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दूर होती इंसानियत

Publish Date:Sat, 19 Aug 2017 05:54 AM (IST) | Updated Date:Sat, 19 Aug 2017 05:54 AM (IST)
दूर होती इंसानियतदूर होती इंसानियत
दर्द से कराहता वह व्यक्ति अस्पताल ले जाने की गुहार लगाता रहा लेकिन उसकी चीख इस तेज भागती दिल्ली के कदम नहीं रोक पाई।

दिलवालों की दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस की शाम घटित हृदयविदारक घटना ने मानवता को झकझोर कर रख दिया। सड़क दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति 14 घंटे तक छटपटाता रहा और इस दृश्य को देखकर फटी आंखों के किसी कोने से मदद की एक बूंद भी नहीं टपकी। दर्द से कराहता वह व्यक्ति अस्पताल ले जाने की गुहार लगाता रहा लेकिन उसकी चीख इस तेज भागती दिल्ली के कदम नहीं रोक पाई। एक राहगीर मसीहा बनकर मदद के नाम पर पानी भी पिलाया लेकिन इसके हृदय के किसी कोने में बैठा हैवान जाग गया और तड़पते व्यक्ति को वहीं छोड़ उसका पर्स लेकर चलते बना। हैरानी की बात यह कि स्वतंत्रता दिवस पर हाई अलर्ट के बावजूद पुलिस की भी उस तरफ कोई गश्त नहीं हुई। अगले दिन सुबह जब पीसीआरकर्मियों की निगाह उस पर पड़ी तो कहीं जाकर उसे अस्पताल पहुंचाया गया। वाकई तेजी से भागती जिंदगी ने लोगों को मशीन बनाने के साथ-साथ ही असंवेदनशील भी बना दिया है।1विचारणीय पहलू यह है कि हर इंसान विकास की दौड़ में शहरों की ओर भाग तो रहा है, लेकिन संस्कारों की जड़ शायद गांवों में ही छोड़ता जा रहा है। वह खुद नहीं समझ पा रहा कि इस जड़ के छूटने के कारण वह भीतर से कितना खोखला होता जा रहा है। महानगरीय संस्कृति उपभोक्तावाद का शिकार होकर रह गई है। आज लोग घर में भी परिजनों से यथोचित व्यवहार नहीं करते और घर के बाहर भी तनाव में रहते हैं। जरा सी बात होने पर बड़ा से बड़ा कदम उठाने को तैयार हो जाते हैं। दिल्ली में ऐसी घटनाएं दर्शाती हैं कि लोगों में इंसानियत और संवेदनशीलता नहीं रह गई हैं। यह हमारे समाज की अत्यंत गंभीर स्थिति है। यह समझा जाना चाहिए कि यदि इस हद तक इंसानियत खत्म हो जाएगी तो समाज किसी के रहने लायक ही नहीं रह जाएगा। यहां हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आज जो दूसरों के साथ है, कल को हमारे साथ भी घटित हो सकता है। इसलिए जरूरतमंद की मदद करनी ही चाहिए। धैर्य और संयम मानवीयता ही नहीं, भारतीय संस्कृति का भी हिस्सा है। इस पर अमल होना चाहिए।

स्थानीय संपादकीय- दिल्ली

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Web Title:Far away humanity(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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