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बच्चों की सुरक्षा

Publish Date:Thu, 14 Sep 2017 05:01 AM (IST) | Updated Date:Thu, 14 Sep 2017 05:01 AM (IST)
बच्चों की सुरक्षाबच्चों की सुरक्षा
प्रद्युम्न की विद्यालय परिसर में हत्या की घटना से ही हर परिवार बच्चों की सुरक्षा को लेकर दहशत में है।

स्कूलों में सुरक्षा के मानकों का सख्ती से पालन हो। एक ऐसा तंत्र विकसित करने की जरूरत है जो स्कूलों की समुचित निगरानी कर सके। तभी हम बच्चों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो सकेंगे।
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जमशेदपुर में जन्मे व गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल के छात्र सात वर्षीय प्रद्युम्न की विद्यालय परिसर में हत्या की घटना ने लौहनगरी समेत पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना के बाद से ही हर परिवार बच्चों की सुरक्षा को लेकर दहशत में है। यह स्वाभाविक भी है। हर कोई चाहता है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी को हर हाल में दंड मिले। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी निजी स्कूलों में सुरक्षा व्यवस्था की जांच खुद कराने का फैसला किया है। इस कदम से न्यायपालिका के प्रति लोगों का विश्वास और बढ़ेगा। यह उम्मीद भी जगेगी कि आए दिन किसी न किसी निजी स्कूल में बच्चों के साथ होनेवाले अन्याय या उनकी सुरक्षा पर उत्पन्न होने वाले खतरों पर भी अंकुश लग सकेगा। जनमानस में निजी स्कूलों की छवि विद्या देने के केंद्र से ज्यादा शिक्षा के नाम पर कारोबार करनेवाले संस्थान की बन गई है। ऐसे स्कूलों का ध्यान अभिभावकों से मोटी रकम वसूलने पर ज्यादा रहता है। बच्चों की सुरक्षा या शिक्षण व्यवस्था की गुणवत्ता उनकी प्राथमिकता सूची में शायद ही स्थान पाती है। वास्तव में निजी स्कूल खोलना आज एक ऐसा धंधा बन गया है जिसमें कमाई की तो असीम संभावना रहती है लेकिन किसी के प्रति जवाबदेही बिल्कुल ही नहीं होती। अलग-अलग संस्था या व्यवस्था के लिए जारी होनेवाले निर्देश भी इनके लिए कोई मायने नहीं रखते। ये संस्थान खुद को नियम-कानून या व्यवस्था से ऊपर समझते हैं। अच्छी शिक्षा देने का वादा महज वादा ही रहता है और सुरक्षा को लेकर भी गंभीरता नहीं दिखाई जाती।
प्रद्युम्न की अकाल मौत से अन्य स्कूलों के प्रबंधन को सीख लेनी चाहिए कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता किया जाए। सभी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। सुरक्षा के अन्य मानकों पर भी स्कूल की व्यवस्था को कसा जाए। स्कूल में तैनाती से पहले सभी कर्मचारियों के आचरण की पुलिस से जांच कराई जाए। नियुक्ति भी नियमानुकूल हो। इसके अलावा एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाए जो स्कूलों की प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी कर सके। बच्चों को घर से स्कूल जाने व वहां से सुरक्षित लौटने की जिम्मेदारी स्कूलों को ही उठानी होगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद व्यवस्था पटरी पर होगी और हम बच्चों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हो सकेंगे।

[ स्थानीय संपादकीय: झारखंड ]

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Web Title:child safety(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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