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जानें आखिर क्‍यों एक ही विवाद पर बार-बार सुलगता रहा है दार्जिलिंग समेत पूरा पहाड़

Publish Date:Mon, 19 Jun 2017 04:22 PM (IST) | Updated Date:Mon, 19 Jun 2017 05:17 PM (IST)
जानें आखिर क्‍यों एक ही विवाद पर बार-बार सुलगता रहा है दार्जिलिंग समेत पूरा पहाड़जानें आखिर क्‍यों एक ही विवाद पर बार-बार सुलगता रहा है दार्जिलिंग समेत पूरा पहाड़
गोरखालैंड की मांग पर कई दिनों से पहाड़ सुलग रहा है। लेकिन राज्‍य सरकार इस पर काबू पाने में नाकाम लग रही है। लेकिन इस आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है।

नई दिल्‍ली (स्‍पेशल डेस्‍क)। गोरखालैंड को लेकर दार्जिलिंग में छिड़ा विवाद खत्‍म होने का नाम नहीं ले रहा है। सड़कों पर लगातार इसको लेकर प्रदर्शन उग्र होता जा रहा है। उत्तर बंगाल के पहाड़ी इलाकों के स्कूलों में राज्य सरकार द्वारा बांग्ला की पढ़ाई अनिवार्य किए जाने के बाद शुरू हुआ विरोध अब बड़ा का रूप ले चुका है। वहीं राज्‍य सरकार फिलहाल इस विवादा को शांत करने में नाकाम होती दिखाई दे रही है। ऐसा भी नहीं है कि यह विवाद नया है बल्कि इस विवाद के चलते पहले भी यह क्षेत्र सुलगता रहा है। मौजूदा विवाद के बाद पुलिस ने कुछ लोगों को भी गिरफ्तार किया है। फिलहाल गोरखालैंड की मांग के नाम पर हो रहे आंदाेलन के चलते वहां पर काफी संख्‍या में पर्यटक फंस गए हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन में आंदोलनकारी अब तक कई वाहनों, थानों सेरिकल्‍चर के ऑफिस को आग के हवाले कर चुके हैं। पुलिस लगातार प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए आंसूगैस और लाठीचार्ज का इस्‍तेमाल कर रही है। कुल मिलाकर यहां पर हालात मुश्किल होते जा रहे हैं।

मुश्किल होते हालात

वहीं पिछले दिनों गोजमुमो सुप्रीमो विमल गुरुंग के घर और कार्यालय पर छापामारी के दौरान पुलिस द्वारा काफी संख्‍या में तीर-धनुष, खुखरी और बम बरामद किए जाने के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने पश्चिम बंगाल के साथ वार्ता से पहले दार्जिलिंग समेत पूरे इलाके में लगी हुई सेना और अर्द्धसैनिक बल हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि वह केंद्र से वार्ता के लिए तैयार है। मौजूदा बवाल पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी राज्‍य की मुख्‍यमंत्री से बात की है ओर उनकी मांग पर अर्द्धसैनिक बलों की और टु‍कडि़यां भेजने पर सहमति जताई है। इलाके में छिड़े बवाल के बावजूद ममता बनर्जी के सुर में न तो काई नरमी आई है और न ही वह पीछे हटने को तैयार हैं।

क्‍या है पूरा विवाद

पहाड़ी क्षेत्र की इस लड़ाई की शुरुआत 1986-88 में हुई थी जब माकपा ने यह नारा देते हुए कहा था कि 'कंचनजंगा के पहाड़ों पर खून के दाग क्यों हैं, राजीव गांधी जवाब दें'। उसी वक्त माकपा के नेपाली पहाड़ी कैडरों ने हथियार उठाकर सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखालैंड की मांग शुरू की थी। 1 महीने चले इस रक्तपात को नेपाली पहाड़ियों ने ‘भाईमारा लड़ाई’ का नाम दिया था। इसमें 1200 से अधिक लोगों के मारे गए थे। इसमें 10 हजार से अधिक घर जलाए गए और सैंकड़ों लोगों को टाडा के तहत जेल में डाला गया था। दशकों पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई तक नेपाली भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए पहाड़ पर हिंसक झड़पें देख चुके हैं। गोरखालैंड की मांग अस्वीकार कर देने पर 1987 में राजीव गांधी की दार्जिलिंग में हुई सभा में महज 150 लोग ही पहुंचे थे। 2008 में सुभाष घीसिंग को भी दार्जिलिंग छोड़कर उस समय भागना पड़ा था जब स्थानीय लोगों ने उन पर नेपाली अस्मिता और धार्मिक आधार पर फूट डालने की कोशिश का आरोप लगाया।

गोरखालैंड टेरिटोरियल ऐडमिनिस्ट्रेशन की स्थापना

2011 में राज्य की सत्ता में आने के बाद ममता ने गोरखालैंड की आग को शांत करने के लिए गोरखालैंड टेरिटोरियल ऐडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) की स्थापना की थी। वहीं, जीजेएम ने निकाय चुनावों में चार में से तीन सीटों पर अपना परचम लहराया। गुरुंग ने अब एक बार फिर बांग्ला भाषा का विरोध व अलग राज्य के मुद्दे को उछाल दिया है। 1960-61 के दशक में पूर्व सीएम विधान चंद्र रॉय ने पूरे दार्जिलिंग में बांग्ला को अनिवार्य भाषा बनाने की कोशिश की थी, तब भी उन्हें जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था।

