह विंध्यवासिनी देवी का शक्तिपीठ है। यह प्रतिष्ठित शक्तिपीठों में से एक है। यहां देवी को समर्पित कई सारे मंदिर हैं। यहां की पवित्रता और प्रकृति बेहद आकर्षक हैं। इसकी दूरी प्रयागराज से 88 किलोमीटर है।

  • 2
    चित्रकूट

    चित्रकूट उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैले पहाड़ों की उत्तरी विंध्य श्रृंखला में स्थित है। भगवान राम ने यहां अपने वनवास का काफी समय बिताया था। रामायण के अनुसार चित्रकूट में भगवान राम के भाई भरत ने उनसे मुलाकात की और उनसे अयोध्या लौटने और राज्य पर शासन करने का आग्रह किया था। माना जाता है कि यहां हिंदू धर्म के सर्वोच्च देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश अवतार ले चुके हैं। यहां कई मंदिर और धार्मिक स्थल हैं। प्रयागराज से इसकी दूरी 130 किलोमीटर है।

  • 3
    वाराणसी

    काशी का आधुनिक नाम वाराणसी या बनारस है। यह आदि काल से भारतीय संस्कृति, दर्शन, परंपराओं और आध्यात्मिकता के लिहाज से एक आदर्श शहर रहा है। गंगा के किनारे स्थित यह शहर सप्तपुरियों यथा प्राचीन भारत के सात पवित्र नगरों में से एक है। गंगा की ही दो सहायक नदियों वरुणा और अस्सी के नाम पर इसका नाम वाराणसी हुआ। वाराणसी सांस्कृतिक और पवित्र गतिविधियों का केंद्र है। प्रयागराज से इसकी दूरी 120 किलोमीटर है।

  • 4
    अयोध्या

    अयोध्या फैज़ाबाद जिले में सरयू नदी के तट पर है। देश की गौरवशाली आध्यात्मिकता एवं सांस्कृतिक परम्परा का प्रतिनिधित्व करने वाली अयोध्या हमेशा से धर्म और संस्कृति का केंद्र रही है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के साथ ही इस पावन नगरी से सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र और सुरसरि गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने वाले राजा भगीरथ के भी संबंध रहे हैं। जैन धर्म के प्रणेता श्री आदिनाथ सहित पांच तीर्थंकर इसी नगरी में जन्मे थे। प्रयागराज से इसकी दूरी 169 किलोमीटर है।



  • अखाड़े का मतलब ‘अखण्ड’, यानि जो विभाजित नहीं हो सकता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए साधुओं के संघों को मिलाने का प्रयास किया था, अखाड़ा इसी से निकला है। अखाड़े के निर्माण का लक्ष्यध सनातन धर्म की रक्षा करना, उसे मजबूत बनाए रखना, विभिन्न परम्पराओं व विश्वासों का पालन करने वालों को एकजुट करना और धार्मिक परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाए रखना है। अखाड़ों से सम्बन्धित साधु-सन्तों की विशेषता यह होती है कि इनके सदस्य शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत होते हैं। यह सामाजिक व्यवस्था, एकता, संस्कृति और नैतिकता का प्रतीक है। समाज में आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना करना ही अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य है। इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना करना है।


    अखाड़ों को उनके इष्ट-देव के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

    • शैव अखाड़े के इष्ट भगवान शिव हैं।

    • वैष्णव अखाड़े के इष्ट भगवान विष्णु हैं।

    • उदासीन अखाड़े की स्थानपना सिख सम्प्रदाय के आदि गुरु श्री नानकदेव के पुत्र श्री चंद्रदेव जी से प्रेरित है। उन्हें उदासीन मत का प्रवर्तक माना जाता है।


    संख्या के हिसाब से जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है। इसके बाद निरंजनी और फिर महानिर्वाणी अखाड़े का नंबर आता है। इनके अध्यक्ष महंत और अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डलेश्वर के रूप में माने जाते हैं। महामण्डलेश्वर ही अखाड़े में आने वाले साधुओं को गुरु मन्त्र भी देते हैं। शाही ठाट-बाट के साथ अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए साधु और संत अपने लाव-लश्कर के साथ अपने-अपने गन्तव्य को पहुंचते हैं।


    अखाड़ों में आपसी सामंजस्य बनाए रखने और आंतरिक विवादों को सुलझाने के लिए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् का गठन किया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् ही आपस में परामर्श कर जुलूस और शाही स्नान के लिए तिथियों और समय का निर्धारण मेला आयोजन समिति, आयुक्त, जिलाधिकारी, मेलाधिकारी के साथ मिलकर करती है।



क्या करें

  • 1

    हल्के सामान के साथ यात्रा करें।

  • 2

    यदि डॉक्टर के द्वारा सलाह दी गयी है तो दवायें साथ लायें।

  • 3

    अस्पताल, खाद्य एवं आकस्मिक सेवायें इत्यादि सुविधाओं की जानकारी रखें।

  • 4

    आकस्मिक सम्पर्क नंबर की जानकारी रखें।

  • 5

    केवल उन्हीं स्नान क्षेत्रों/घाटों का उपयोग करें, जो मेला द्वारा प्राधिकृत हैं।

  • 6

    उपलब्ध शौचालयों एवं मूत्रालयों का उपयोग करें।

  • 7

    कचरा निस्तारण हेतु डस्टबिन का उपयोग करें।

  • 8

    मार्ग खोजने के लिये पथ प्रदर्शक बोर्ड का उपयोग करें।

  • 9

    वाहनों को खड़ा करने के लिये पार्किंग स्थलों का उपयोग करें और यातायात नियमों का पालन करें।

  • 10

    मेला क्षेत्र और शहर में रुकने के लिये स्थान के निकटतम स्नान घाटों का उपयोग करें।

  • 11

    यदि कोई अपरिचित या संदिग्ध वस्तु पाई जाती है तो पुलिस या मेला प्रशासन को सूचित करें।

  • 12

    जन संचारण तंत्र या किसी अन्य विधा के माध्यम से दिये गये नियमों, विनियमों एवं अनुदेशों का अनुसरण करें।

  • 13

    मेला आयोजन में कार्यकारी विभागों के साथ सहयोग करें।

  • 14

    अपने सामान के प्रति सजग रहें और अपने प्रियजनों एवं सामान के खोने की स्थिति में खोया-पाया केन्द्र पर संपर्क करे।

  • 15

    यात्रा की योजना बनाते समय अतिरिक्त समय लेकर चलें।

क्या न करें

  • 1

    महंगे, अनावश्यक खाद्य पदार्थ, कपड़े और सामान न लाएं।

  • 2

    अजनबी पर विश्वास न करें।

  • 3

    अप्राधिकृत स्थानों पर भोजन ग्रहण न करें।

  • 4

    उकसाने वाली बात करके अनावश्यक संघर्ष आमांत्रित न करें।

  • 5

    सीमाओं से परे नदी में जाने का साहस न करें।

  • 6

    साबुन, डिटरर्जेंट का उपयोग सफाई/धुलाई के प्रयोजनार्थ करते हुये या पूजन सामग्री को फेंकते हुये नदियों को प्रदूषित न करें।

  • 7

    यदि किसी संक्रामक रोग से ग्रसित हैं तो भीड़ भरी स्थानों पर न रुकें।

  • 8

    शहर और मेला क्षेत्र में प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग न करें।

  • 9

    प्लास्टिक की थैलियां सरकार और उच्च न्यायालय के द्वारा कुंभ मेला के दौरान प्रतिबंधित हैं।

  • 10

    खुले में शौच या मूत्र त्याग न करें।



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