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हारे हुए नेता जी की दास्तान

Publish Date:Sun, 19 Mar 2017 12:41 AM (IST) | Updated Date:Sun, 19 Mar 2017 12:56 AM (IST)
हारे हुए नेता जी की दास्तानहारे हुए नेता जी की दास्तान
चुनाव में आत्मसम्मान बचाने में हम सफल रहे। हारकर भी हम जीते हैं, क्योंकि यह लड़ाई हारने के लिए ही हम लड़ रहे थे।

संतोष त्रिवेदी

चुनाव खत्म हो चुके थे। चारों ओर हार-जीत का पोस्टमार्टम चल रहा था। ऐसे में एक जागरूक पत्रकार के तौर पर हमने भी अपनी जिम्मेदारी समझी। तय किया कि जीतने वाले नेताजी का इंटरव्यू किया जाए। आखिर इसके लिए मौका और दस्तूर दोनों है। मगर संपर्क करने पर मालूम पड़ा कि उनके पास 2019 से पहले की कोई तारीख ही उपलब्ध नहीं है। हमें इस समस्या का विकल्प भी तुरंत मिल गया। हम चुनाव हारने वाले नेताजी से मिलने चल दिए। इसके लिए उनसे समय मांगने की जरूरत भी नहीं पड़ी। उनकी बहुमूल्य काया के पास चुनाव के बाद ले-देकर बस यही एक एक चीज बाकी बची थी। चुनावी मशीन से निकले मतों ने उनका सारा काम-तमाम कर दिया। विज्ञापनों के जरिये बनाया गया उनकी उपलब्धियों का पहाड़ भी भरभरा कर ढह गया। चूंकि नेताजी की हार ऐतिहासिक थी लिहाजा उनका इंटरव्यू करना भी कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। हम उनके ठिकाने पर पहुंच गए। नेताजी खाट बिछाए बैठे हुए थे। एकदम खाली थे। हमें देखकर उनकी जान में जान आई। अभिवादन के बाद हमने सभी गैर-जरूरी सवाल दाग दिए। उन्होंने एक से बढ़कर एक अप्रत्याशित जवाब दिए। इस दौरान पूरे वक्त हार को मजबूती से गले लगाए बैठे रहे। नेताजी के साथ हुआ संवाद यहां अविकल रूप से प्रस्तुत है।
चुनाव में आपकी खटिया खड़ी हो गई। फिर भी आप इतने भरोसे के साथ बैठे हुए हैं। आखिर इतनी निश्चिंतता का राज क्या है?
-देखिए, राज तो अब हमारे पास रहा नहीं। मगर मैं राज की बात तो आपको बता ही सकता हूं। वह यही कि विरोधियों की जीत अब कोई राज नहीं रही। यह बात हम आगे बताएंगे। इस चुनाव में हमारी खटिया खड़ी करने की भरपूर कोशिश की गई पर हम टस से मस नहीं हुए। यह खटिया हमारे परिवार का हिस्सा रही है और आगे भी खड़ी रहेगी। हमारे राज में यह समाजवाद की गवाह रही है। यही कारण है कि अब तक परिवार में समाजवाद बचा हुआ है। हम लड़ते-झगड़ते और लूटते-लुटाते एक साथ हैं। हमें खुशी है कि चुनाव में आत्मसम्मान बचाने में हम सफल रहे। हारकर भी हम जीते हैं, क्योंकि यह लड़ाई हारने के लिए ही हम लड़ रहे थे। इसकी प्रक्रिया हमने चुनाव से काफी पहले शुरू कर दी थी। हमें संतोष है कि हमारी लड़ाई पूरी तरह पारदर्शी रही।
आपने इसे कैसे संभव किया? क्या आपने हारने के लिए गठबंधन किया था?
-बहुत जरूरी सवाल पूछा है आपने। दरअसल हमने हारकर अपनी एकजुटता साबित की है। हम अपने गठबंधन सहित समान-भाव और समान स्ट्राइक रेट से हारे। हमारे हार जाने से परिवार में एकता बरकरार है। हम शुरू से ही हारने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थे। जीतने पर मुलायम बन जाने की आशंका थी। गठबंधन हमारे लिए हमेशा की मजबूरी बन जाता। अब हम भी मुक्त हैं और वे भी। इसलिए हम जानबूझकर नहीं जीते। लगातार जीत पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित होती। हमारे सभी कार्यकर्ताओं को ‘हार’ पसंद है। इसलिए हमें ये ‘साथ’ पसंद था। सरकार में रहकर हमारे ‘हल्ला-बोल’ कार्यक्रम में थोड़ी मुश्किल हो रही थी। हार ने इसे आसान बना दिया। हम अपने प्रदर्शन से बिलकुल खुश हैं।
आपने यह महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कैसे की? इसका श्रेय आप किसे देते हैं ?
-पूरा श्रेय हमारे काम को जाता है। पूरे पांच साल काम बोलता रहा मगर आखिर में काम टें बोल गया। इसमें विरोधियों की भूमिका रही। यही वजह रही कि चुनावों के दौरान हमारे ‘काम’ को फरार होना पड़ा। उन्होंने भरे चुनाव में उसे पटरी से उतार दिया। हमारे मजबूत
काम को बिजली का करंट मारा। हमने हाईवे और सड़कें बनवाईं, ताकि लोग उन पर चलकर मतदान-केंद्र तक हमें हराने के लिए आ सकें। रोड हमारी थी पर शो ‘उनका’ हुआ। हारने में कोई कसर न बाकी रह जाए इसके लिए हमने मिली-जुली रैलियां कीं। नतीजे गवाह हैं कि उन जगहों में हम जमानत जब्त कर बाइज्जत हारे। हमारे अधिकारियों ने भी इसमें बखूबी हमारा साथ दिया। मौका पाते ही वोटिंग मशीनों में हवा भर दी। फागुन का फायदा उठाकर मशीनों से सफलतापूर्वक छेड़छाड़ भी गई। इससे मतगणना के समय सभी मशीनें बौरा गईं। मौसम ने भी हमसे साजिश की। बसंत में फूल उनका खिला और हमारे पत्ते झड़ गए।
अब आपकी आगे की क्या योजना है?
कुछ खास नहीं। बस हम जनता को अपनी हार से होने वाले फायदे गिनाएंगे। पूरे पांच साल हार की ऐसी माला जपेंगे कि विरोधी खुद ब ख्ुाद हार मांगने लगेंगे। मगर हम आसानी से यह ‘अमर मंत्र’ उन्हें नहीं देंगे। पिछले पांच सालों में हमने विकास का जो खनन किया है वे उसी से रेत के महल बनाएंगे।
इस हार से जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे?
-हम तो हारे हैं जी। जो भी देना है वे जीतने वाले देंगे। अब तो नई सरकार से हमारी मांग है कि उन्होंने जो वादे किए थे वे हूबहू पूरे करें। मसलन सभी किसानों का कर्ज माफ कर दें। ऐसा जल्द से जल्द करें। हम तो बेसिकली किसान ही हैं। हमारा सारा कर्जा माफ किया जाए। नोटबंदी और वोटबंदी से हुए नुकसान की भरपाई की जाए। ‘मनरेगा’ के तहत बुलेट ट्रेन का टेंडर भी हमें दिया जाए। हारने के बाद हमारा इतना तो हक बनता ही है।

[  लेखक पत्रकार हैं  ]

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Web Title:Story of defeated Leader(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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