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टीपीपी के बहाने जीएसटी में रोड़ा डाल सकते हैं ट्रांसपोर्टर

Publish Date:Sun, 02 Apr 2017 07:58 PM (IST) | Updated Date:Sun, 02 Apr 2017 08:35 PM (IST)
टीपीपी के बहाने जीएसटी में रोड़ा डाल सकते हैं ट्रांसपोर्टरटीपीपी के बहाने जीएसटी में रोड़ा डाल सकते हैं ट्रांसपोर्टर
ट्रांसपोर्टरों के आहवान पर दक्षिण भारत कई राज्यों में चक्का जाम शुरू हो चुका है।

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। ट्रांसपोर्टर थर्ड पार्टी मोटर प्रीमियम जैसे मुद्दों के नाम पर पहली जुलाई से जीएसटी लागू करने की सरकार की मुहिम को पटरी से उतार सकते हैं। इसके लिए उन्होंने एक बार फिर चक्का जाम का सहारा लिया है। इसमें उन्हें व्यापारियों और ट्रक मालिकों का साथ मिल रहा है।

ट्रांसपोर्टरों के आहवान पर दक्षिण भारत कई राज्यों में चक्का जाम शुरू हो चुका है। जबकि 20 अप्रैल से इसके पूरे देश में लागू होने की आशंका है क्योंकि देश के सबसे बड़े ट्रांसपोर्ट संगठन ने इस दिन से राष्ट्रव्यापी चक्काजाम का आहवान किया है।

थर्ड पार्टी प्रीमियम (टीपीपी) के खिलाफ आल इंडिया कंफेडरेशन आफ गुड्स वेहिकल ओनर्स एसोसिएशन (अकोगोवा) तथा साउथ इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (सिमटा) के आहवान पर 30 मार्च की रात व 1 अप्रैल की सुबह से दक्षिण भारत के तकरीबन 20 लाख ट्रांसपोर्टरों व ट्रक मालिकों ने चक्का जाम के तहत ट्रकों की आवाजाही अवरुद्ध कर दी है। इसके असर को दक्षिण भारत के अलावा देश के अन्य भागों में भी महसूस किया जा रहा है।

सिमटा के अनुसार अभी तो केवल ट्रक ही हड़ताल पर है। परंतु यदि टीपीपी में बढ़ोतरी वापस नहीं ली गई तो बसें व टैक्सियां भी चक्काजाम में शामिल हो जाएंगी। टीपीपी के अलावा ये संगठन मोटर वाहन (संशोधन) बिल के तहत यातायात नियमों के उल्लघन पर जुर्मानों तथा ड्राइविंग लाइसेंस व फिटनेस टेस्ट जैसे आरटीओ शुल्कों में बढ़ोतरी का विरोध कर रहे हैं। लेकिन ये मांगे उतनी अहम नहीं हैं। जितनी कि जीएसटी को ट्रांसपोर्टरों पर लागू न किए जाने की वह मांग है जिसे ट्रांसपोर्टरों के सबसे बड़े संगठन आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस ने उठाया है और इस पर सरकार को झुकाने के लिए 20 अप्रैल से अखिल भारतीय चक्का जाम की धमकी दी है।

टीपीपी पर ट्रांसपोर्टरों को मनाने के लिए 27 मार्च को केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के दोनों राज्य मंत्रियों-पोन राधाकृष्णन और मनसुख लाल मंडाविया ने ट्रांसपोर्ट संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी। लेकिन इसमें कोई नतीजा नहीं निकला है। लिहाजा अब इस मसले पर कल 3 अप्रैल को हैदराबाद में बीमा नियामक इरडा, बीमा कंपनियों और ट्रांसपोर्टरों की बैठक होगी। लेकिन इस बैठक में यदि टीपीपी का मसला हल भी हो जाता है तो भी 20 अप्रैल से होने वाला एआइएमटीसी जाम टलेगा इसमें संदेह है। क्योंकि टीपीपी जैसे मसले एआइएमटीसी के लिए गौण हैं। उसका असली एजेंडा तो सरकार को जीएसटी, टीडीएस और कैरिज बाय रोड एक्ट जैसे सुधारवादी कदमों से पीछे हटने के लिए विवश करना है।

तभी तो जहां अकोगोवा और सिमटा केवल टीपीपी में की गई 41 फीसद की वृद्धि, मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक के तहत जुर्मानों में की गई कई गुना वृद्धि तथा ड्राइविंग लाइसेंस व फिटनेस टेस्ट के शुल्कों में की गई असामान्य बढ़ोतरियों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। वहीं एआइएमटीसी ने दस फालतू मांगें जोड़कर अपनी खतरनाक मंशा जता दी है। परिवहन विशेषज्ञों के मुताबिक दरअसल, टीपीपी जैसे मुद्दे तो एआइएमटीसी के लिए महज बहाना हैं। उसका असली निशाना तो ट्रांसपोर्टरों को जीएसटी के दायरे से बाहर निकलवाना या दरों में कमी करवाना, माल भाड़े पर टीडीएस खत्म करवाना तथा कैरिज बाय रोड एक्ट को लागू होने से रोकना है। इस मुहिम में उसे ऐटवा (आल इंडिया ट्रांसपोर्ट वेलफेयर एसोसिएशन) जैसे संगठनों का साथ मिल रहा।

इससे उसके हौंसले बुलंद हैं। क्योंकि इतिहास गवाह है कि सरकार कोई भी रही हो, उसने एआइएमटीसी के आगे अक्सर घुटने टेके हैं। सड़क परिवहन मंत्रालय के अफसर भी एआइएमटीसी की ताकत को सलाम करते हैं। यही वजह है कि अच्छी सड़कें बनने के बावजूद आज भी भारत में सड़क परिवहन की दशा दयनीय बनी हुई है। क्योंकि जब जब सरकार ने ट्रांसपोर्ट कारोबार पर लगाम लगाने और उसे नियम-कायदों में बांधकर पारदर्शी बनाने की कोशिश की ट्रांसपोर्टरों की संगठन शक्ति के आगे उसे मुंह की खानी पड़ी।

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Web Title:transporter threaten strike on 1st July(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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