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खोखला खेद

Publish Date:Fri, 20 Dec 2013 05:53 AM (IST) | Updated Date:Fri, 20 Dec 2013 05:54 AM (IST)

भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागडे के साथ न्यूयार्क में हुए बेहूदा बर्ताव पर यह सर्वथा उचित है कि भारत सरकार ने अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी के खेद को अपर्याप्त करार दिया। ऐसे खेद का कोई मतलब नहीं जिसमें पछतावे अथवा गलती मानने का कोई भाव न हो। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि अमेरिका खोखला खेद जताकर कर्तव्य की इतिश्री न करने पाए, खासकर यह तथ्य सामने आने के बाद तो बिल्कुल भी नहीं कि देवयानी की पूर्व नौकरानी संगीता रिचर्ड के परिजनों को गुपचुप रूप से भारत से अमेरिका ले जाया गया। अमेरिका की यह हरकत किसी बड़ी साजिश की ओर तो संकेत करती ही है, भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप का भी सूचक है। आखिर अमेरिका को यह अधिकार कैसे मिल गया कि वह ऐसे किसी भारतीय शख्स के परिजनों को गुपचुप रूप से अपने देश में ले जाए जिसके खिलाफ भारतीय अदालत में कार्यवाही शुरू हो और उसका पासपोर्ट भी रद्द किया जा चुका हो? अमेरिकी अटार्नी प्रीत भरारा ने सफाई देने के क्रम में इस मामले में अमेरिका की अनावश्यक दिलचस्पी का जो विवरण दिया उससे यह स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी प्रशासन ने देवयानी की फरार बताई जा रही पूर्व नौकरानी की कोई खोज-खबर क्यों नहीं ली? यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि अमेरिका को इस पूर्व नौकरानी के बारे में पूरी जानकारी थी और वह भारत से सच्चाई छिपा रहा था। यह मानने के भी पर्याप्त कारण हैं कि संगीता रिचर्ड के परिजनों को भारत से ले जाकर उसके पास ही पहुंचा दिया गया होगा।

चूंकि अमेरिका इस मामले में एक अलग ही तस्वीर पेश करने में लगा हुआ है इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि भारत सरकार ऐसे प्रयास करे जिससे इस प्रकरण की सही-सच्ची तस्वीर दुनिया के समक्ष भी आए। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि अमेरिकी मीडिया का एक वर्ग भी अमेरिकी प्रशासन की भाषा बोल रहा है। यह सही समय है जब राजनयिकों के साथ दु‌र्व्यवहार और साथ ही मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में अमेरिका के दोहरे मानदंडों को रेखांकित किया जाए। भारत सरकार को इस धारणा को भी झुठलाना होगा कि देवयानी के मामले में उसने अपेक्षाकृत कठोर रुख सिर्फ इसलिए प्रदर्शित किया ताकि चुनावों के इस माहौल में देश की जनता के समक्ष खुद को एक मजबूत सरकार के रूप में पेश किया जाए। भारत सरकार कुछ भी दावा करे, इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विगत में इस तरह के मामलों में भारत सरकार की प्रतिक्रिया बेहद ही नरम-मुलायम रही और शायद यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन ने एक और भारतीय राजनयिक के साथ मनमाना व्यवहार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। देवयानी के मामले में केंद्र सरकार की अप्रत्याशित सख्त प्रतिक्रिया एकदम जायज है, लेकिन भविष्य के लिए भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसे न केवल भारतीय राजनयिकों, बल्कि विदेश में रह रहे भारतीय नागरिकों के मान-सम्मान और हितों की रक्षा के लिए अपेक्षित सतर्कता का परिचय देना चाहिए। जब ऐसा किया जाएगा तभी अमेरिका समेत अन्य देशों को यह सख्त संदेश भी दिया जा सकेगा कि भारतीयों के साथ दु‌र्व्यवहार की घटनाएं सहन नहीं की जाएंगी।

[मुख्य संपादकीय]

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