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फिल्‍म रिव्‍यू: 'दंगल', मिसाल से कम मंजूर नहीं (4.5 स्‍टार)

Publish Date:Thu, 22 Dec 2016 10:23 AM (IST) | Updated Date:Thu, 22 Dec 2016 12:49 PM (IST)
फिल्‍म 'दंगल' के एक दृश्‍य में आमिर अपनी बेटियों के साथफिल्‍म रिव्‍यू: 'दंगल', मिसाल से कम मंजूर नहीं (4.5 स्‍टार)
'दंगल' आमिर खान एक और दमदार फिल्म है। वजनी महावीर फोगाट के रूप में उनका कायांतरण अलहदा है। पिता, कोच और अपने सपने साकार की बेचैनी दिल में लिए सालों से जी रहे शख्‍स की भूमिका को उन्

-अमित कर्ण

प्रमुख कलाकार: आमिर खान, साक्षी तंवर और फातिमा सना शेख

निर्देशक: नीतेश तिवारी
संगीत निर्देशक: प्रीतम
स्टार: साढ़े चार स्टार

‘दंगल’ साल की बहुप्रतीक्षित बायोपिक फिल्म अनुमानित थी। यह उस कसौटी पर तमाम कलाकारों, फिल्मकार और फिल्म से जुड़े हर विभाग के लोगों के अथक प्रयास से पूर्णत: खरी उतरी। यह मनोरंजन और मैसेज का मारक मिश्रण बन उभर और निखर कर सभी के सामने आई। यह सफलता और लोकप्रियता के अप्रतिम मानक बनने के पीछे की कड़ी तपस्या, अनुशासन, त्याग, एकाग्रता और एकाकी जीवन की अपरिहार्यता को असरदार तरीके से पेश करती है। यह मानव जीवन के मुकम्मल मकसद पर रौशनी डालती है। वह यह कि जिंदगी में मिसाल बनने से कम कुछ भी मत स्वीकारो। बनना है तो प्रतिमान बनो। खुद के लिए। अपनों के लिए। समाज और राष्ट्र के लिए।

गीता-बबीता और उनके रेसलर पिता महावीर फोगाट के विजुअल दस्तावेज के जरिए फिल्म परिवार, समाज और सिस्टम और सपनों की बहुपरतीय व सघन पड़ताल है। फोगाट परिवार ने हिंदुस्तान का आन, बान, शान और मान के लिए क्या और कितना कुछ कुर्बान किया, यह उसकी ऐतिहासिक गाथा बन गई है। चमत्कारिक उपलब्धि हासिल करने के पीछे खुद, अपने, बेगानों, आलोचकों और अजनबियों की समग्र भूमिका को त्रुटिहीन सिनेमाई संवाद के जरिए स्थापित किया गया है। परिजन अगर अपने बच्चों की प्रतिभा को पहचान उन्हें उसी दिशा में आगे बढ़ने को प्रेरित करें तो यह सही है या गलत, यह जाहिर होता है। कहानी में परिजनों के उस अरमान को जायज ठहराने की ठोस वजह हैं।

इसकी कथाभूमि हरियाणा के भिवानी जिले का बिलाली गांव है। भिवानी अब वह जिला बन चुका है, जो देश को थोक के भाव में खेल प्रतिभाएं दे रहा है। बॉक्सर विजेंदर कुमार भी वहीं से हैं। बहरहाल ‘दंगल’ 1988 से शुरू होती है। पहलवान महावीर फोगाट रेसलिंग में देश का नाम रौशन करना चाहता है। वह उसमें स्वर्ण पदक लाना चाहता है। लेकिन परिवार, समाज और सिस्टम के दकियानूसी रवैये के चलते वह सपना अधूरा रह जाता है। शादी और सरकारी नौकरी कर वह आम मध्यवर्ग की तरह जीने लगता है। साथ में अखाड़ा भी चलाता है। बेटे की आस में उसकी चार बेटियां होती हैं। वह निराश हो जाता है कि उसके पास तो उसका सपना पूरा करने व देश का सिर फख्र से ऊंचा करने वाली विरासत भी आगे नहीं है। उसकी वह निराशा बड़ी जल्दी दूर हो जाती है। दोनों बाल बेटियों गीता-बबीता की रगों में भी पहलवानी है, उसे इसका पता चलता है। फिर वह बिना किसी की परवाह किए उन्हें नामी पहलवान बनाने की आग में झोंक देता है। गीता-बबीता उस तपिश को झेल कुंदन की तरह बाहर निकलती हैं।

