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एक नाकाम लड़ाई

Publish Date:Wed, 12 Mar 2014 05:58 AM (IST) | Updated Date:Wed, 12 Mar 2014 05:59 AM (IST)

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के एक और हमले में 15 से अधिक जवानों की मौत यह बताती है कि आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताए जा रहे नक्सलवाद से निपटने के मामले में जबानी जमा खर्च के अलावा और कुछ नहीं किया जा रहा है। यह नक्सलियों के दुस्साहस का ही प्रमाण है कि वे उसी इलाके में जवानों को निशाना बनाने में सफल रहे जहां उन्होंने पिछले साल विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हमलाकर खूनी खेल खेला था। यह भी नहीं भूला जा सकता कि इसी क्षेत्र में 2010 में खूंखार नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों की बलि ले ली थी। यह भी स्मरण करना आवश्यक है कि इतनी बड़ी संख्या में जवानों की हत्या के लिए जिम्मेदार नक्सली सुबूतों के अभाव में बरी हो गए और कहीं कोई हैरानी-परेशानी का भाव नहीं दिखा। दरअसल यही वह रवैया है जिसके चलते नक्सलियों का दुस्साहस बेलगाम होता जा रहा है और वे एक ऐसी स्थिति में दिखने लगे हैं कि जब चाहें, जहां चाहें, हमला करें। नक्सलियों के प्रत्येक हमले के बाद जिस तरह शोक-संवेदना भरे बयान आने के साथ उनसे निपटने की बातें की जाती हैं वैसा ही कुछ इस बार भी होने वाला है। यह भी तय है कि इस हमले की अपनी-अपनी तरह से व्याख्या की जाएगी। कोई सुरक्षा बलों के पर्याप्त सतर्क न होने का उल्लेख करेगा तो कोई केंद्र और राज्यों के बीच पर्याप्त तालमेल के अभाव का, लेकिन इसमें संदेह है कि इसकी आवश्यकता महसूस की जाएगी कि नक्सलियों के दुस्साहस का मुंह तोड़ जवाब देने की जरूरत है।

यह कई बार स्पष्ट हो चुका है कि नक्सली न तो बातचीत के जरिये समस्या का समाधान करने के इच्छुक हैं और न ही वे हिंसा के रास्ते का परित्याग करने वाले हैं, लेकिन इस सबके बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के रवैये में कहीं कोई तब्दीली नहीं आ रही है। यदि यह सोचा जा रहा है कि निंदा-आलोचना और भ‌र्त्सना से नक्सलियों की सेहत पर कोई असर पड़ेगा तो यह व्यर्थ है। नक्सली तभी सही रास्ते पर आ सकते हैं जब उन्हें निहत्था और नि:शक्त करने की किसी ठोस रणनीति पर काम किया जाएगा। नि:संदेह इसके लिए यह भी आवश्यक होगा कि नक्सलियों के गढ़ में सरकारी तंत्र अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराए और उनके दुष्प्रचार की काट करने में सक्षम हो। यह निराशाजनक है कि इस संदर्भ में बातें तो खूब होती हैं और यहां तक कि नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और पुलिस प्रमुखों की बार-बार बैठक भी बुलाई जाती है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही है। अब हमारे नीति-नियंताओं को नक्सलवाद से मुकाबले के इन तौर-तरीकों की निरर्थकता का अहसास हो जाना चाहिए। इतना ही आवश्यक यह है कि वे यह भी समझें कि ऐसे निष्प्रभावी और खोखले तौर-तरीके आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ाने के साथ-साथ सुरक्षा बलों पर भारी पड़ रहे हैं। नक्सलियों से निपटने की रणनीति में बदलाव के लिए आखिर किसका इंतजार किया जा रहा है? यदि यह स्थिति उत्पन्न हो गई है कि नक्सली जब चाहें तब हमला कर सकते हैं तो यह दावा कैसे किया जा सकता है कि नक्सलवाद के रूप में आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे से निपटने की रणनीति सही दिशा में है?

[मुख्य संपादकीय]

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