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इस तरह ये वृक्ष करता है हर इच्छा को पूरी, अदभुत है इसका रहस्य

Publish Date:Mon, 12 Dec 2016 04:50 PM (IST) | Updated Date:Tue, 13 Dec 2016 10:36 AM (IST)
इस तरह ये वृक्ष करता है हर इच्छा को पूरी, अदभुत है इसका रहस्य
यह स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है।

कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है। पौराणिक धर्म ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है, वह पूर्ण हो जाती है। पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से कल्पवृक्ष भी एक था। कल्पवृक्ष को अन्य कई नामों से भी जाना जाता है, जैसे कल्पद्रुप, कल्पतरु, सुरतरु देवतरु और कल्पलता

पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना 'सुरकानन वन' में कर दी थी। कल्पवृक्ष के विषय में यह भी कहा जाता है कि इसका नाश कल्पांत तक नहीं होता। 'तूबा' नाम से ऐसे ही एक वृक्ष का वर्णन इस्लाम के धार्मिक साहित्य में भी मिलता है, जो सदा 'अदन' में फूलता-फलता रहता है।

लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच ऐसा कोई वृक्ष था या है? यदि था तो क्या आज भी वो है? यदि है तो वह कैसा दिखता है और उसके क्या फायदे हैं? आओ जानते हैं..

ओलिएसी कुल के इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम ओलिया कस्पीडाटा है। यह यूरोप के फ्रांस व इटली में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। यह दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है। भारत में इसका वानस्पतिक नाम बंबोकेसी है। इसको फ्रांसीसी वैज्ञानिक माइकल अडनसन ने 1775 में अफ्रीका में सेनेगल में सर्वप्रथम देखा था, इसी आधार पर इसका नाम अडनसोनिया टेटा रखा गया। इसे बाओबाब भी कहते हैं।

वृक्षों और जड़ी-बूटियों के जानकारों के मुताबिक यह एक बेहद मोटे तने वाला फलदायी वृक्ष है जिसकी टहनी लंबी होती है और पत्ते भी लंबे होते हैं। दरअसल, यह वृक्ष पीपल के वृक्ष की तरह फैलता है और इसके पत्ते कुछ-कुछ आम के पत्तों की तरह होते हैं। इसका फल नारियल की तरह होता है, जो वृक्ष की पतली टहनी के सहारे नीचे लटकता रहता है। इसका तना देखने में बरगद के वृक्ष जैसा दिखाई देता है। इसका फूल कमल के फूल में रखी किसी छोटी- सी गेंद में निकले असंख्य रुओं की तरह होता है।

पीपल की तरह ही कम पानी में यह वृक्ष फलता-फूलता हैं। सदाबहार रहने वाले इस कल्पवृक्ष की पत्तियां बिरले ही गिरती हैं, हालांकि इसे पतझड़ी वृक्ष भी कहा गया है।

यह वृक्ष लगभग 70 फुट ऊंचा होता है और इसके तने का व्यास 35 फुट तक हो सकता है। 150 फुट तक इसके तने का घेरा नापा गया है। इस वृक्ष की औसत जीवन अवधि 2500-3000 साल है। कार्बन डेटिंग के जरिए सबसे पुराने फर्स्ट टाइमर की उम्र 6,000 साल आंकी गई है।

औषध गुणों के कारण कल्पवृक्ष की पूजा की जाती है। भारत में रांची, अल्मोड़ा, काशी, नर्मदा किनारे, कर्नाटक आदि कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर ही यह वृक्ष पाया जाता है। पद्मपुराण के अनुसार परिजात ही कल्पवृक्ष है। यह वृक्ष उत्तरप्रदेश के बाराबंकी के बोरोलिया में आज भी विद्यमान है। कार्बन डेटिंग से वैज्ञानिकों ने इसकी उम्र 5,000 वर्ष से भी अधिक की बताई है।

समाचारों के अनुसार ग्वालियर के पास कोलारस में भी एक कल्पवृक्ष है जिसकी आयु 2,000 वर्ष से अधिक की बताई जाती है। ऐसा ही एक वृक्ष राजस्थान में अजमेर के पास मांगलियावास में है और दूसरा पुट्टपर्थी के सत्य साईं बाबा के आश्रम में मौजूद है।

यह एक परोपकारी मेडिस्नल-प्लांट है अर्थात दवा देने वाला वृक्ष है। इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन 'सी' होता है। गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है और इसके अलावा सभी तरह के विटामिन पाए जाते हैं।

कैसे उपयोग करें कल्पवृक्ष को औषधि के रूप में। इसकी पत्ती को धो-धाकर सूखी या पानी में उबालकर खाया जा सकता है। पेड़ की छाल, फल और फूल का उपयोग औषधि तैयार करने के लिए किया जाता है।

कैसे उपयोग करें कल्पवृक्ष को औषधि के रूप में।

पत्तों का उपयोग : हमारे दैनिक आहार में प्रतिदिन कल्पवृक्ष के पत्ते मिलाएं 20 प्रतिशत और सब्जी (पालक या मैथी) रखें 80 प्रतिशत। आप इसका इस्तेमाल धनिए या सलाद की तरह भी कर सकते हैं। इसके 5 से 10 पत्तों को मैश करके परांठे में भरा जा सकता है।