कैसे? निर्देशक नीतेश तिवारी ने पीयूष गुप्ता, श्रेयस जैन, निखिल मेहरोत्रा के साथ मिलकर इस महागाथा को रोचक, प्रेरक और रोमांचक तरीके से पेश किया है। नीतेश विज्ञापन जगत से रहे हैं। लिहाजा किस्सागोई को उन्होंने समस्या-समाधान के प्रारूप में पर्दे पर जीवंत किया है। हरियाणा जैसे इलाके में लिंगभेद सबसे ज्यादा रहा है। वहां लड़कियां सिर्फ गाय, गोबर और चूल्हा-चौका संभालने तक सीमित मानी जाती हैं। ऐसे में गीता-बबीता को बचपन से लेकर जवानी तक किन चुनौतियों से रूबरू होना पड़ता हैं, नीतेश व उनकी टीम ने उन्हें रोचक प्रसंगों के तौर पर गढ़ा है।

फिल्म जीवन से बड़े मुद्दे को डील करती है, पर नीतेश ने ट्रीटमेंट को लेष मात्र भी गंभीर नहीं होने दिया है। उसकी जगह ह्यूमर और इमोशन का साथ लिया गया है। वैसे भी हरियाणा की हवा में ह्यूमर है। बाल गीता-बबीता का नासमझ से समझदार में रूपांतरण हो या युवा गीता का अहंभाव, फिल्मकार ने तसल्ली और प्रभावी ढंग से कार्य, कारण और निदान जाहिर किया। बल्लू सलूजा की एडीटिंग धारदार है। उन्होंने पटकथा इंच मात्र भी बोझिल नहीं होने दी है। सत्यजित पांडे और सेतु के कैमरा ने हरियाणा की माटी को उसी रंग-रूप में रखा है। पूरी फिल्म का रंग भूरी मिट्टी की रंग सरीखी है। इंटरवल बाद फिल्म रेसलिंग की तकनीकियों को बड़ी बारीकी से दिखाती है। वह चीज ‘एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ में गुम थी। उसकी पर्याप्त खुराक ‘चक दे इंडिया’ में थी। वहां खेल की तकनीकियों से पुरजोर रोमांच पैदा किया गया था। इस लिहाज से ‘दंगल’ उस फिल्म का विस्तार कहा जा सकता है। रेसलिंग की पूरी डिटेलिंग फिल्म में है।

यह आमिर खान की एक और दमदार फिल्म है। वजनी महावीर फोगाट के रूप में उनका कायांतरण अलहदा है। पिता, कोच और अपने सपने साकार की बेचैनी दिल में लिए सालों से जी रहे शख्स की भूमिका को उन्होंने जीवंत बना दिया है। पर्दे पर आमिर खान नहीं, महावीर फोगाट नजर आ रहे थे। उनके सहकलाकारों ने भी उन्हें पूरी टक्कर दी। वह चाहे बाल गीता-बबीता बनीं जायरा वसीम- सुहानी भटनागर हों या युवा गीता-बबीता के रोल में फातिमा सना शेख- सान्या मल्होत्रा। दोनों बहनों के चचेरे भाई की भूमिका निभाने वाले का काम भी उम्दा है। नेशनल कोच बने गिरीश कुलकर्णी के अहंकार और काइंयापन को गिरीश कुलकर्णी ने बखूबी जाहिर किया है। ‘अग्ली’ में इंस्पेक्टर के रोल में भी उनकी खासी सराहना हुई थी।

दिलचस्प चीज यह देखने को मिली कि आमिर की मौजूदगी में फिल्म उनकी न होकर फातिमा सना शेख की हो गई है। ठीक उस तरह, जैसी ‘तारे जमीं पर’ में ईशान अवस्थी के रोल में दर्शील सफारी हो गए थे। फिल्म का गीत-संगीत असरदार और कहानी को आगे बढ़ाने वाला है। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स और बाकी वर्ल्ड चैंपियनशिप को दिखाने में जो वीएफएक्स का इस्तेमाल हुआ है, वह उच्चस्तरीय एहसास देता है। ऐसी फिल्में अपार धीरज की मांग करती हैं। तभी इसके निर्माण में दो साल लगे हैं। फिल्म देखने के बाद लगा वक्त न्यायोचित लगता है। इसमें अगला नेशनल अवार्ड जीतने की तमाम खूबियां हैं।

अवधि- 161 मिनट

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Web Title:Dangal Film Review(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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