सवाल संवेदना का है

Publish Date:Tue, 25 Jun 2013 01:47 AM (IST) | Updated Date:Tue, 25 Jun 2013 02:19 AM (IST)
सवाल संवेदना का है
पिछले दिनों बादल फटने से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में जल प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। हिमाचल के किन्नौर इलाके में अभी भी 500 से अधिक लोग फंसे हुए हैं। उत्तराखंड के केदारन

पिछले दिनों बादल फटने से हिमाचल प्रदेश और उत्ताराखंड में जल प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। हिमाचल के किन्नौर इलाके में अभी भी 500 से अधिक लोग फंसे हुए हैं। उत्ताराखंड के केदारनाथ क्षेत्र में तो संकट में फंसे लोगों की संख्या हजारों में है। कितने लोगों की जान चली गई और कितने लोगों के घर-बार इस प्रलयंकारी बाढ़ में बह गए, इसका तो अभी ठीक-ठीक आकलन भी नहीं किया जा सकता। इससे सिर्फ वही इलाके प्रभावित नहीं हुए जहां बादल फटे। आसपास के दूसरे इलाके भी इसके चलते हुई तबाही से प्रभावित हुए हैं। हिमाचल की आपदा से हरियाणा भी प्रभावित हुआ है। हरियाणा के यमुनानगर इलाके में बाढ़ आ गई है। उधर, उत्ताराखंड की आपदा ने पश्चिमी उत्तार प्रदेश के कुछ इलाकों को प्रभावित किया है। हिमाचल और उत्ताराखंड में धार्मिक एवं पर्यटन महत्व की कई जगहें होने के नाते यहां देश भर से लोगों का आना-जाना है और यह आवागमन लगभग पूरे साल बना रहता है। इस समय भी वहां हजारों तीर्थयात्री और पर्यटक गए हुए थे और इनमें से अधिकतर फंस गए, जो अभी भी फंसे हुए ही हैं।

आमतौर पर पहाड़ों पर जाने के लिए गर्मी का समय बेहतर समझा जाता है। क्योंकि इस समय वहां ठंड असहनीय नहीं होती और भूस्खलन की आशंका भी कम होती है। जिन लोगों के लिए बर्फ में घूमना-टहलना मुश्किल होता है, वे भी इस मौसम में आसानी से इधर-उधर आ-जा लेते हैं। इसीलिए लोग पूरे साल पहाड़ों पर जाना टालते रहते हैं और गर्मी के दिनों में वहां बड़ी संख्या में जाते हैं। दूर-दराज से आने वाले लोग इसके लिए ट्रेनों और होटलों में महीनों पहले से रिजर्वेशन करा लेते हैं। अब हफ्ते-दो हफ्ते पहले अगर मौसम के बिगड़ने संबंधी कोई चेतावनी संबंधित विभाग द्वारा जारी भी की जाए तो एक तो वह दूर के लोगों को पता नहीं चल पाती और दूसरे अगर पता चले भी तो वे उसे अकसर नजरअंदाज कर देते हैं। नजरअंदाज करने के भी कई कारण होते हैं। एक तो यह कि आम मध्यवर्गीय आदमी मुश्किल से कभी बाहर निकलने के लिए तैयार हो पाता है और वह जब एक बार तैयार हो जाता है तो अपना कार्यक्रम टालने में उसे बड़ी मायूसी महसूस होती है। वह सोचता है कि अगर इस बार चूके तो फिर जाने कब जाना हो सके। इसके अलावा उसे आर्थिक नुकसान भी दिखाई देता है। क्योंकि हर जगह जहां उसने बुकिंग कराई है, वहां कुछ न कुछ कटौती होगी। इस मानसिकता ने भी इन जगहों पर भयावह जनहानि में बड़ी भूमिका निभाई है।

हिमाचल और उत्ताराखंड दोनों ही जगहों पर इस समय पर्यटन अपने शबाब पर होता है। इन दोनों ही जगहों पर पूरे देश भर से लोग आते हैं। इनमें केवल घूमने-फिरने के इरादे से आने वाले लोग ही नहीं, बड़ी संख्या में तीर्थयात्री भी होते हैं। खासकर उत्ताराखंड के केदारनाथ और बद्रीनाथ क्षेत्रों में तो इस समय तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ होती है। वह भीड़ हर साल की तरह इस बार भी थी और इसीलिए इस आपदा के बाद यह अंदाजा लगाना अभी भी मुश्किल हो रहा है कि कितने लोग वास्तव में कहां फंसे हैं। कौन कहां बह गया और कौन कहां मलबे के नीचे दब गया, यह कोई अभी भी बता नहीं पा रहा है। जो लोग किसी तरह बच कर निकल आए, उनमें भी अपने बचने की खुशी कम, भांति-भांति के दर्द अधिक दिखाई दे रहे हैं। किसी को इस बात का दर्द है कि वह खुद तो जैसे-तैसे बच गया, पर अपनों को नहीं बचा सका और किसी को इस बात का दर्द है कि उसे समय पर सहायता नहीं मिली।

