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शर्त ने बना दी जोड़ी

Publish Date:Mon, 20 Mar 2017 02:21 PM (IST) | Updated Date:Mon, 20 Mar 2017 02:34 PM (IST)
शर्त ने बना दी जोड़ीशर्त ने बना दी जोड़ी
निर्देशन में खूब नाम कमाया है अब्बास-मस्तान की जोड़ी ने और अब ‘मशीन’ से एक्टिंग में करियर शुरू किया है अब्बास के बेटे मुस्तफा ने। अपनी जिंदगी और पसंद-नापसंद को इस जोड़ी ने साझा किया

आपके पास कहानियों का कितना संग्रह रहता है?

हमारे पास कोई संग्रह नहीं होता। राइटर हमें कहानी का सार एक लाइन में सुनाते हैं। रोचक लगने पर उस विषय को चुनते हैं। गहन चर्चा करते हैं। सिर्फ ‘किस-किस को प्यार करूं’ की कहानी हमारे पास करीब छह साल से थी। हमने सोचा था कि अगर इसके लिए उपयुक्त कलाकार मिला तभी इसे बनाएंगे। ‘मशीन’ पर भी ‘रेस-2’ और ‘किस-किस को प्यार करूं’ के दौरान काम चल रहा था। संजीव कौल ने कहानी, स्क्रीन प्ले और डायलॉग लिखा।

थ्रिलर फिल्में ज्यादा बनाने की क्या वजहें रही?

थ्रिलर हमारा पसंदीदा जॉनर रहा है। विजय आनंद के हम मुरीद थे। उनकी फिल्म ‘तीसरी मंजिल’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘ज्वैल थीफ’ हमने बहुत बार देखीं। कहानी का रोमांच हमें बांधे रखता था। हम गुत्थियां सुलझाने की उधेड़बुन में रहते थे। हत्यारे को लेकर कयास लगाते थे। कहानी में रम जाते थे। वहीं से थ्रिलर का चस्का लगा।

आपकी कई फिल्में हॉलीवुड से प्रभावित मानी जाती रही हैं। उसका कितना प्रभाव रहा है?

हम लोग हॉलीवुड फिल्में ज्यादा नहीं देखते हैं। ‘टर्मिनेटर’ सरीखी प्रख्यात हॉलीवुड फिल्में किसी की सलाह पर देख लेते हैं। दरअसल, राइटर ही उनसे प्रभावित होकर हमारे पास आते हैं। हम अपने मुताबिक कहानी को सिल्वर स्क्रीन पर उतारते हैं। फिल्म हिंदुस्तानी जनता को ध्यान में रखकर बनाते हैं। हमारा मानना है कि विषय में कितना भी ट्विस्ट और टर्न हो मगर इमोशन होना बेहद जरूरी है।

आप तीन भाई हैं लेकिन जोड़ी दो की बनी, ऐसा क्यों?

न, हमारे भाई हुसैन पहले दूसरे बैनर की फिल्में एडिट करते थे। हमने उनसे कहा क्यों न तुम हमारे साथ सेट पर रहो ताकि सेट पर ही एडीटिंग हो सके। फिर वो हमारे साथ आ गए।

अब्बास-मस्तान की कहानी क्या रही?

