जी हां, बदलेंगे आप तो बदल जाएंगी अखबारों की सुर्खियां

वो दिन कैसा होगा, जब अखबार की सुर्खियां होंगीं... 'विश्व कप फुटबाल के फाइनल में भारत का मुकाबला ब्राजील से', 'अब हम दालें आयात नहीं, निर्यात करेंगे', 'इतनी बिजली बनी कि पड़ोसी मुल्क को बेची' या फिर 'अब राजस्थान के किसान लेंगे साल-भर में चार फसल'। यकीन मानें, ऐसे दिन दूर नहीं। मजेदार बात तो यह है कि इन हेडलाइंस को पैदा करने की कूव्वत भी हम में ही है।

देखा जाए तो समाज में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जिन पर समस्‍या खड़ी होने के बाद असर होता है - फिर वो अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और कदम उठाते हैं। अपनी और दूसरों की जिंदगी को बचाने और बनाने के लिए एक्टिव होते हैं। दूसरे वो, जो हालात बिगड़ने से पहले ही संभलते हैं और बेहतरी के लिए काम शुरू कर देते हैं। ये जो दूसरे किस्म के लोग होते हैं, ये ही अखबारों की सुर्खियां बदलने की ताकत रखते हैं। ऐसे लोग हादसे, असफलता और हालात बिगड़ने से पहले ही सक्रिय हो जाते हैं, इसलिए इन्हें अंग्रेजी में प्री-एक्टिविस्ट कहते हैं। पहले एक्टिव होकर वक्त की धारा बदलने वाले ये लोग समाज, देश और दुनिया को सही दिशा में ले जाते हैं। इनकी खूबी होती है कि ये समस्‍याओं को छोटे स्तर पर ही रोक लेते हैं।

वैसे देश में 'प्री-एक्टिविस्‍ट' लोगों की कमी नहीं है, लेकिन हमारा देश इतना विशाल है कि ये जितने ज्यादा होंगे, उतना अच्छा होगा। जब समस्या की आहट से पहले सक्रिय होने वाले ऐसे लोगों की कमी होती है तो समस्‍याएं धीरे-धीरे विकराल हो जाती हैं। मसलन, बीती गर्मियों में महाराष्‍ट्र के कई इलाकों में पेयजल संकट इतना बढ़ गया था कि वहां ट्रेन से पानी पहुंचाना पड़ा। दूसरी ओर, 'जल पुरुष' कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह ने राजस्थान में पहले ही इस स्थिति को भांप लिया था और जल संरक्षण के काम में जुट गए थे।

राजेंद्र सिंह ऐसे प्री-एक्टिविस्‍ट हैं, जो वाकई सूखे का अलार्म बजने से पहले ही जाग गए थे। हिंदी लिटरेचर में पोस्‍ट ग्रेजुएट राजेंद्र सिंह ने राजस्‍थान में 1980 के दशक में पानी की समस्या के समाधान की दिशा में काम करना शुरू किया। उन्होंने बारिश के पानी को धरती के भीतर पहुंचाने की प्राचीन भारतीय पद्धति को ही आधुनिक तरीके से अपनाया। उन्‍होंने गांव वालों की मदद से जगह-जगह पर छोटे-छोटे पोखर बनाने शुरू किए। ये छोटे-छोटे पोखर बारिश के पानी से लबालब भर जाते हैं और फिर इस पानी को धरती धीरे-धीरे सोख लेती है। इससे इलाके में जमीन के नीचे के पानी का स्‍तर बढ़ता चला जाता है।

शुरुआत में कुछ लोगों ने उनका यह कहकर मजाक बनाया कि इन छोटे-छोटे पोखरों से कितने लोगों की प्‍यास बुझेगी? कितने खेतों को पानी मिलेगा? लेकिन राजेंद्र सिंह ने अपनी कोशिश जारी रखी। जल संचय पर काम बढ़ता गया। इसके बाद गांव-गांव में जोहड़ बनने लगे और बंजर धरती पर हरी फसलें लहलहाने लगीं। अब तक जल संचय के लिए करीब साढ़े छह हजार से ज्‍यादा जोहड़ों का निर्माण हो चुका है और राजस्थान के करीब एक हजार गांवों में अब पानी की दिक्कत नहीं होती। राजेंद्र सिंह ने जल संरक्षण उपायों के जरिए राजस्थान के अलवर शहर की तो तस्वीर ही बदल दी है। गर्मियों में जहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते थे, वहां आज पानी की कोई समस्‍या नहीं है।

ऐसे कई काम हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत है। अशिक्षा हमारे देश के कुछ हिस्सों में एक बड़ी समस्‍या है। स्‍कूलों में टीचरों की कमी इसकी बड़ी वजह है। उडुपी के 94 वर्षीय टोनसे केम्मान्नु श्रीनिवास राव ने साबित किया है कि रिटायर हो चुके टीचर इस कमी को दूर करने में अपना योगदान दे सकते हैं। रिटायर होने के 38 साल बाद भी राव छात्रों को शिक्षा दे रहे हैं। छात्रों को शिक्षा देना राव का सिर्फ जुनून ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का मकसद भी है। हालांकि इस उम्र में उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा है, लेकिन इसके बावजूद राव रोजाना स्कूल जाकर कई घंटों तक अपने छात्रों और टीचरों के साथ अपना ज्ञान साझा करते हैं।

इसी तरह ऐसी कई समस्याएं होती हैं, जिन्हें हम विकराल होने से पहले समय रहते रोक सकते हैं। इनमें महिलाओं की सुरक्षा, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, बढ़ता प्रदूषण, ट्रैफिक जाम आदि शामिल हैं। ऐसी समस्याओं के मद्देनजर अभी से सुध लें तो हम खूब काम कर सकते हैं और दिक्कतों को त्रासदी का रूप लेने से रोक सकते हैं। बस जरूरत है आंख, कान और नजरिया खुला रखने की। छोटी-छोटी समस्‍याओं को देखकर मुंह नहीं फेरा तो समझ जाइए आप भी हैं अखबारों की हेडलाइंस बदलने की राह पर हैं। फिर तय मानिए, आप भी जाग रहे हैं, अलार्म बजने से पहले....

Tata Tea Jaago Re initiative in association with Jagran

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