समय से और पर्याप्त सहायता न मिल पाने का दर्द तो सभी को सता रहा है। गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु जैसे दूर के प्रदेशों से जो लोग वहां आते हैं, वे आखिर किसके भरोसे आते हैं? जाहिर है, उनका भरोसा स्थानीय लोगों और प्रशासन पर होता है। स्थानीय लोग तो बेचारे इस समय खुद आफत में हैं। उनसे किसी मदद की अपेक्षा करना भी उनके साथ ज्यादती होगी। लेकिन, प्रशासन से तो मदद की अपेक्षा की ही जानी चाहिए और वह इन अपेक्षाओं पर बिलकुल खरा नहीं उतरा। यह बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि प्रशासन की मंशा लोगों की मदद करने की नहीं रही होगी, बल्कि सच यह है कि वह मदद की स्थिति में ही नहीं रहा। उत्ताराखंड और हिमाचल प्रदेश दोनों ही जगहों पर स्थितियों के ज्यादा कष्टप्रद हो जाने की बड़ी वजह यही है। यह एक कड़वा सच है कि आजादी के छह दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हमारे देश में बचाव की मशीनरी कहीं भी कायदे से विकसित ही नहीं हो सकी है। न तो तकनीक और न कार्यप्रणाली, किसी भी स्तर पर वह समय के मानक पर सामान्य स्तर की भी नहीं ठहरती है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि तमाम दूसरे उपायों और संसाधनों की तरह राहत कार्य की मशीनरी भी हमारे यहां नौकरशाही की शिकार होकर रह गई है। यही कारण है जो हर साल यहां प्राकृतिक आपदाओं में लाखों लोग मारे जाते हैं। इस बार की यह आपदा तो वैसे भी बहुत बड़ी है और इससे तुरंत लोगों को बचाने के फौरी उपाय बहुत मुश्किल थे, लेकिन उत्तार प्रदेश और बिहार जैसे मैदानी इलाकों की बाढ़ से तो लोगों को तुरंत बचाया जा सकता है। इसके लिए किसी बहुत बड़े तामझाम की जरूरत नहीं होती, इसके बावजूद उत्तार प्रदेश, बिहार और पूर्वोत्तार के राज्यों में सामान्य बाढ़ में ही हर साल हजारों लोग बह जाते हैं। लाखों लोगों के घर-खेत सब डूब जाते हैं और महीनों तक राहत कार्य के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जाती रहती हैं। सारी औपचारिकताएं पूरी हो जाने और राहत सामग्री रवाना कर देने के बाद भी उसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने के बजाय उसमें से अपने लिए हिस्सा निकालने का जुगाड़ शुरू हो जाता है। लाशों पर भी राजनीति करने और राहत कायरें में भ्रष्टाचार की बात केवल यहीं सोची जा सकती है। लेकिन, यह एक सच्चाई है कि यहां ऐसा होता है।

ये हालात यह बताते हैं कि और चाहे जो हो, हमारी सरकारी मशीनरी देश की जनता के प्रति संवेदनशील नहीं है। यदि उसके भीतर लोगों के प्रति संवेदना होती तो हालात इतने बुरे तो कतई नहीं होते। ऐसे समय में जबकि हमारी प्राथमिकता आपदा में फंसे हुए लोगों को किसी भी तरह वहां से बाहर निकालने और बचाने तथा सभी को एक-दूसरे की मदद करने की होनी चाहिए, तब हमारे राजनेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं। राहत कायरें की प्रणाली भी अगर वैज्ञानिक एवं तकनीकी रूप से पर्याप्त विकसित नहीं हो सकी तो क्यों? क्या हमने कभी ईमानदारी से इसके लिए प्रयास किया? उत्तार प्रदेश और बिहार के लोग हर साल बाढ़ के चलते जिस तबाही का सामना करते हैं, उससे बचने के उपाय तो सबको पता हैं और ये उपाय किए भी जा सकते हैं। लेकिन इस दिशा में कुछ करना तो दूर, हमारी व्यवस्था ने अभी सोचना तक शुरू नहीं किया है। आखिर क्यों? क्या हमारा प्रशासन जनता के प्रति कभी संवेदनशील हो सकेगा?

[निशिकान्त ठाकुर, लेखक दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक हैं]

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