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सख्त जवाब

Publish Date:Wed, 18 Dec 2013 05:19 AM (IST) | Updated Date:Wed, 18 Dec 2013 05:20 AM (IST)

न्यूयार्क में भारतीय राजनयिक की गिरफ्तारी और इस दौरान उनसे हुई बदसलूकी पर भारत की जवाबी कार्रवाई हर लिहाज से अप्रत्याशित है। यह स्मरण करना कठिन है कि भारत ने अपने राजनयिक के साथ हुए दोयम दर्जे के व्यवहार पर इसके पहले शायद ही कभी किसी देश के खिलाफ वैसे सख्त राजनीतिक और कूटनीतिक कदम उठाए हों जैसे उसने अमेरिका के खिलाफ उठाए। भारत दौरे पर आए अमेरिकी सांसदों के एक दल से जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष, गृहमंत्री, कांग्रेस उपाध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने मुलाकात करने से इन्कार किया वह भारत के आक्रामक रवैये का परिचायक है। भारत ने इस आक्रामकता के साथ जिस प्रकार जैसे को तैसा की नीति पर चलते हुए अमेरिकी राजनयिकों को मिलीं कई रियायतें और सुविधाएं वापस ले लीं उससे साफ है कि उसे यह महसूस हुआ कि अब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा है। अच्छा होता कि भारत ने ऐसी ही सख्ती का परिचय तब भी दिया होता जब इसके पहले अमेरिका में भारतीय राजनयिकों और नेताओं के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। चूंकि पिछली घटनाओं पर भारत ने जरूरत से ज्यादा नरमी दिखाई इसलिए देश-दुनिया को यही संदेश गया कि वह अमेरिका से बराबरी के व्यवहार की अपेक्षा नहीं करता। शायद यही कारण रहा कि न्यूयार्क में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागडे को न केवल हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार किया गया, बल्कि कपड़े उतारकर उनकी तलाशी भी ली गई। इतना ही नहीं, उन्हें कुख्यात अपराधियों के साथ बंद भी रखा गया।

अमेरिका ने देवयानी खोबरागडे के खिलाफ कार्रवाई करने में तो तत्परता दिखाई, लेकिन कोई नहीं जानता कि उसने उन पर आरोप लगाने वाली फरार चल रही नौकरानी के खिलाफ कोई कदम उठाने की आवश्यकता क्यों नहीं समझी? अमेरिका का यह रवैया ही उसकी मंशा पर सवाल खड़े करता है। अमेरिकी अधिकारियों ने देवयानी खोबरागडे पर जो आरोप लगाए हैं उनमें कुछ सत्यता हो सकती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राजनयिक का दर्जा प्राप्त किसी महिला के साथ आतंकियों सरीखा बर्ताव किया जाए और आपत्तिउठाए जाने पर नियमों के हिसाब से काम करने की दुहाई दी जाए। देवयानी खोबरागडे के साथ जो बर्ताव हुआ वह अमेरिकी अहंकार का परिचायक है। अमेरिका की ओर से इस अहंकार का परिचय एक लंबे अर्से से दिया जा रहा है और जब भी उसकी इस तरह की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए जाते हैं तो वह नियम-कानूनों अथवा सुरक्षा का तर्क देकर खुद को सही ठहराने की कोशिश करता है। अमेरिका ने जिस तरह राजनयिकों के अधिकारों के संदर्भ में वियना समझौते को मानने से इन्कार कर दिया उसके बाद भारत के पास इसके अलावा अन्य कोई उपाय नहीं रह गया था कि वह अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब दे। देखना यह है कि भारत की अप्रत्याशित कार्रवाई के प्रति अमेरिका क्या रवैया प्रदर्शित करता है? वह भले ही अपनी अकड़ दिखाता रहे, लेकिन भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी ओर से जो कदम उठाए गए हैं वे मान्य व्यवहार के दायरे में ही हों। दुनिया को यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि अमेरिका की तरह भारत भी नियम-कानूनों को ताक पर रखकर जवाबी कार्रवाई कर रहा है।

[मुख्य संपादकीय]

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