अखिलेश सरकार के एक साल: बढ़ी उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती

Publish Date:Fri, 15 Mar 2013 01:40 PM (IST) | Updated Date:Fri, 15 Mar 2013 02:10 PM (IST)
अखिलेश सरकार के एक साल: बढ़ी उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती
अखिलेश यादव उस पिता के पुत्र हैं, जो यूपी की सियासत के पितामह बन चुके हैं, जिनकेपिछले 46 साल विधानसभा-लोकसभा में गुजरे हैं और जिनके बारे में यह कहा जाता है कि चुनाव प्रचार के दौरा

अखिलेश यादव उस पिता के पुत्र हैं, जो यूपी की सियासत के पितामह बन चुके हैं, जिनकेपिछले 46 साल विधानसभा-लोकसभा में गुजरे हैं और जिनके बारे में यह कहा जाता है कि चुनाव प्रचार के दौरान निर्वाचन क्षेत्र में हेलीकाप्टर की लैंडिंग के साथ ही वह वहां का नतीजा बता दिया करते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव से बेहतर भला और कौन इस राजनीतिक सच को समझता होगा कि चुनाव हवा पर जीते जाते हैं और सरकार के कामकाज की पैमाइश जनधारणा के स्केल पर होती है। उन्हें इस बात का इल्म भी अच्छी तरह से होगा कि उनके तमाम अच्छे कामों पर जब तब किसी न किसी जिले में होने वाला दंगा या हिंसा की कोई बड़ी वारदात भारी पड़ जा रही है। ऐसे में इस बात की चर्चा कम होती है कि अखिलेश यादव बेरोजगारी भत्ता बांट रहे हैं, उन्होंने कन्या विद्याधन योजना शुरू कर दी है, स्कूली लड़कों के हाथों में लैपटाप पहुंचना शुरू हो गए हैं या यूपी निवेश की जमीन तैयार हो रही है और वह एक जनता की पहुंच वाले सीएम हैं, चर्चा ज्यादा होती है कभी कोसीकला दंगे की, कभी फैजाबाद दंगे की, कभी लखनऊ में क‌र्फ्यू की और कभी कुंडा कांड की।

बड़ी अपेक्षाओं से मायूसी का खतरा

ऐसा भी नहीं है कि यूपी में पहले कभी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए या कोई हिंसा नहीं हुई। पहले भी होती रही हैं। हो सकता है कि यह सरकारी आंकड़ा भी कतई सच हो कि अखिलेश सरकार के एक साल के कार्यकाल में क्राइम रेट पूर्ववर्ती सरकार के पांच साल के मुकाबले कम हुआ है लेकिन इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिले विशाल बहुमत के पीछे अखिलेश यादव का करिश्माई व्यक्तितत्व था। लोगों को लग रहा था कि अखिलेश नौजवान हैं। उनकी अपनी अलग सोच है। उनके साथ पढ़े लिखे नौजवानों की उर्जावान टीम है। एक बड़ा तबका उनके शपथ ग्रहण के दिन से ही अखिलेश सरकार से चमत्कार की उम्मीद लगा बैठा है और अक्सर जब अपेक्षाएं बड़ी पाल ली जाती हैं तो मायूसी का खतरा बढ़ ही जाता है। शायद यही वजह है कि जब किसी जिले से दंगे या हिंसा की खबर आती है तो लोग तलाशते हैं सीएम अखिलेश यादव के चेहरे में वह चेहरा, जो चुनाव के दौरान यह वादा किए होता है कि हम आपको देंगे एक तरक्की पसंद यूपी। जहां के नौजवानों के हाथों में हथियार नहीं होंगे, उसकी जगह उनकी आंखों में बड़े सपने होंगे। लोग तलाशते हैं, उस अखिलेश यादव को जिनमें उन्हें एक कड़क प्रशासक नजर आता था। समाजवादी पार्टी को लेकर एक धारणा बनी हुई थी कि उसकी सरकार बनने पर गुंडागर्दी बढ़ जाती है और खासतौर से उसके लोग ही दबंगई पर उतर आते हैं लेकिन अखिलेश के चेहरे ने यह गारंटी दी थी कि अब समाजवादी पार्टी बदल चुकी है। इसी गारंटी ने ही चुनाव के मौके पर शहर से लेकर देहात तक में ज्यादातर की पहली पसंद सपा को बना दिया था, लेकिन जब कोई पंडित सिंह किसी जिले में अपने लाव-लश्कर के साथ किसी सीएमओ के घर पर चढ़ाई कर देता है या कुंडा जैसा जब कोई कांड होता है तो लोग इस सरकार और पिछली सरकार के क्राइम रेट की तुलना के बजाय तो उस अखिलेश यादव को तलाशते हैं, जो अपनी हर सभाओं में यह दोहराते थे कि दागियों, दबंगों के लिए न तो पार्टी के अंदर कोई जगह है और न ही बाहर उनके लिए किसी तरह की सहानुभूति है। अखिलेश यादव को जब लोग कड़े फैसले लेने से बचते देखते हैं या लिए गए फैसले पर पलटते देखते हैं, तो वह तलाशते हैं, उस अखिलेश यादव को जो चुनाव के मौके पर राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह किए बिना इस फैसले पर अडिग हो जाता है कि बाहुबली डीपी यादव के लिए उसकी पार्टी में कोई जगह नहीं है।

