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तैरते ताबूत

Publish Date:Thu, 27 Feb 2014 06:29 AM (IST) | Updated Date:Thu, 27 Feb 2014 06:29 AM (IST)

नौसेना की ताकत का अहसास कराने वाली एक और पनडुब्बी सिंधुरत्न का हादसे की चपेट में आना जितना चिंताजनक है उतना ही शर्मनाक भी। इसके पहले एक अन्य पनडुब्बी सिंधुरक्षक तो रहस्यमय तरीके से दुर्घटनाग्रस्त होकर तबाह ही हो गई थी। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले सात माह में तीन अन्य पनडुब्बियां हादसे से दो-चार हो चुकी हैं। तथ्य यह भी है कि पिछले कुछ समय से नौसेना के युद्धक यानों के दुर्घटनाग्रस्त होने का सिलसिला थम नहीं रहा है। एक और पनडुब्बी हादसे को दुर्योग कहना स्वीकार्य नहीं, क्योंकि यह घटना किसी बड़ी खामी की ओर संकेत कर रही है। एक समय मिग-21 विमानों को उड़ते हुए ताबूत की संज्ञा दी जाने लगी थी। कहीं हमारी पनडुब्बियां भी तैरते ताबूत में तो तब्दील नहीं हो रही हैं? यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि एक ओर तो हम महाशक्ति बनने का दम भर रहे हैं और दूसरी ओर हथियारों के सबसे बड़े खरीददार बन गए हैं। क्या दूसरे देशों के हथियारों के बल पर कोई देश विश्वसनीय सैन्य शक्ति बन सकता है-और वह भी तब जब आयातित रक्षा सामग्री की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते ही रहते हों? युद्धक उपकरणों के साथ पेश आने वाला हादसा केवल धन हानि का ही कारण नहीं बनता, अक्सर वह प्रशिक्षित सैनिकों के लिए जानलेवा भी बनता है। आखिर जवानों के साथ होने वाला यह खिलवाड़ कब थमेगा?

इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि एक के बाद एक हादसों को देखते हुए नौसेना प्रमुख ने अपनी जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र दे दिया और उसे स्वीकार भी कर लिया गया, क्योंकि इससे मूल समस्या का समाधान होते नहीं दिखता। किसी को यह बताना ही चाहिए कि नौसेना युद्धक यान दुर्घटनाग्रस्त क्यों हो रहे हैं? यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि या तो उनके रखरखाव में लापरवाही का परिचय दिया जा रहा है अथवा उनमें कोई बड़ी गड़बड़ी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पनडुब्बियां गुणवत्ताहीन हों? यह सवाल इसलिए, क्योंकि रक्षा जरूरतों को पूरा करने के नाम पर बड़े-बड़े सौदे तो कर लिए जाते हैं, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं किया जाता कि जिस युद्धक सामग्री की खरीद हो रही है वह श्रेष्ठकोटि की है या नहीं? इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पहले भी ऐसे उपकरण और यान खरीदे जा चुके हैं जिनकी गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे हैं। कुछ सामग्री तो इतनी अधिक दोयम दर्जे की रही कि उसके इस्तेमाल को खतरनाक करार दिया गया। सरकारी की ओर से चाहे जैसे दावे क्यों न किए जाएं, कोई भी यह गारंटी लेने के लिए तैयार नहीं दिखता कि भारतीय सेनाओं के लिए जो भी खरीद हो रही है वह श्रेष्ठकोटि की है। मुश्किल यह है कि रक्षा खरीद को लेकर तमाम सवाल उठने के बावजूद कहीं कोई गहन जांच-पड़ताल नहीं होती। एक के बाद एक रक्षा सौदे जिस तरह विवाद की भेंट चढ़ रहे हैं उससे अगर कुछ स्पष्ट हो रहा है तो यही कि केंद्र सरकार तमाम मोर्चो पर नाकाम रहने के साथ-साथ अपनी सेनाओं का सही तरह से आधुनिकीकरण करने और उनकी समस्याओं का निदान करने के मामले में भी असफल साबित हुई। यह तय है कि यह असफलता बहुत महंगी पड़ने जा रही है। ऐसा लगता है कि पिछली सरकारों की तरह यह सरकार भी संदिग्ध रक्षा सौदों के दुष्चक्र से बाहर निकलने में नाकाम रही।

[मुख्य संपादकीय]

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Web Title:Floating coffin

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