ये हैं प्री-एक्टिविस्ट जो अलार्म बजने से पहले जागे

  • राजेंद्र सिंह: जल पुरुष कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह ने पहले ही जल संकट की स्थिति को भांप लिया था और जल संरक्षण के काम में जुट गए थे। उन्होंने कुछ गांव वालों की मदद से जगह-जगह छोटे-छोटे पोखर बनाने शुरू किए। ये छोटे-छोटे पोखर बारिश के पानी से लबालब भर जाते हैं और फिर इस पानी को धरती धीरे-धीरे सोख लेती है। इससे जमीन के नीचे के पानी का स्तर बढ़ता चला जाता है। गर्मियों में जहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते थे, वहां आज पानी की कोई समस्या नहीं है।

  • ओंकारनाथ: मेडिसिन बाबा के नाम से लोकप्रिय ओंकारनाथ दवाएं जमा करने के लिए दिल्ली के ऐसे इलाकों में घूमते हैं, जहां समृद्ध परिवार रहते हैं और जो महंगी दवा दान कर सकते हैं। उन्होंने अपने कपड़ों पर गरीबों के लिए मुफ्त में दवा देने के बारे में लिखवा रखा है। कुर्ते पर फोन नंबर और ईमेल आईडी भी है, जिससे लोग उनसे संपर्क कर सकें। दोनों पैरों से अपाहिज मेडिसिन बाबा रोजाना छह से सात किलोमीटर पैदल चलकर दवा इकट्ठा करते हैं।

  • चेवांग नोर्फेल: चेवांग नोर्फेल अब तक छोटे-बड़े लगभग एक दर्जन ग्लेशियर बना चुके हैं। लद्दाख के वर्षाविहीन ठंडे हिमालयी रेगिस्तान में जहां लोग एक-एक बूंद पानी को तरसते हैं। वहीं लेह के सेवानिवृत्त सिविल इंजीनियर चेवांग नोर्फेल अनोखे कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर इस इलाके में सिंचाई की कठिन समस्या को हल करने में कामयाब हुए हैं।

  • आलोक सागर:आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर आलोक सागर मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके में आदिवासियों के लिए पिछले 26 सालों से काम कर रहे। वह रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को भी वह पढ़ा चुके हैं। आलोक सागर कहते हैं कि लोगों की सोच से उपजी ऊंच-नीच का भेदभाव खत्म होना चाहिए।

  • गुरमीत सिंह: बिहार की राजधानी पटना में पिछले 20 सालों से गुरमीत सिंह बेसहारा मरीजों की देखभाल में जुटे हुए हैं। वह पटना मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में जरूरतमंद मरीजों की देखभाल करते हैं। उन्हें अपने हाथ से खाना खिलाते हैं और उनका इलाज करवाते हैं। गुरमीत हर दिन काफी समय हॉस्पिटल में बिताते हैं। वह अपने साथ दवाएं और खाना भी लाते हैं। गरीब और असहाय मरीज उन्हें अपना मसीहा बताते हैं।

  • टोनसे केम्मान्नु श्रीनिवास राव: उडुपी के टोनसे केम्मान्नु श्रीनिवास राव रिटायर होने के बाद भी स्टूडेंट्स को पढ़ा रहे हैं। जहां ज्यादातर लोग अपनी रिटायरमेंट के बाद सुकून के साथ जिंदगी बिताना पसंद करते हैं। लेकिन श्रीनिवास राव रिटायर होने के 38 साल बाद भी स्टूडेंट्स को पढ़ा रहे हैं। छात्रों को शिक्षा देना 94 वर्षीय राव का सिर्फ जुनून ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।

Tata Tea Jaago Re initiative in association with Jagran

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