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सियासत में महिलाएं

Publish Date:Thursday,Oct 18,2012 03:37:19 AM | Updated Date:Thursday,Oct 18,2012 03:40:52 AM

महिलाओं को राजनीति में आरक्षण की बात भले ही बहुत विवादास्पद मुद्दा है जिस पर लंबे समय से कोई राय ही नहीं बन सकी है लेकिन अन्यथा भी हालात बहुत संतोषजनक नहीं दिख रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में इस बार सियासी दंगल में महिलाएं पहले की अपेक्षा बेशक अधिक बताई जा रही हों लेकिन अब भी ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि उन्हें उनका पूरा हक मिल ही गया है। इसके कारण कई हैं। हो सकता है कुछ हद तक स्वयं महिलाएं भी इसका कारण हों लेकिन विचार इस बात पर होना चाहिए कि कब तक उन्हें इसी प्रकार गौण स्थिति के साथ समझौता करना होगा। हिमाचल प्रदेश में भाजपा ने सात महिलाओं पर भरोसा जताया है जबकि कांग्रेस ने चार पर। 68 हलकों में से केवल इतने हलकों में महिला प्रत्याशी मिल पाना अपने आप में ही सवाल खड़े करता है। हैरानी यह भी है कि कांग्रेस जैसे बड़े दल को भी चार ही महिलाएं मिली जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वयं महिला हैं और हिमाचल प्रदेश में उसी पार्टी से संबंधित वरिष्ठ नेत्री नेता प्रतिपक्ष हैं। भाजपा ने इस बार सात चेहरों में से तीन नए चेहरे उतार कर कुछ साहस दिखाया है वरना दल कोई भी हो, हर बार पांच वर्ष तक कार्यकर्ता काम करते रहते हैं और चुनावी मौसम आते ही 'जीतने की संभावना' का आदिवाक्य वरिष्ठ नेताओं का प्रिय जुमला बन जाता है। यही वास्तव में राजनीति की सीमा या संभावना भी है। सरकार वही तो बनाएगा जिसके पास बहुमत में विधायक होंगे। लेकिन नारी यदि हर मोर्चे पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है तो हिमाचल प्रदेश की सियासत इससे अछूती क्यों रहे, इस पर दलों को विचार करना होगा। इस विषय पर कोई भी संजीदा विचार न केवल लोकतंत्र को मजबूत देगा बल्कि दलों के आंतरिक लोकतंत्र को भी मजबूत करेगा। यह अच्छा ही है कि स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण है। वहां के अनुभव लिए जा सकते हैं ताकि कुछ ऐसा हो सके कि उस वर्ग को कम से कम आधा हक तो मिले जिसे कुछ तरतीब वाले शब्दों में लोग आधी दुनिया कहते हैं। हिमाचल प्रदेश में इस बार आजाद प्रत्याशियों के रूप में काफी महिलाओं ने दम दिखाया है। शक्तिपीठों के लिए जाने जाते सर्वाधिक 15 सीटों वाले कांगड़ा जिले में मंगलवार तक छह महिलाएं मैदान में थी। नारी सशक्तीकरण चाहिए तो विचारों का क्रियान्वयन करने में दल सशक्त हों।

[स्थानीय संपादकीय: हिमाचल प्रदेश]

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