हम दोनों की जोड़ी बनने की कहानी भी दिलचस्प है। बड़ौदा में हमारे परिचित निर्माता थे गोविंद भाई पटेल। हमें निर्देशन का बेहद शौक था। हमारे चाचा एडिटर थे। हम छह साल तक उनके संग रहे। उनसे एडिटिंग की बारीकियां सींखी। उनका कहना था कि निर्देशन के लिए एडिटिंग का ज्ञान जरूरी है। गोविंद भाई पटेल की फिल्में हमारे चाचा एडिट करते थे। उन्होंने कहा मैं गुजराती फिल्म बनाने की तैयारी में हूं। उन्होंने हम दोनों भाइयों द्वारा संयुक्त रूप से उसका निर्देशन करने की शर्त रखी। कहा कि इससे उम्दा काम होगा। भाई होने के कारण ईगो की समस्या नहीं आएगी। तभी हमारी जोड़ी बनी। हमारी पहली गुजराती फिल्म ने गोल्डन जुबली मनाई। दूसरी का भी वही परिणाम रहा। फिर हमने हिंदी में पहली फिल्म ‘अग्निकाल’ बनाई। उस फिल्म को बहुत सराहना और अवॉर्ड मिले। फिल्म के म्यूजिक राइट वीनस कंपनी के पास थे। उन्होंने म्यूजिक खरीदने पर फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की। उन्हें फिल्म बेहद पसंद आई। उन्होंने कहा कि हम प्रोडक्शन में उतरना चाहते हैं जिसका श्रीगणेश हमारे साथ करना चाहते हैं। हमारा उनके साथ जुड़ाव ‘खिलाड़ी’ से शुरू हुआ। फिर हमने ‘बाजीगर’, ‘दरार’, ‘अजनबी’, ‘बादशाह’, ‘हमराज’ और ‘किस-किस को प्यार करूं’ जैसी हिट फिल्में दी। गोविंद भाई पटेल के बेटे हरीश पटेल ही हमारी फिल्म ‘मशीन’ के सहनिर्माता हैं।

किस फिल्म को लेकर क्रिएटिव मतभेद सबसे ज्यादा हुए?

हर फिल्म में होते हैं। अच्छी बात यह है कि हममें ईगो बिल्कुल नहीं है। हम दोनों अकेले विचार-विमर्श नहीं करते। कहानी के चुनाव को लेकर हम तीनों भाई, हमारे छह असिस्टेंट और राइटर साथ चर्चा करते हैं। हम सबकी बात ध्यान से सुनते हैं। स्क्रिप्ट हमारे लिए सर्वोपरि होती है। वहीं से हम अंतिम निर्णय लेते हैं।

इंडस्ट्री से जुड़े बच्चों की ग्रूमिंग बचपन से होती है। आपने मस्तान को लांच करने की नहीं सोची थी?

हमने अपने बच्चों को करियर चुनने की पूरी आजादी दी। बच्चे निर्देशन में आना चाहते थे। हुसैन का बेटा जैनुल और मुस्तफा (अब्बास के बेटे) दोनों न्यू यॉर्क फिल्म एकेडमी पढ़ने गए। कोर्स के तहत शॉर्ट फिल्म बनाई। कभी कैमरा मैन या एक्टर भी बने। उन्हें उसमें आनंद आ रहा था। वे उसकी क्लिप हमें भेजते। एक साल बाद वे भारत आए। हमने उनमें काफी बदलाव पाया। हमने उन्हें समझाया कि प्रैक्टिकली सीखना भी जरूरी है। तो मुस्तफा और जैनुल ने हमें ही असिस्ट करने को कहा। उन्होंने ‘रेस 2’, ‘प्लेयर्स’ और ‘किस-किस को प्यार करूं’ में असिस्ट किया। ‘मशीन’ की कहानी और स्क्रिप्ट उनके सामने ही डेवलप हुई। स्क्रिप्ट तैयार होने के बाद हम कास्टिंग पर विचार करते हैं। जैनुल ने ही हमें उसके लिए मुस्तफा का नाम सुझाया। फिलहाल जैनुल की तैयारी निर्देशन में आने की है।

निकट भविष्य में बतौर निर्देशक उसे मौका देंगे। 90 के दौर की कौन सी बातें थी जिनकी वर्तमान में कमी खटकती है?

उस दौर में कई बड़े सितारों एक ही फिल्म में दिखते थे। मसलन ‘अमर अकबर एंथनी’, त्रिशूल, ‘मुकद्दर का सिकंदर’। उन्हें एक साथ देखने को लेकर उत्साह रहता था। अब वह सब फिल्मों में नहीं दिखता। अब एकल हीरो केंद्रित फिल्मों को तरजीह मिल रही है। हमें लगता है कि मल्टीस्टारर कहानी बननी चाहिए। हमारी ‘रेस’ और ‘रेस-2’ भी मल्टीस्टारर थीं।

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