जब पूर्ववर्ती सपा सरकारों की तरह इस सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों में आम लोगों को कोई खास फर्क नहीं दिखता तो लोगों को लगता है कि यह उनकी कल्पना की अखिलेश सरकार नहीं है। उन्होंने तो एक नौजवान सरकार का सपना बुना था, जिसमें सीएम से लेकर मिनिस्टर तक नौजवान होंगे और जो यूपी को बदल देने के जोश से लबरेज होंगे।

उम्मीद की साइकिल से पूरे होते वादे

ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव के एक साल के कार्यकाल में कुछ हुआ ही नहीं। साल 2012 में होर्डिगों पर लिखा नारा उम्मीद की साईकिल 2013 में पूरे होते वादे में तब्दील हो चुका है। इसमें कोई शक नहीं कि अखिलेश यादव के पास यह कहने को पुख्ता जमीन है कि उन्होंने चुनाव किए गए ज्यादातर वादों को पूरा कर दिखाया है। लैपटाप बंटने का सिलसिला शुरू हो गया है। कुछ ही महीनों के अंदर टैबलेट भी बंटना शुरू हो जाएंगे। कन्या विद्या धन योजना शुरू हो चुकी है। बेरोजगारी भत्ता बंटने लगा है। तमाम दूसरे वादों को भी पूरा करने काम तेजी के साथ चल रहा है। बजट में सूबे में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ाने पर जोर दिया गया है, जिससे नए यूपी के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा। इसी भरोसे अखिलेश यह दावा कर रहे हैं कि उनकी सरकार ने एक साल में इतना काम डाला है तो चार साल में यूपी कितना बदल जाएगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। हो सकता है कि यह सच साबित हो, लेकिन एक सच यह भी है कि पिछले साल 15 मार्च को जब अखिलेश यादव ने देश के सबसे बड़े राच्य के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी तो उस वक्त उनके सामने यूपी को बदलने की चुनौती तो थी, लेकिन जनता की कसौटी पर कसे जाने का जोखिम नहीं था। लेकिन ठीक एक साल बाद जब वह जनता से मुखातिब होंगे तो उनकी सरकार के कामकाज जनता की कसौटी पर होंगे। आखिर एक साल का वक्त खासा मायने रखता है और इस बीच शुरू हो चुका होता है सत्ताजनित नाराजगी का दौर भी।

पावर सेंटर की छाया

एक साल के दौरान अखिलेश यादव को एक और धारणा से मुकाबिल होना पड़ा है, वह हैं कई पावर सेंटर का होना। कई मौकों पर पार्टी की तरफ से सफाई दी गई है कि सरकार में कई पावर सेंटर नहीं हैं। अखिलेश यादव ही अपने कैबिनेट सहयोगियों से विमर्श के बाद निर्णय करते हैं लेकिन इसके बावजूद यह धारणा खत्म होने का नाम नहीं ले रही रही है कि सीएम अकेले फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। कई पावर सेंटर के दबाव में अखिलेश को काम करना पड़ रहा है, इसी वजह से उनकी सरकार से जिस तरह के प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी, वह नहीं दिखा पा रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मुलायम सिंह यादव ने कई मौकों पर सरकार के कामकाज पर अंगुली उठाई। पार्टी प्रमुख के रूप में ऐसा करने का हक भी हासिल है लेकिन पार्टी प्रमुख के बयानों से सरकार की साख प्रभावित हुई और विपक्ष को यह कहने का मौका मिला कि सरकार फेल साबित हुई।

पहुंच हुई आसान

लेकिन इन सबके इतर एक साल की जो सबसे बड़ी अच्छाई कही जा सकती है, वह यह है कि सीएम तक पहुंच आसान हुई है। पूर्ववर्ती सरकार में सीएम के मिलने जुलने का दायरा बहुत सीमित था। वह पार्टी के कार्यक्रमों के अलावा केवल उन्हीं सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थी, जिनमें बतौर मुख्यमंत्री उनकी उपस्थिति बहुत अपरिहार्य होती थी। उनसे मुलाकात तो केवल उन्हीं लोगों से होती थी, जिनसे वह खुद मिलना चाहती थीं लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने फिर से जनता दर्शन कार्यक्रम शुरू किया है। तमाम सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। पार्टी मुख्यालय में हर रोज एक मंत्री की ड्यूटी लगती है, जो जनता से जुड़ी शिकायतों को सुनता है। इसमें कोई शक नहीं कि नए यूपी का जो सपना दिखाकर अखिलेश यादव सत्ता में आए थे, उसे पूरा करने के लिए अभी भी उनके पास चार साल का वक्त है। बात फिर वहीं पहुंचती है कि अखिलेश यादव उस पिता के पुत्र हैं, जिनकी सांसों में राजनीति बसती है, ऐसे में अखिलेश यादव से अच्छा और कोई नहीं जान सकता कि उम्मीदों का टूटना कितना तकलीफदेह होता है। उम्मीद है कि अखिलेश यादव ऐसा नहीं होने देंगे।

[नदीम]

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