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CAG: निर्माण निगम ने ठेकेदारों और महंगी खरीद पर लुटाए करोड़ों

Publish Date:Fri, 19 May 2017 02:44 PM (IST) | Updated Date:Fri, 19 May 2017 02:44 PM (IST)
CAG: निर्माण निगम ने ठेकेदारों और महंगी खरीद पर लुटाए करोड़ोंCAG: निर्माण निगम ने ठेकेदारों और महंगी खरीद पर लुटाए करोड़ों
आठ इकाइयों के परियोजना प्रभारियों ने उप ठेकेदारों को 142.03 करोड़ रुपये का मोबिलाइजेशन एडवांस दे दिया, जिससे निगम को 21.90 करोड़ रुपये के ब्याज का नुकसान हुआ।

लखनऊ (जेएनएन)। राजकीय निर्माण निगम की जिम्मेदारी तो सरकारी सिविल व बिजली संबंधी काम कराने की थी, लेकिन निगम के अफसरों की मनमानी, लापरवाही और चूक ने जहां ठेकेदारों को लगातार लाभ पहुंचाया, वहीं महंगी दरों पर की गई खरीद ने भी निगम को खूब चूना लगाया है। विधानमंडल के दोनों सदनों में गुरुवार को पेश की गई सीएजी की रिपोर्ट ने निगम के लचर कामकाज का चिट्ठा खोल दिया है।


केंद्रीय सतर्कता आयोग के निर्देशों के मुताबिक काम के लिए ठेकेदार को मोबिलाइजेशन एडवांस देने का जिक्र टेंडर में होना चाहिए और इस एडवांस पर ब्याज भी लिया जाना चाहिए, लेकिन राजकीय निर्माण निगम ने इसका पालन नहीं किया। आठ इकाइयों के परियोजना प्रभारियों ने उप ठेकेदारों को 142.03 करोड़ रुपये का मोबिलाइजेशन एडवांस दे दिया, जिससे निगम को 21.90 करोड़ रुपये के ब्याज का नुकसान हुआ। सीएजी की रिपोर्ट में ठेकेदारों पर मेहरबानी का एक और मामला यह सामने आया कि उन्हें 33.17 से 56.51 फीसद काम सौंप दिए गए, जबकि इसकी निर्धारित सीमा 10 से 30 फीसद है। बिजली लाइनें बिछाने के काम के दौरान भी 1155.12 करोड़ रुपये की रकम इसीलिए फंसी रही, क्योंकि ठेकेदार ने इस काम के लिए पर्याप्त मजदूर नहीं लगाए थे।
इसके अलावा खरीद में भी गड़बड़ी स्पष्ट हुई है। सीएजी रिपोर्ट बताती है कि ठेकेदारों से ऊंची दरों पर अनुबंध कर 78.55 करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च किया गया, जबकि सामग्री की खरीद पर भी 3.71 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय किया गया। पांच उपकेंद्रों के लिए 55.22 लाख रुपये के अधिक मूल्य पर कंट्रोल केबल, पावर केबल व कंडक्टर खरीदे गए, जबकि 116 कार्यों के दौरान मैनुअल का उल्लंघन किए जाने से 59.33 करोड़ रुपये का अधिक खर्च आया। इसी तरह निगम ने बिना टेंडर के दो उपकेंद्रों का निर्माण ठेकेदारों को सौंप दिया। 81 अन्य कार्यों में भी निविदा प्रणाली का पालन नहीं किया गया। 2011-12 से 2015-16 के बीच निगम के अधिकारियों ने बिना टेंडर के ही 19.67 करोड़ रुपये की खरीद की और 173.25 करोड़ के 68 काम महज वर्क ऑर्डर से करा लिए गए।

पीएसयू ने भुगता 26 गुना नुकसान
प्रदेश में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) की नब्ज का अंदाजा सीएजी रिपोर्ट की इसी एक पंक्ति से लगाया जा सकता है कि 65 कार्यरत पीएसयू में से 33 ने 707.52 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया है, जबकि 24 ने 18,497.43 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया है। यानी लाभ से करीब 26 गुना अधिक हानि हो गई। इसके अलावा चार पीएसयू ने लेखे प्रस्तुत नहीं किए, जबकि चार ने न लाभ न हानि के आधार पर लेखे बनाए हैं। सीएजी रिपोर्ट में जहां सार्वजनिक उद्यमों के लेखों के रखरखाव पर सवाल उठाए गए हैं, वहीं काम न करने वाले 26 उपक्रमों को बंद करने के राज्य सरकार के फैसले के बावजूद प्रक्रिया शुरू न होने को भी रिपोर्ट में शामिल किया है।

