PreviousNext

नदियों को कानूनी अधिकार

Publish Date:Tue, 21 Mar 2017 01:05 AM (IST) | Updated Date:Tue, 21 Mar 2017 03:58 AM (IST)
नदियों को कानूनी अधिकारनदियों को कानूनी अधिकार
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा और यमुना को जीवित व्यक्तियों सरीखे कानूनी अधिकार प्रदान करने का फैसला दिया।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा और यमुना को जीवित व्यक्तियों सरीखे कानूनी अधिकार प्रदान करने का जो फैसला दिया उसने नदियों की महत्ता को नए सिरे से रेखांकित करने का काम किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस फैसले से केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्य सरकारें भी चेतेंगी और नदियों को साफ-सुथरा रखने के प्रति ईमानदारी के साथ सक्रिय होंगी। यह संभवत: दूसरा ऐसा उदाहरण है जब नदियों को जीवित व्यक्तियों जैसा अधिकार दिया गया है। इसके पहले हाल में न्यूजीलैंड की एक नदी को ऐसा ही अधिकार वहां की संसद ने प्रदान किया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना को जीवित व्यक्तियों जैसे कानूनी अधिकार प्रदान करते हुए गंगा प्रबंधन बोर्ड बनाने का भी निर्देश दिया। उसने यह भी स्पष्ट किया कि इन नदियों को अतिक्रमण से बचाने और उन्हें साफ-सुथरा रखने में आनाकानी करने वाले राज्यों के साथ केंद्र सरकार सख्त कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी। फिलहाल यह कहना कठिन है कि नैनीताल हाईकोर्ट के इस फैसले का असर किस रूप में और कब तक देखने को मिलेगा, क्योंकि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अतीत में न्यायपालिका के तमाम हस्तक्षेप और आदेश-निर्देश के बाद भी गंगा एवं यमुना के साथ-साथ देश की अन्य अनेक महत्वपूर्ण नदियां उपेक्षित ही हैं। वे प्रदूषण के साथ अतिक्रमण का भी शिकार हैं। कुछ नदियों की गंदगी तो इस हद तक बढ़ती जा रही है कि उनका पानी पीने लायक तो दूर रहा, सिंचाई के लिए भी उपयुक्त नहीं रह गया है।
गंगा और यमुना महज नदी नहीं हैं। वे देश की संस्कृति की प्रतीक एवं पर्याय हैं। एक विशाल आबादी के लिए वे जीवनदायिनी भी हैं और आस्था का केंद्र भी। आवश्यक केवल यह नहीं है कि नदियों के अविरल प्रवाह की चिंता की जाए, बल्कि यह भी है कि उनके पारिस्थितिकी तंत्र को सहेजने की कोशिश की जाए। बिना ऐसा किए नदियों के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक महत्व को बचाए रखना मुश्किल होगा। यह समझना कठिन है कि गंगा और यमुना के जल का दोहन इस तरह क्यों नहीं किया जा सकता कि उनके पारिस्थितिकी तंत्र को कोई नुकसान न पहुंचे? इस पर आपत्ति नहीं कि बिजली के लिए उत्तराखंड में नदियों पर बांध बनें, लेकिन इसका कोई ठोस आकलन होना ही चाहिए कि आखिर एक छोटे राज्य को कितने बांधों की आवश्यकता है? आर्थिक लाभ की चिंता वहीं तक की जानी चाहिए जहां तक नदियों की जीवनदायी क्षमता पर विपरीत असर न पड़े। गंगा और यमुना को प्रदूषण के साथ-साथ अतिक्रमण से बचाने की पहल इस रूप में होनी चाहिए कि उनका प्रवाह बाधित न होने पाए। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि गंगा और यमुना को साफ-सुथरा रखना संबंधित राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार की भी प्राथमिकता में है, क्योंकि जो वादे किए गए थे वे पूरे होते नहीं दिख रहे हैं। यह तब है जब केंद्र सरकार के साथ ग्र्रीन ट्रिब्यूनल भी इसके प्रति सजग है कि गंगा और यमुना को साफ-सुथरा रखने का लक्ष्य पूरा हो। स्पष्ट है कि गंगा एवं यमुना सरीखी नदियों को बचाने के मामले में केवल इतना ही पर्याप्त नहीं कि केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से संकल्पशक्ति का प्रदर्शन किया जा रहा है।

[ मुख्य संपादकीय ]

मोबाइल पर भी अपनी पसंदीदा खबरें और मैच के Live स्कोर पाने के लिए जाएं m.jagran.com पर
Web Title:Legal rights to rivers(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

कमेंट करें

चौदह साल बाद क्रिकेटपानी के सियासी रंग
यह भी देखें