कभी गंगा की गोद में गूंजती थी शहनाई

Publish Date:Tue, 21 Mar 2017 02:42 AM (IST) | Updated Date:Tue, 21 Mar 2017 02:42 AM (IST)
कभी गंगा की गोद में गूंजती थी शहनाईकभी गंगा की गोद में गूंजती थी शहनाई
जागरण संवाददाता, वाराणसी : मां गंगा को अपने सुरों से झंकृत कर उसकी मौजों में रवानी भरते थे। उनकी आत्

जागरण संवाददाता, वाराणसी : मां गंगा को अपने सुरों से झंकृत कर उसकी मौजों में रवानी भरते थे। उनकी आत्मा का नाद शहनाई की स्वरलहरियों में गूंजता हुआ हर सुबह बनारस को संगीत के रंग से सराबोर कर देता था। शहनाई उनके कंठ से लगकर नाद ब्रम्ह से एकाकार होती और विश्राम के भीतर मिलन के स्वर गंगा की लहरों से मिलते हुए अनंत सागर की ओर निकल पड़ते थे। एक ऐसा भी दिन आया, जब उस शहनाई के सुर सदा के लिए थम गए।

जी हां बात हो रही है उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की, जो ¨हदुस्तान के प्रख्यात शहनाई वादक थे। उस्ताद का जन्म पैगंबर खां और मिट्ठन बाई के यहां बिहार के डुमरांव स्थित ठठेरी बाजार में एक किराए के मकान में 21 मार्च 1916 को हुआ था। उनके बचपन का नाम कमरुद्दीन था। वे अपने माता-पिता की दूसरी संतान थे। उनके पैदा होने पर दादा रसूल बख्श ने 'बिस्मिल्लाह' कहा, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है 'शुरू करता हूं अल्लाह के नाम से'। इसलिए बाद में घर वालों ने उनका यही नाम रख दिया और आगे चलकर वे 'बिस्मिल्लाह खां' के नाम से मशहूर हुए।

उनके खानदान के लोग दरबारी राग बजाने में माहिर थे। उनके पिता बिहार की डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाया करते थे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां अपने पिता के साथ बनारस आ गए। यहां उन्होंने अपने चाचा अली बख्श 'विलायती' से शहनाई बजाना सीखा। उनके उस्ताद चाचा 'विलायती' विश्वनाथ मंदिर में स्थायी रूप से शहनाई वादन करते थे। संगीत-सुर और नमाज इन तीन बातों के अलावा बिस्मिल्लाह खां की जिंदगी में और दूसरा कुछ न था। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, तानसेन पुरस्कार से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को वर्ष 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्‍‌न से नवाजा गया। वे भारत के तीसरे संगीतकार थे, जिन्हें भारत रत्‍‌न से सम्मानित किया गया। यकीनन उस्ताद के लिए जीवन का अर्थ केवल संगीत ही था, उनके लिए संगीत के अलावा सारे इनाम-इकराम, सम्मान बेमानी थे। वे संगीत से देश को एकता के सूत्र में पिरोना चाहते थे। कहते थे सिर्फ संगीत ही है, जो इस देश की विरासत और तहजीब को एकाकार करने की ताकत रखता है। इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा रखने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की ये अंतिम इच्छा अधूरी ही रह गई। उन्होंने 21 अगस्त 2006 को अंतिम सास ली और इस आखिरी सांस के साथ आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली उनकी शहनाई की धुन हमेशा के लिए खामोश हो गई।

------------------------

आजादी पर गूंज उठी थी शहनाई

-15 अगस्त 1947 को देश की आजादी की पूर्व संध्या पर लालकिले पर फहराते तिरंगे के साथ बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की स्वरलहरिया भी आजाद भारत की खुली फिजा में शाति की संगीत बनकर फैल रही थीं। कमाल ही कहा जाएगा कि लगभग हर वर्ष 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह खां का शहनाई वादन एक प्रथा सी बन गई।

शहनाई वादन को दिलाया सम्मान

-एक ऐसे दौर में जबकि गाने-बजाने को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता था। उस दौर में बिस्मिल्लाह खां ने बजरी, चैती व झूला जैसी लोकधुनों में इस वाद्य यंत्र को अपनी तपस्या और रियाज से ख़ूब संवारा। साथ ही शास्त्रीय संगीत में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि खां साहब की मां कभी नहीं चाहती थीं कि उनका बेटा शहनाई वादक बने। वे इसे हलका काम समझती थीं, क्योंकि शहनाईवादकों को उस दौर में शादी-ब्याह व अन्य समारोह में बुलाया जाता था।

मोबाइल पर भी अपनी पसंदीदा खबरें और मैच के Live स्कोर पाने के लिए जाएं m.jagran.com पर
    Web Title:(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

    कमेंट करें

    यह भी देखें