PreviousNextPreviousNext

तीसरी ताकत

Publish Date:Thu, 31 Oct 2013 05:27 AM (IST) | Updated Date:Thu, 31 Oct 2013 05:30 AM (IST)

सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर दिल्ली में एकत्रित हुए एक दर्जन से अधिक राजनीतिक दल अपनी एकजुटता कायम रखते हुए देश को कोई ठोस विकल्प दे सकेंगे, इसमें संदेह है। संदेह का कारण केवल यह नहीं है कि वामपंथी दलों की ओर से आयोजित सांप्रदायिकता विरोधी सम्मेलन में विभिन्न दलों के नेता अलग-अलग सुर में बोले, बल्कि यह भी है कि उनका कोई स्पष्ट एवं ठोस एजेंडा नजर नहीं आ रहा है। सांप्रदायिकता के विरोध में विभिन्न दलों का एक मंच पर एकत्रित होना तो आसान है, लेकिन उससे लड़ना उतना ही मुश्किल, क्योंकि तमाम राजनीतिक दल सांप्रदायिकता की मनमानी व्याख्या करने में लगे हुए हैं। कुछ राजनीतिक दलों का तो सांप्रदायिकता विरोधी चिंतन इतना दूषित है कि वे खुद ही सांप्रदायिक दल में तब्दील हो गए नजर आते हैं। बेहतर हो कि सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए तैयार राजनीतिक दल पहले इस पर एकमत हो जाएं कि सांप्रदायिकता है क्या और पंथनिरपेक्षता को मजबूत करने के लिए क्या किए जाने की आवश्यकता है? यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कई राजनीतिक दल जिस बेढब तरीके से पंथनिरपेक्षता की पैरवी करते हैं उससे कुल मिलाकर सांप्रदायिकता को ही बढ़ावा मिलता है। सांप्रदायिक शक्तियों का मुकाबला करने के लिए एक मंच पर आए राजनीतिक दल यदि कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई तीसरी ताकत बनना चाहते हैं तो उनके लिए यह आवश्यक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य है कि वे किसी साझा कार्यक्रम पर सहमत हों और अपनी नीतियों को स्पष्ट करने के साथ ही नेता का भी चयन करें। उन्हें मिलकर चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। यदि वे यह सब कुछ नहीं करते तो इससे आम जनता को यही संदेश जाएगा कि वे मौकापरस्ती की राजनीति कर रहे हैं।

यह कोई तर्क नहीं, बल्कि मौके की ताक के लिए ली गई आड़ है कि तीसरा मोर्चा तो सदैव चुनाव के बाद बनता है। आखिर जो मोर्चा चुनाव के बाद आकार ले सकता है उसे चुनाव के पहले शक्ल देने से क्यों बचा जा रहा है? क्या इसलिए कि बाद में अपना रुख-रवैया बदलने में आसानी हो। अब यह चालाकी काम आने वाली नहीं। यह ठीक है कि विगत में भिन्न-भिन्न नामों से तीसरे मोर्चे को आकार देने में सफलता मिली है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि ऐसे वैकल्पिक मोर्चे के रूप में एक कामचलाऊ व्यवस्था ही बन सकी और वह कभी भी टिकाऊ साबित नहीं हुई। तीसरे मोर्चे के साथ एक विडंबना यह भी है कि वह कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने की बात करता है, लेकिन हर बार या तो कांग्रेस का समर्थन लेने को विवश होता है या फिर उसे समर्थन देने के लिए। क्या एक बार फिर यही करने का इरादा है? अगर तीसरे मोर्चे की बात करने वाले राजनीतिक दल जनता का भरोसा हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें गोलमोल बातें बनाना बंद करना चाहिए। ऐसे दल कभी सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए एकजुट होते हैं और कभी भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर, लेकिन अनुभव यही बताता है कि वे अवसर मिलते ही बड़ी आसानी से या तो भ्रष्टाचार से समझौता कर लेते हैं या फिर सांप्रदायिक नीतियों पर चलने लगते हैं। क्या यह विचित्र नहीं कि सांप्रदायिकता से लड़ने को तैयार दलों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर बोलने से इन्कार कर दिया?

[मुख्य संपादकीय]

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर

ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए क्लिक करें m.jagran.com परया

कमेंट करें

Web Title:Third Force

(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

पाक ने अखनूर में की गोलीबारीनौकरशाहों की मुश्किल

 

अपनी भाषा चुनें
English Hindi
Characters remaining


लॉग इन करें

यानिम्न जानकारी पूर्ण करें

Word Verification:* Type the characters you see in the picture below

 

    वीडियो

    स्थानीय

      यह भी देखें
      Close
      तीसरी ताकत
      तीसरी आंख
      ताकत का प्रदर्शन