'हरकत छोटी हो या बड़ी, बर्दाश्‍त ना करें लड़कियां'

जागोरी संस्था महिलाओं के लिए समर्पित है। हिंसा की शिकार महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में बताती है। पीडि़त महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए हमेशा प्रयासरत है। 2004 से सार्वजनिक स्थलों में महिला सुरक्षा पर शोध एवं प्रचार कर रही इस संस्था की प्रमुख गीता नम्बीशन हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि महिलाएं कैसे अपने अधिकारों को जानकर सशक्त बन सकती हैं और आत्मसम्मान के साथ समाज में जी सकती हैं।

आप जागोरी के जरिए महिलाओं को जगाने का काम कर रहीं। आपने कब और क्यों सोचा कि महिलाओं को जगाना चाहिए? इसके पीछे कोई खास घटना रही?
सत्तर के दशक के अंत में दहेज हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं के विरोध में हजारों महिलाएं सड़कों पर उतरी थीं। लेकिन इस आंदोलन की पहुंच सिर्फ शहरों तक ही सीमित नजर आई। जागोरी के संस्थापकों को लगा कि इस नारीवादी आंदोलन की पहुंच दूर-दराज के गांवों तक भी होनी चाहिए। फिर जागोरी की स्थापना के तुरंत बाद दो प्रमुख घटनाएं हुईं, जिसमें संस्था ने काफी काम किया। इनमें पहली थी, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख हत्याकांड और दूसरी घटना भोपाल की कार्बाइड गैस त्रासदी, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। जागोरी के सदस्य हिंसा के शिकार लोगों की मदद करने के लिए दंगा प्रभावित इलाकों में सक्रिय रहे। महिला समूहों और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया। इस दौरान जागोरी ने औरतों की पहचान और अधिकारों पर काम शुरू किया।

आप महिलाओं के लिए कैसे समाज की कल्पना करती हैं?
एक ऐसा समाज जहां लोग एक-दूसरे का सम्मान करें। जहां लिंग, जाति, वर्ग और मूल के आधार पर किसी के साथ भेदभाव ना किया जाए। जहां संसाधनों, आगे बढ़ने के अवसरों और बुनियादी सुविधाओं पर समाज के हर वर्ग का हक हो। जहां कोई युद्ध, हिंसा, सांप्रदायिकता न हो। जहां लड़कियां को जन्म, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा का अधिकार हो। जहां महिलाएं अपने जीवन के छोटे-बड़े निर्णय आज़ादी से ले सकें। जहां उनका अपनी आवाजाही, अपने शरीर, अपने व्यवसाय इत्यादि पर पूरा अधिकार हो। ऐसे समाज ना सिर्फ महिलाओं, बल्कि हर वर्ग के लिए बेहतर होगा।

देश के हर हिस्से में आज ज्यादातर महिलाएं खुद को असुरक्षित मानती हैं। आपको क्या लगता है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
मेरा मानना है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा का कारण है हमारे समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था, जिसको कायम रखने में पुरुषों और महिलाओं दोनों की भूमिका रही है। इस व्यवस्था के अन्तर्गत महिलाओं की जगह घर की चार दीवारी के अंदर है। इसी तरह महिलाओं की सार्वजनिक स्थलों तक भी सीमित पहुंच है और समय की भी पाबन्दी है। हिंसा और हिंसा का डर महिलाओं को इन दायरों में सीमित रखता है और उनकी आवाजाही पर नियंत्रण सुनिश्चित करता है। हमें समाज की मानसिकता को बदलना होगा साथ में इस डर को महिलाओं के दिमाग से निकालना होगा, तभी वे अपने आपको सुरक्षित महसूस कर पाएंगी और निडर होकर बाहर निकल पाएंगी।

क्या आप मानती हैं कि हमारे समाज में ज्यादातर लोग किसी महिला पर अपराध होने के बाद रिएक्ट करते हैं? अगर आज से ही महिला सुरक्षा के मुद्दे पर सभी काम करना शुरू कर दें, तो आने वाले कल में महिलाओं को हम एक बेहतर समाज दे सकते हैं?
हां, लोग देर से रिएक्ट करते हैं। फिर उनकी प्रतिक्रिया कुछ ऐसी होती है- वे पूछने लगते हैं कि 'जब हिंसा हुई तो तब औरत क्या कर रही थी?' 'वह कहां थी?' 'उसने क्या पहन रखा था?' 'वह किसके साथ थी?' इसके बाद महिला के साथ हुई हिंसा या घटना के लिए उसे खुद ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। मेरा मानना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने आसपास हो रही हिंसा का विरोध करना चाहिए। हरकत छोटी हो या बड़ी यह बताना जरूरी है कि ये हरकत बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर हर शख्स और अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें, तो पूरा माहौल बदल जाएगा।

आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने वाले ज्यादातर पहचान के लोग ही होते हैं, इस स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है?
यह सही है कि महिलाएं अपने ही घरों में हिंसा का शिकार हो रही हैं, पर कुछ महिलाएं इस हिंसा से बचने के लिए कदम उठाने लगी हैं। अप्रैल 2016 से मार्च 2017 तक 752 महिलाओं ने जागोरी के हेल्पलाइन पर संपर्क किया। ये सभी महिलाएं अपना हक और आत्मसम्मान की जिंदगी जीना चाहती हैं। महिलाओं के खिलाफ घरों में होने वाली हिंसा का मुकाबला करने के लिए हमें रणनीति और एकजुटता की जरूरत है। इसमें स्वयं के लिए खड़ा होना और बोलना शामिल है। साथ ही महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाने चाहिए। जागोरी ऐसे कई अभियानों पर काम कर चुकी है।

महिलाओं को कैसे इतना सशक्त बनाया जाए कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए किसी दूसरे पर निर्भर ना रहना पड़े?
महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देकर सशक्त बनाया जा सकता है। हमें महिलाओं को उन कानूनों के बारे में जानकारी देनी होगी, जो उनकी सहायता और रक्षा करते हैं। हमें पीडि़त महिलाओं को अन्य महिला समूहों और संस्थाओं के साथ जोड़कर उन्हें सामूहिक कार्रवाई के लिए प्रोत्साहित करना होगा। महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाना और खुलकर बोलने के लिए प्रोत्साहित करना होगा, तभी महिलाएं सशक्त हो सकती हैं।
जागोरी जैसी तमाम संस्थाएं आज महिला सुरक्षा की दिशा में काम कर रही हैं। लेकिन बदलाव तभी आ सकता है, जब पूरा समाज मिलकर इस दिशा में काम करे। महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ ठोस कदम उठाए। फिर चाहे वो हिंसा बस, ट्रेन, सूनी सड़क या फिर हमारे पड़ोस के घर में हो। हमें समय रहते इस दिशा में काम करना होगा अलार्म बजने से पहले जागो रे...!

Tata Tea Jaago Re initiative in association with Jagran

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