PreviousNext

ऐसी दशा में संसार बंधन से भली प्रकार मुक्त हो जाओगे

Publish Date:Fri, 21 Apr 2017 01:26 PM (IST) | Updated Date:Fri, 21 Apr 2017 01:26 PM (IST)
ऐसी दशा में संसार बंधन से भली प्रकार मुक्त हो जाओगेऐसी दशा में संसार बंधन से भली प्रकार मुक्त हो जाओगे
अंतिम विकार भी समाप्त हो गया, अब कोई शत्रु है ही नहीं। तब ब्रह्म में विलय की योग्यता आ जाती है।

 गीता के अनुसार, ‘यज्ञार्थात्कर्मणोअन्यत्र लोकोअयं कर्मबंधन:।’ (3/ 9) अर्जुन, यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। यज्ञ एक निश्चित विधि है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र जो कुछ किया जाता है, वह इसी लोक का एक बंधन है, न कि कर्म। योग-विधि, साधन-पद्धति को कार्यरूप देना कर्म है। कर्म यानी चिंतन। अर्जुन, इस कर्म को करके मोक्ष्य से अशुभात् (4/ 16) अशुभ अर्थात संसार बंधन से भली प्रकार मुक्त हो जाओगे।

एक ही कर्म-पथ को चार भागों में बांटा गया है। गुणों के दबाव के अनुसार, आप चिंतन करते हैं, तो आरंभ में आपका मन नहीं लगता। उस समय आप अल्पज्ञ हैं, क्षुद्र हैं, क्योंकि तामसी गुणों का बाहुल्य है। ऐसी दशा में सत्पुरुषों की सेवा और शरण-सान्निध्य से विधि जाग्रत हो जाएगी। साधना हृदय से जाग्रत हो जाएगी। तब भगवान मन की लगाम पकड़कर साधक को चलाने लगते हैं। यहां से आज्ञा पालन ही भजन कहलाता है। अंतिम विकार भी समाप्त हो गया, अब कोई शत्रु है ही नहीं। तब ब्रह्म में विलय की योग्यता आ जाती है।

परमहंस स्वामी अड़गड़ानंदजी कृत

श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य यथार्थ गीता से साभार

मोबाइल पर भी अपनी पसंदीदा खबरें और मैच के Live स्कोर पाने के लिए जाएं m.jagran.com पर
Web Title:geeta gyan(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

कमेंट करें

जिन्हें अजान से समस्या है, वे देश छोड़ देंसाबरमती, शिरडी, अक्षरधाम और कई ज्योतिर्लिंग के दर्शन कराएगी ये ट्रेन
यह भी देखें