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नई उम्मीदों का उत्सव

Publish Date:Fri, 15 Aug 2014 05:46 AM (IST) | Updated Date:Fri, 15 Aug 2014 05:38 AM (IST)

स्वतंत्रता दिवस की आभा उसे एक उत्सव ही नहीं बनाती, देशवासियों में गर्व का भी अहसास भरती है। हर वर्ष यह दिवस विशेष बनकर आता है और देशवासियों के मन में नई-नई उम्मीदें जगाता है। 68वें स्वतंत्रता दिवस का इसलिए विशेष महत्व है कि पहली बार आजाद भारत में जन्मा व्यक्ति बतौर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करेगा। नरेंद्र मोदी एक ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो तीस सालों में पहली बार बहुमत के साथ सत्ता में आए हैं। चूंकि वह गठबंधन राजनीति की तथाकथित मजबूरियों से मुक्त हैं इसलिए आम जनता को यह उम्मीद बंधी है कि वह शासन की कार्यशैली बदलने के साथ देश के माहौल को भी बदलने में सफल होंगे। उन्होंने यह काम शुरू भी कर दिया है और बहुत संभव है कि वह लाल किले की प्राचीर से इस बारे में कुछ घोषणाएं भी करें, लेकिन देश का भरोसा तब और बढ़ेगा जब राजनीतिक संस्कृति भी बदलेगी। इससे अधिक निराशाजनक और कुछ नहीं हो सकता कि जिस राजनीति पर देश और समाज को दिशा देने और आगे ले जाने का दायित्व है वह स्वयं भटकी हुई नजर आती है। भारतीय राजनीति के तौर-तरीकों के चलते शासन-प्रशासन आम जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। इस निराशाजनक स्थिति को बदलने के लिए कुछ ठोस और लीक से हटकर करने की जरूरत है। यह उम्मीद की जाती है कि हमारे नीति-नियंता इस जरूरत को न केवल समझेंगे, बल्कि उसी के अनुरूप अपनी रीति-नीति भी बनाएंगे। इस उम्मीद का पूरा होना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि जो कुछ संभव है उसके न हो पाने के चलते देश में बेचैनी बढ़ती है, जो कभी-कभी निराशा का रूप भी धारण कर लेती है। यह समय की मांग है कि हमारी संस्थाएं अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करें और उन विसंगतियों और खामियों से मुक्त हों जो समय के साथ उनमें घर कर गई हैं। ऐसा होने पर ही सुशासन संभव है और इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि सुशासन का कोई विकल्प नहीं।

स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने न केवल देश की अपेक्षाओं को सामने रखा, बल्कि चुनौतियों की भी चर्चा की। उन्होंने यह सही कहा कि प्राचीन समाज होने के बावजूद भारत आधुनिक सपनों से लैस राष्ट्र है और आर्थिक अथवा सामाजिक उन्नति शांति के बिना हासिल नहीं की जा सकती। उनके इन सवालों पर गंभीर चिंतन-मनन की आवश्यकता है कि क्या हमारा लोकतंत्र बहुत अधिक शोर-गुल से भर गया है और क्या हम शांतिपूर्ण चिंतन की कला खो चुके हैं? अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने जो भी सवाल उठाए वे मूलत: नीति-नियंताओं के ही संदर्भ में हैं, लेकिन आम नागरिकों को भी इस पर चिंतन-मनन करना होगा कि क्या वे अपने दायित्वों का सही निर्वहन करते हुए राष्ट्र निर्माण में भागीदार बन पा रहे हैं? भारत सरीखे विशाल देश में सब कुछ सरकारें नहीं कर सकतीं, लेकिन यदि आम जनता भी अपनी जिम्मेदारी समझे तो बहुत कुछ बहुत जल्द हासिल किया जा सकता है। इसके लिए हर स्तर पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। भारत का विकास और खुशहाली सभी की साझा जिम्मेदारी है। ये वे सपने हैं जो इसी रूप में सबसे अच्छे तरीके से साकार किए जा सकते हैं।

[मुख्य संपादकीय]

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