सिनेमा के बहाने हिंदी साहित्य पर बहस

Publish Date:Sat, 30 Nov 2013 06:05 AM (IST) | Updated Date:Sat, 30 Nov 2013 06:06 AM (IST)
सिनेमा के बहाने हिंदी साहित्य पर बहस

जागरण संवाददाता, देहरादून: तीन दिवसीय 'लिटफेस्ट' का पैसिफिक मॉल में शुक्रवार को रंगारंग शुरूआत हुई। इसमें सिनेमा और डाक्यूमेंट्री से जुड़ी हस्तियों ने हिंदी सिनेमा में साहित्य पर बहस छेड़ी वहीं डाक्यूमेंट्री फिल्मों पर वर्कशॉप का आयोजन भी किया गया। देर शाम इंडियॉज गौट टेलेंट फेम जसलीन कौर रॉयल ने गीतों से धूम मचाई।

देश में हिंदी सिनेमा जिस तेजी से लोकप्रिय हुआ, उसी तेजी से हिंदी साहित्य की पुस्तकों से पाठकों का रुझान घटा। कहा गया कि सिनेमा एक दृश्य माध्यम से है जो आंखों के रास्ते सीधे दिल में जगह बनाता है। जबकि पुस्तक को पढ़ना पड़ता है, लेकिन अशिक्षा के कारण ज्यादातर लोग उससे अनभिज्ञ रहते हैं। हालांकि हिंदी सिनेमा की तरह हिंदी साहित्य को लोकप्रिय बनाने के बारे में सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल सका। सवाल उठे कि प्रेमचंद, निर्मल वर्मा जैसे हिंदी साहित्यकारों की कहानियों पर ज्यादा से ज्यादा फिल्में बनाई जानी चाहिए, इससे हिंदी साहित्य को भी बढ़ावा मिलेगा। इसी तरह, लघु कहानियों के लेखन पर चर्चा हुई, जिसमें कहा कि यह एक ऐसी विधा है, जिसमें कम शब्दों में बड़ी बात कही जाती है।

इस दौरान गीत-संगीत पर भी बहस हुई। हरियाणा सरकार में पर्यटन और सांस्कृतिक मामलों के प्रमुख सचिव विजय ब‌र्द्धन ने कहा कि सूफी संगीत हमेशा जीवित रहेगा। शांतनु रे चौधरी, कौसर मुनीर और करूण इजरा पारिख ने भी सूफी संगीत पर चर्चा की।

इससे पहले सूबे के परिवहन आयुक्त उमाकांत पंवार ने पैसेफिक मॉल के इस प्रयास को सराहा। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से सूबे में हिंदी साहित्य के प्रति लोगों का रुझान बढ़ेगा। उन्होंने आयोजकों को आश्वस्त किया कि ऐसे कार्यक्रमों को सरकार भी अपना सहयोग देगी। इस मौके पर प्रसिद्ध स्क्रिप्ट राइटर तरूण मनसुखानी, फेमिना की पूर्व संपादक सत्या सरन, अभिनेता और संगीतकार सात्विक, फिल्म निदेशक गौरी शिंदे ने भी लोगों से अपने अनुभव साझा किए।

'अशिक्षा के कारण हिंदी साहित्य गौण'

पैसेफिक मॉल में लिटफेस्ट में 'हिंदी सिनेमा तो देश में अपनी पकड़ बनाता जा रहा है, लेकिन हिंदी साहित्य नहीं' विषय पर वादविवाद प्रतियोगिता हुई। इसमें हिस्सा लेते हुए विभिन्न स्कूल-विश्वविद्यालय के छात्रों ने माना कि देश में अशिक्षित लोगों की संख्या ज्यादा है, इसलिए हिंदी सिनेमा तो फल-फूल रहा है लेकिन हिंदी साहित्य गौण होता जा रहा है। इस प्रतियोगिता की जज गीतकार कौसर मुनीर थी।

'अनुभा हिंदी फिल्मों से जुड़ी महिला लेखकों पर लिख रही किताब'

डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता अनुभा यादव का परिवार भले ही सिने जगत से न जुड़ा हो लेकिन उनकी मां कहानियां लिखती थी, जिससे प्रेरित होकर वह डाक्यूमेंट्री फिल्मों की तरफ आकर्षित हुई। दिल्ली में कॉलेज में पढ़ाई के दौरान सबसे पहले उन्होंने अपनी मां इंदिरा यादव की कहानी 'मुर्दा भी हलाल है' पर फिल्म बनाई। यह कहानी एक गरीब परिवार की है, जो एक मुर्गा पालता है और ईद के दिन उसे हलाल करने की सोचता है। लेकिन ईद के एक दिन पहले ही मुर्गा चोरी हो जाता है, इस पर उस परिवार की ईद की खुशियां कैसे काफूर हो जाती हैं, इसी पर यह फिल्म आधारित है। अनुभा इन दिनों हिंदी फिल्मों से जुड़ी महिला लेखकों पर किताब लिख रही हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 1970 से 1980 के दशक में कई महिला लेखकों ने हिंदी सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, इनमें सई परांजपे और शमां जैदी जैसी हस्तियां शामिल हैं। सई परांजपे ने कामेडी ही नहीं 'स्पर्श' जैसी गंभीर फिल्में भी बनाई।

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