फल का उपयोग : कल्पवृक्ष का फल आम, नारियल और बिल्ला का जोड़ है अर्थात यह कच्चा रहने पर आम और बिल्व तथा पकने पर नारियल जैसा दिखाई देता है लेकिन यह पूर्णत: जब सूख जाता है तो सूखे खजूर जैसा नजर आता है।

एक थका-हारा व्यक्ति जंगल में एक वृक्ष के नीचे सुस्ताने बैठा। उसे जोर से प्यास लगी थी, सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि पीने के लिए ठंडा-ठंडा पानी मिल जाए। उसका ये सोचना था कि वहां फौरन एक लोटा ठंडा पानी पहुंच गया। उसने अपनी प्यास बुझाई और आराम करने लगा। प्रेरणासोत्र: मन ही है कल्पवृक्ष अब उसे भूख भी लग आई थी। उसने फिर सोचा कि क्या ही अच्छा हो यदि खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन मिल जाए। उसका इतना सोचना था कि सामने खूब सारा स्वादिष्ट भोजन आ गया। उसने पेट भर भोजन किया।

भोजन करने के बाद उसके मन में विचार आया कि इस निर्जन वन में मेरे सोचते ही पानी और खाना कहां से आया? कहीं ये भूत-प्रेत की माया तो नहीं? यदि इस समय कोई भूत आकर मुझे खा जाए तो? इस विचार से वह डर गया और कांपने लगा। उसका इतना सोचना था कि सचमुच एक भूत वहां आ उपस्थित हुआ और बोला मैं तुम्हें खाऊंगा।

वह व्यक्ति बहुत बुरी तरह डर गया और सोचने लगा कि हो न हो इस वृक्ष में कोई जादू है जो मेरे मन के विचारों को जान लेता है और फिर वैसा ही हो जाता है। पहले उसने मुझे पानी दिया, फिर भोजन दिया और अब भूत के रूप में मृत्यु। अचानक उस व्यक्ति के मन में इसके विपरीत भाव आया और कहने लगा, लेकिन यह तो हो नहीं सकता। जरूर मैं कोई सपना देख रहा हूं। भूत-वूत कुछ नहीं होता और मैं किसी भूत-प्रेत से नहीं डरता। उसका ये सोचना था कि भूत गायब।

वस्तुत: वह व्यक्ति एक कल्पवृक्ष के नीचे बैठा था। कहते हैं कि कल्पवृक्ष सब इच्छाओं को पूरी करने वाला होता है। उसके नीचे बैठकर जो भाव मन में लाए जाएं अथवा इच्छा की जाए, वह अवश्य पूरी होती है। लेकिन किसी इच्छा के पूर्ण होने के लिए सबसे जरूरी चीज है मन में उस इच्छा का होना। इच्छा के अभाव में कल्पवृक्ष भी फल नहीं दे सकता। कामना नहीं तो कैसी कामनापूर्ति?

हर फल या परिणाम किसी कर्म के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है। कर्म नहीं करेंगे तो फल नहीं मिलेगा। कर्म की प्रेरणा विचार से ही उत्पन्न होती है और विचार का उद्गम है मन। कल्पवृक्ष भी तभी इच्छा पूरी करेगा जब मन में कोई इच्छा उत्पन्न होगी। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसी इच्छा होगी वैसी ही परिणाम आएगा।

भोजन और पानी की इच्छा हो तो भोजन-पानी और मृत्यु का भय हो तो मृत्यु का सामना। हमारी इच्छापूर्ति हमारी सोच का ही परिणाम है। हमारी सफलता-असफलता, सुख-दुख, लाभ हानि, आरोग्य-रुग्णता सब हमारी सोच द्वारा निश्चित होते हैं। सकारात्मक सोच का अच्छा परिणाम तथा नकारात्मक सोच का बुरा परिणाम।

सफलता, सुख, समृद्धि और आरोग्य हमारी सकारात्मक सोच या भावधारा का परिणाम है। असफलता, दुख, हानि और रुग्णता हमारी नकारात्मक सोच का परिणाम है। सफलता, सुख-समृद्घि, आय, स्वास्थ्य तथा आयु के प्रति अविश्वास, संशय तथा भय ही इनकी प्राप्ति में प्रमुख बाधा है। मनुष्य वास्तव में वही है जो उसकी सोच है।

मन तो संकल्प-विकल्प दोनों करता है। उसमें परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न होते रहते हैं। अच्छे विचार आते हैं तो बुरे विचार भी आते हैं। बुरे विचार आते हैं तो उसके विरोधी विचार अर्थात अच्छे विचार भी अवश्य उत्पन्न होते हैं। मन में उठने वाले विचारों पर नियंत्रण कर हम जीवन को मनचाहा आकार दे सकते हैं। जैसा भाव या विचार, वैसा ही जीवन।

यह पूरा ब्रह्माण्ड ही एक कल्पवृक्ष है जो हमारे भावों के अनुरूप हमारी सृष्टि का निर्माण करता है। हमारी आंतरिक और बाह्य सृष्टि हमारे ही भावों से आकार पाती है और उसी से नियंत्रित होती है। सकारात्मक भावों द्वारा इसे सही आकार प्रदान किया जा सकता है तथा नियंत्रण द्वारा गलत आकार पाने से रोका जा सकता है।

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Web Title:The tree is the secret of it all is amazing desire(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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