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इस प्रथा के अंतर्गत लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं

Publish Date:Fri, 17 Feb 2017 12:20 PM (IST) | Updated Date:Sat, 18 Feb 2017 10:00 AM (IST)
इस प्रथा के अंतर्गत लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईंइस प्रथा के अंतर्गत लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं
परिवारों द्वारा कोई मुराद पूरी होने के बाद ऐसा किया जाता देवता से ब्याही इन महिलाओं को ही देवदासी कहा जाता है। कहते हैं कि इस दौरान उनका शारीरिक शोषण किया जाता था।

भारत में सबसे पहले देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण को संस्थागत रूप दिया गया था। प्राय: देवदासियों की नियुक्ति मासिक अथवा वार्षिक वेतन पर की जाती थी। कर्नाटक के बेलगाम जिले के सौदती स्थित येल्लमा देवी के मंदिर में हर वर्ष माघ पुर्णिमा के दिन किशोरियों को देवदासियां बनाया जाता। मुगलकाल में, जबकि राजाओं ने महसूस किया कि इतनी संख्या में देवदासियों का पालन-पोषण करना उनके वश में नहीं है, तो देवदासियां सार्वजनिक संपत्ति बन गईं।

जानकारी अनुसार कर्नाटक के 10 और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में यह प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है। देवदासी शब्द का प्रथम उल्लेख कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में मिलता है। मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण एवं अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में भी इस शब्द का उल्लेख मिलता है।

भारत में सबसे पहले देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण को संस्थागत रूप दिया गया था। प्राय: देवदासियों की नियुक्ति मासिक अथवा वार्षिक वेतन पर की जाती थी। मध्ययुग में देवदासी प्रथा और भी परवान चढ़ी। स्वतंत्रता के बाद 35 वर्ष की अवधि में ही लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं। यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं है। अभी भी यह कई रूपों में जारी है। कर्नाटक सरकार ने 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन मंदिरों में देवदासियों का गुजारा बहुत पहले से ही मुश्किल हो गया था।

1990 में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 45.9 फीसदी देवदासियां महानगरों में वेश्यावृत्ति में संलग्न मिलीं, बाकी ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर मजदूरी और दिहाड़ी पर काम करती पाई गईं थी। धर्म के नाम पर हज़ारों वर्षों से लोगों का तरह-तरह से शोषण होता रहा है। तरह-तरह की ऐसी प्रथायें चलती रहीं, जो अमानवीय थीं। इक्कीसवीं सदी और 'पोस्ट मॉडर्निज़्म' के इस दौर में भई धर्म के प्रभाव में कोई कमी नहीं आई है।

प्रसिद्ध इतिहासकार विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े के महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 'भारतीय विवाह संस्था का इतिहास', देवराज चानना की पुस्तक 'स्लेवरी इन एंशियंट इंडिया', एस. एन. सिन्हा और एन. के. बसु की पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ प्रॉस्टिट्यूशन इन इंडिया', एफ ए मार्गलीन की पुस्तक 'वाइव्ज़ ऑफ द किंग गॉड, रिचुअल्स ऑफ देवदासी', मोतीचंद्रा की 'स्टडीज इन द कल्ट ऑफ मदर गॉडेस इन एंशियंट इंडिया', बी. डी. सात्सोकर की 'हिस्ट्री ऑफ देवदासी सिस्टम' में इस कुप्रथा पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। जेम्स जे. फ्रेजर के ग्रंथ 'द गोल्डन बो' में भी इस प्रथा का विस्तृत ऐतिहासिक विश्लेषण मिलता है।

देवदासी प्रथा यूं तो भारत में हजारों साल पुरानी है, पर वक्त के साथ इसका मूल रूप बदलता गया। कानूनी तौर पर रोक के बावजूद कई इलाकों में इसके जारी रहने की खबरें आती रहती हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों को एक आदेश जारी कर इसे पूरी तरह रोकने को कहा है। जब देवदासी को लेकर आदेश जारी हुए गृह मंत्रालय ने नट और बेड़िया समाज का जिक्र किया था । इसकी शुरुआत को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, पर ज्यादातर मानते हैं कि ये प्रथा छठी सदी में शुरू हुई थी।

देश में इसके खिलाफ फेमिनिस्ट ने एक मूवमेंट खड़ा किया और इसे महिलाओं के लिए अपमानजनक और अमानवीय घोषित करवाने में सफलता पाई। नारीवादी आंदोलन और न्यायालयों की वजह से ही कड़े क़ानून बने। कई राज्यों ने इनपर प्रतिबंध भी लगाया।

इन राज्यों में जारी है प्रथा

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, ओडिशा, गोवा और मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में देवदासी प्रथा के मामले उजागर होते रहे हैं। मंदिर के देवताओं से लड़कियों की कर दी जाती थी शादी । इस प्रथा के तहत लड़कियों को धर्म के नाम पर कुछ मंदिरों को दान कर दिया जाता था। माता-पिता अपनी बेटी का विवाह देवता या मंदिर के साथ कर देते थे। परिवारों द्वारा कोई मुराद पूरी होने के बाद ऐसा किया जाता था। देवता से ब्याही इन महिलाओं को ही देवदासी कहा जाता है। उन्हें जीवनभर इसी तरह रहना पड़ता था। कहते हैं कि इस दौरान उनका शारीरिक शोषण किया जाता था। कई आंदोलनों के बाद कर्नाटक सरकार ने 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया था।

कालिदास ने मेघदूतम में किया है जिक्र

देवदासी यानी 'सर्वेंट ऑफ़ गॉड'। देवदासियां मंदिरों की देख-रेख, पूजा-पाठ की तैयारी, मंदिरों में नृत्य आदि के लिए थीं। कालिदास के 'मेघदूतम्' में मंदिरों में नृत्य करने वाली आजीवन कुंआरी कन्याओं का वर्णन है। संभवत: इन्हें देवदासियां ही माना जाता है।

काफी पुरानी है प्रथा

कर्नाटक यूनिवर्सिटी के इतिहास के प्रोफेसर डॉ. एसएस शेट्टर ने देवदासी प्रथा पर शोध किया है। उन्होंने कन्नड़ में इस विषय पर फिल्म भी बनाई है। प्रो.शेट्टर के अनुसार, यह तय कर पाना कठिन है कि देवदासी प्रथा की शुरुआत कब हुई।

विभिन्न स्रोतों के मुताबिक, यह प्रथा पिछले दो हजार वर्षों से अलग-अलग रूपों में चली आ रही है। मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देवदासी प्रथा का उल्लेख मिलता है।

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Web Title:Under this practice almost half a million girls were dedicated to the gods(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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