कागजों में जारी हुए बिजली मीटर
सीएजी रिपोर्ट ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम में बिजली मीटरों की काल्पनिक इंट्री किए जाने की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के मुताबिक मार्च, 2012 में 10.67 लाख रहे बिना मीटर वाले कनेक्शन इसी वजह से मार्च, 2016 में बढ़कर 12.98 लाख हो गए। मीटर कवर न खरीदे जाने के कारण मीटरों के ठीक होने के बावजूद तीन लाख से अधिक नए मीटरों के लिए 21.64 करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च करना पड़ा। घटती दरों का फायदा उठाने के लिए नया टेंडर जारी करने की बजाए पुरानी दरों पर 2.60 लाख सिंगल फेस मीटर खरीदे जाने से 1.86 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। ऊंची दरों पर काम करा के 2.74 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च किए गए, मीटर रीडिंग और बिल जारी करने के काम के लिए आधी की बजाए पूरी दर पर 1.48 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान कर दिया गया, जबकि निजी नलकूपों पर ग्रामीण नलकूपों की दर से बिल बनाए जाने के कारण 17.81 करोड़ रुपये के राजस्व का भी नुकसान हुआ।

वित्तीय निगम भी विफल
दस साल पहले ऋण स्वीकृति पर रोक लगाए जाने के बाद से उप्र वित्तीय निगम के पास काम के तौर पर कर्ज वसूली ही रह गई थी, लेकिन सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक निगम इसमें भी विफल रहा है। कर्जदारों की बंधक परिसंपत्तियों पर भौतिक कब्जा लेने में देर होने से 68.48 करोड़ रुपये के मूलधन की वसूली में देर हुई, जबकि ऐसे ही कारणों से निगम 83.45 करोड़ की आरसी में से केवल 1.17 करोड़ रुपये ही वसूल सका। पांच वर्षों से लगातार वसूली का लक्ष्य प्राप्त करने में विफल रहे निगम की वार्षिक वसूली भी इसीलिए 2011-12 में 46.13 करोड़ के मुकाबले 2015-16 में घटकर 25.54 करोड़ रुपये रह गई। इसके अलावा आठ मामलों में ओटीएस के तहत बंधक संपत्तियों का मूल्यांकन निर्धारित मूल्य से कम पर करने के कारण निगम को 2.68 करोड़ रुपये का नुकसान भी उठाना पड़ा।

योजना नहीं बना पाया परिवहन निगम
सीएजी रिपोर्ट ने परिवहन निगम के भी कामकाज पर सवाल खड़े करते हुए बताया है कि गैर राष्ट्रीयकृत मार्गों पर बस संचालन बढ़ाने के लिए निगम ने न तो कोई योजना बनाई और न ही कोई कार्यवाही की। बकाया वसूली की योजना न होने के कारण निगम मार्च, 2016 तक लंबित 83.02 करोड़ में से 46.58 करोड़ रुपये वसूल सका। इसके अलावा निगम थ्री-पी मॉडल की योजनाएं लाने में विफल रहा, जबकि प्रदेश सरकार ने भी राष्ट्रीय परिवहन नीति के आधार पर राज्य में कोई परिवहन नीति नहीं बनाई। निगम के मुख्य कार्यकारी की नियुक्ति कम से कम तीन साल के लिए होनी चाहिए, लेकिन प्रबंध निदेशक का कार्यकाल 18 दिन के अंतराल में भी बदला गया। इसी तरह प्रदेश सरकार द्वारा लेखा परीक्षा की संस्तुति स्वीकार किए जाने के बाद भी स्वतंत्र परिवहन नियामक की नियुक्ति नहीं की गई।
 

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Web Title:Construction corporation looted millions of contractors and expensive purchases(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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