क्‍या कहती हैं ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहाड़ पर हुई हिंसा की तुलना आतंकी क्रियाकलापों से की है। उनका कहना है कि वह पहाड़ पर शांति लाने के लिए अपना खून देने को भी तैयार हैं, लेकिन किसी भी सूरत में इसको वह अशांत नहीं होने देंगी। हालांकि उन्‍होंने कुछ लोगों पर इशारों ही इशारों में राजनीति के नाम पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाया है। उन्‍होंने आरोप लगाया है कि दार्जिलिंग में खत्‍म करने के लिए षड़यंत्र रचा जा रहा है।

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बातचीत की कोशिश नहीं कर रही हैं सीएम

दैनिक जागरण की स्‍पेशल डेस्‍क से बात करते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का कहना था कि मौजूदा विवाद की सबसे बड़ी वजह यही है कि राज्‍य सरकार ने बांग्‍ला भाषा को गोरखाओं पर थोपने की कोशिश की है। वहीं गोरखाओं को लगता है कि इस तरह से राज्‍य सरकार उनकी मूल संस्‍कृति को नष्‍ट करने का प्रयास कर रही है। यही वजह है कि विवाद इतना अधिक बढ़ गया है। इसकी दूसरी वजह यह भी है कि राज्‍य की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी इस विवाद को सुरक्षाबलों की मौजूदगी से दबा देना चाहती है, वह इसको सुलझाने को लेकर बातचीत की कवायद नहीं कर रही हैं। इस वजह से भी यह विवाद बढ़ गया है। यह पूछे जाने पर कि पिछली सरकारों के मुकाबले इस बार य‍ह मुद्दा क्‍या ज्‍यादा उग्र हुआ है, उनका कहना था कि यह बात सही है। उनके मुताबिक सरकार में आने से पहले ममता भी गोरखाओं की पक्षधर हुआ करती थीं, लेकिन सरकार में आते ही उनके सुर में बदलाव आ गया है।

भाजपा के लिए भी मुश्किलें

केंद्र के हस्‍तक्षेप के मुद्दे पर प्रदीप सिंह का कहना था कि गोरखालैंड विवाद ने भाजपा के सामने भी मुश्किलें पैदा कर दी हैं। भाजपा पश्चिम बंगाल में अपना जनाधार मजबूत करना चाहती है। लेकिन यदि वह गोरखालैंड का समर्थन करती है तो उसको बाकी राज्‍य के लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। लिहाजा वह इस पर अभी खामोश है और राज्‍य में लॉ एंड आर्डर की बात बताकर टाल रही है। वहीं दूसरी और भाजपा के इस क्षेत्र से सांसद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से ही संसद में पहुंचे हैं। लिहाजा भाजपा के लिए यहां पर काफी बड़ा धर्म संकट आ खड़ा हुआ है। उनके मुताबिक पश्चिम बंगाल में ममता का जनाधार है लेकिन इस क्षेत्र में भाजपा का जनाधार है। लिहाजा ममता यहां पर भाजपा की साजिश बताकर इस मुद्दे को टाल रही है। इसके पीछे यह भी एक वजह है कि पिछले चुनाव में मांग के बावजूद भी गोजमो ने टीएमसी उम्‍मीद्वार का समर्थन नहीं किया था।

गोरखालैंड में भाजपा का जनाधार

गौरतलब है कि भाजपा के पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह यहां से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन के बाद लोकसभा के लिए चुने गए थे। उन्‍होंने यहां की सीट सीपीआई एम के अपने प्रतिद्वंदी से करीब ढाई लाख मतों से जीत दर्ज की थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने यहां पर अपने उम्‍मीद्वार को समर्थन देने की मांग गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से की थी, लेकिन उन्‍होंने टीएमसी की मांग को खारिज करते हुए अपना समर्थन भाजपा उम्‍मीद्वार एसएस अहलूवालिया को दिया दिया था। अहलूवालिया ने यहां से टीएमसी उम्‍मीद्वार बाईचांग भूतिया को करीब दो लाख मतों से हराया था।

जीजेएम नेताओं की दिल्‍ली में मुलाकात

नेताओं की गिरफ्तारी और पुलिस के छापे के बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। इस सिलसिले में जीजेएम के महासचिव रोशन गिरी और दार्जिलिंग से सांसद व केंद्रीय राज्यमंत्री एसएस अहलुवालिया ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। अलग राज्य की मांग पर अपने रुख को और कड़ा करते हुए जीजेएम ने सोमवार को प्रस्तावित गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के मुद्दे पर त्रिपक्षीय बैठक में हिस्सा नहीं लेने का फैसला किया है। रोशन गिरी ने राजनाथ सिंह को बताया कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर दार्जिलिंग के स्कूलों में बांग्ला भाषा को अनिवार्य बनाकर गोरखा अस्मिता को नष्ट करने की कोशिश कर रही है।

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बदनाम करने की साजिश का आरोप

उन्होंने आरोप लगाया कि गोरखा नेताओं के घरों और दफ्तरों पर खुद ही हथियार रखकर बंगाल पुलिस उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रही है। गोरखा समुदाय के खिलाफ पुलिस का दमन चरम पर है। आने वाले दिनों में स्थिति और भी खराब हो सकती है। उन्होंने मांग की कि हालात को काबू में करने के लिए केंद्र सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। रोशन गिरी ने साफ कर दिया कि अब अलग गोरखा राज्य बनने तक उनका जारी रहेगा और गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन पर होने वाली त्रिपक्षीय बातचीत का कोई मतलब नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि बांग्ला भाषा को स्कूलों में अनिवार्य बनाने वाली अधिसूचना को राज्य सरकार को वापस लेना ही होगा।

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Web Title:jagran special Darjeeling hills echo with the sound of Gorkhaland demand(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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