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सोमवती अमावस्या

Publish Date:Mon, 08 Jul 2013 12:11 PM (IST) | Updated Date:Mon, 08 Jul 2013 12:36 PM (IST)
सोमवती अमावस्या

नई दिल्ली। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। ये वर्ष में लगभग एक ही बार पड़ती है। इस अमावस्या का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व होता है। विवाहित स्त्रियों द्वारा इस दिन अपने पतियों के दीर्घायु कामना के लिए व्रत का विधान है।

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इस दिन मौन व्रत रहने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। शास्त्रों में इसे अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत की भी संज्ञा दी गयी है। अश्वत्थ यानि पीपल वृक्ष। इस दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन इत्यादि से पूजा और वृक्ष के चारों ओर 108 बार धागा लपेट कर परिक्रमा करने का विधान होता है। धान, पान और खड़ी हल्दी को मिला कर उसे विधान पूर्वक तुलसी के पेड़ को चढ़ाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का भी विशेष महत्व समझा जाता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर को इस दिन का महत्व समझाते हुए कहा था कि, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त होगा।

ऐसा भी माना जाता है कि स्नान करने से पितरों कि आत्माओं को शांति मिलती है।

सोमवती अमावस्या पर करें मंत्र जप-

सूर्य नारायण को दे अर्घय

शास्त्रों में वर्णित है कि नदी, सरोवर के जल में स्नान कर सूर्य को गायत्री मंत्र उच्चारण करते हुए अर्घ्य देना चाहिए। यह क्रिया आपको अमोघ फल प्रदान करेगी। लेकिन जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीथरें का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए।

सोमवती अमावस्या या मौनी अमावस्या के दिन 108 बार तुलसी परिक्रमा करें।

सोमवती अमावस्या के दिन सूर्य नारायण को अर्घय देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होगी।

जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी।

इसके अलावा मंत्र जाप, सिद्धि साधना एवं दान कर मौन व्रत को धारण करने से पुण्य प्राप्ति और भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

इस मंत्र का करें जाप-

अमावस्या के दिन इस मंत्र के जप से विशेष उपलब्धि प्राप्त होगी। साथ ही स्नान दान का पूरा पुण्य भी मिलेगा।

अयोध्या, मथुरा, माया, काशी कांचीअवन्तिकापुरी, द्वारवती ज्ञेया: सप्तैता मोक्ष दायिका॥

॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिंधु कावेरी जलेस्मिनेसंनिधि कुरू॥

जिनकी कुंडली में शनि ग्रह के कारण चंद्रमा कमजोर हो रहा है या साढ़ेसती चल रही हो और वह मानसिक विकारों से दिन-प्रतिदिन ग्रस्त होते जा रहे हों, वे सोमवती अमावस्या पर दूध, चावल, खीर, चांदी, फल, मिष्ठान और वस्त्र इत्यादि अपने पितरों के निमित्त पिंडदान करवाकर इतना पुण्य प्राप्त कर सकते है, जिससे उनकी कुंडली में जरूरी ग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक रूप धारण कर लेगी।

सोमवती अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। सोमवती अमावस्या को सभी देवताओं का कुरुक्षेत्र के तीर्थो में भी वास माना जाता है। इस दिन कुरुक्षेत्र के तीर्थो में भी स्नान व दान करने का विशेष महत्व माना जाता है।

व्यास जी ने कहा है कि अमावस्या काल में गंगाजी व कुरुक्षेत्र के तीर्थो में स्नान करने से हजारों गायों के दान का फल मिल जाता है। अमावस्या एक ऐसी तिथि है जिसकी रात्रि में संपूर्ण अंधकार हो जाता है व अन्य रात्रियों में चंद्रमा के दर्शन प्राय: हो जाते हैं, लेकिन अमावस्या कृष्ण पक्ष की अंतिम रात होती है, जिसके बाद शुक्ल पक्ष शुरू हो जाता है।

उन्होंने बतया कि कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर दान का फल तेरह गुना प्राप्त होता है। जो व्यक्ति इस धरती पर रहकर पाप करता है, वह व्यक्ति कदापि सुख-चैन से जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। इस दिन गऊशालाओं में कम से कम अपने वजन के बराबर गउओं को हरी घास खिलाने का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन पीपल के वृक्ष के मूल में भगवान श्री विष्णु का पूजन करने का विधान दिया गया है।

सोमवती अमावस्या पर स्त्रिया अपने सुहाग की रक्षा और आयु की वृद्धि के लिए पीपल की पूजा करती हैं। पीपल के वृक्ष को स्पर्श करने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है और परिक्त्रमा करने से आयु बढ़ती है और व्यक्ति मानसिक तनाव से मुक्त हो जाता है। अमावस्या के पर्व पर अपने पितरों के निमित्त पीपल का वृक्ष लगाने से सुख-सौभाग्य, संतान, पुत्र, धन की प्राप्ति होती है और पारिवारिक क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

[प्रीति झा]

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