सुरक्षा का वैचारिक पक्ष

Publish Date:Sat, 14 Jun 2014 06:21 AM (IST) | Updated Date:Sat, 14 Jun 2014 06:21 AM (IST)
सुरक्षा का वैचारिक पक्ष
नए प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा आंतरिक सुरक्षा को गंभीरता से लेना एक स्वागतयोग्य कदम है। सच तो यह है कि अब किसी देश पर बाहरी, प्रत्यक्ष सैनिक आक्रमणों का युग बीत चला है। स्वयं

नए प्रधानमंत्री और गृहमंत्री द्वारा आंतरिक सुरक्षा को गंभीरता से लेना एक स्वागतयोग्य कदम है। सच तो यह है कि अब किसी देश पर बाहरी, प्रत्यक्ष सैनिक आक्रमणों का युग बीत चला है। स्वयं भारत इसका उदाहरण है कि हाल के इतिहास में इस पर कई बार हमला करने वाले पड़ोसी ने भी हमें प्रत्यक्ष हराने में विफल होकर दूसरे तरीकों का इस्तेमाल शुरू किया। दो वर्ष पहले गुलाम नबी फई प्रसंग ने इसे साफ-साफ दिखाया कि पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आइएसआइ कई भारतीय बुद्धिजीवियों का कैसे उपयोग करती रही है। फई ने अमेरिकी अदालत में बताया कि वह बीस वर्ष से आइएसआइ के निर्देश और पैसे से सक्त्रिय था। यह प्रसंग हमारी आंतरिक सुरक्षा पर विचार की दृष्टि से महत्व का है। फई के कई सहयोगियों में भारत के बड़े प्रोफेसर, पत्रकार, एनजीओ एक्टिविस्ट आदि थे। उनमें ऐसे भी थे जो हमारी सरकार के लिए नीति-दस्तावेज बनाते रहे हैं। क्या यह समझने के लिए बड़ी बुद्धि की जरूरत है कि भारत के ऐसे उच्च-पदस्थ लोगों की आइएसआइ खातिरदारी का मकसद क्या था?

अत: हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा पर आंतरिक खतरे के वैचारिक पक्ष पर पूरी तरह ध्यान देना चाहिए। भारत के विविध शत्रु लंबे समय से हमारे अनेक दिग्भ्रमित या राजनीति-प्रेरित बुद्धिजीवियों का उपयोग कर रहे हैं। इनके माध्यम से हमारी शिक्षा, अकादमिक विमर्श और मीडिया तक प्रभावित हुए हैं। इसीलिए यह कोई सांयोगिक बात नहीं कि हमारे जो लोग अमेरिका में फई जैसे लोगों का आतिथ्य ग्रहण करते हैं वही लोग कश्मीर, आतंकवाद तथा माओवाद पर भारत की अहर्निश निंदा करते हैं। न यह कोई संयोग है कि वे लोग कश्मीरी अलगाववादियों या मिशनरी विस्तारवाद की अवैध गतिविधियों पर भी कभी उंगली नहीं उठाते। हमारे जो प्रोफेसर माओवादियों के भारत-विखंडन प्रोग्राम का खुला समर्थन करते हैं, उन्होंने विश्वविद्यालयी शिक्षा में कम्युनिस्ट सामग्री को 'उच्च शिक्षा' के रूप में तस्करी से घुसाकर स्थापित कर दिया है। कक्षा में पढ़ाने वाले प्रोफेसर और माओवादियों को सहयोग देने वाले प्रोफेसर में अंतर करके हम देश की सुरक्षा नहीं कर सकेंगे। कई विश्वविद्यालयों के समाज विज्ञान पाठ्यक्रम और पाठ्यसूचियों से स्वत: जाहिर होता है कि उसमें शिक्षा के नाम पर राजनीति हावी है। क्या इन सब से हमारी चेतना दूषित और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित नहीं हुई है? हाल में एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के सोशल साइंस विभाग की चालीसवीं वर्षगांठ मनाई गई। उस अवसर पर आयोजित सेमिनार में पूरे दिन भारत सरकार और हिंदू धर्म, समाज की भर्त्सना होती रही। आधे दर्जन वक्ताओं ने आतंकवादी मोहम्मद अफजल को मृत्युदंड देने की निंदा की। कश्मीर में भारतीय सेना को 'ऑक्यूपेशन-आर्मी' बताया, मगर कश्मीरी हिंदुओं के सफाए पर एक शब्द नहीं कहा।

दलित-चिंता की आड़ में ईसाई-मिशनरियों का प्रचार दुहराया। एक वक्ता ने पूरी भारतीय न्यायपालिका पर कालिख पोती। यह स्थिति कितनी घातक है, यह जरा ठहरकर समझने की जरूरत है। किसी ने ठीक ही चेतावनी दी है कि भारत की आधुनिक सेना, परमाणु क्षमता, विदेशी मुद्रा भंडार, आदि से इसे सुरक्षित समझना एक भूल है। शिक्षा और विचार-विमर्श में विषैली, देश-घाती, समाज-घाती विचारधाराओं का गहरा जमावड़ा वही दीमक समझना चाहिए जो हमारे युवाओं को धर्म-हीन, देश-विरोधी, मतिहीन एक्टिविस्ट बनाने पर तुला है। उसी का फल है कि कई अकादमिक संस्थान माओवादियों, मिशनरियों, उग्रवादियों, जिहादियों के सुसंगत बचाव व प्रचार का साधन बन गए हैं। यह इतने लंबे समय से हो रहा है कि कई लेखक, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता अनजाने उन विचारों को ही दोहराते रहते हैं जिसे उन्होंने स्वयं कभी नहीं परखा। यह दुखद है कि हम संस्कृति, सिनेमा और फैशन में तो अमेरिकियों की अंध-नकल करते हैं, किंतु देश-प्रेम, राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून के कड़े पालन, अकादमिक गुणवत्ता में उनसे कुछ नहीं सीखते। जिस बात के लिए फई को अमेरिका ने पकड़ा, ठीक वही काम करने वालों को यहां पुरस्कारों, राष्ट्रीय आयोगों, नीति-निर्मात्री पदों पर ऊंची कुर्सियां देकर पुरस्कृत किया जाता है। यह हमारी आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ा मामला है, जिसकी अनदेखी नहीं होनी चाहिए। इस बिंदु पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सही मुद्दा उठेगा। हमें इस स्वतंत्रता का पूरा सम्मान करते हुए आंतरिक सुरक्षा से समझौता न करने और शिक्षा को देशद्रोही मतवादों से मुक्त रखने की बुद्धि होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों को पूरी अकादमिक स्वतंत्रता होनी ही चाहिए। मगर राजनीतिक एक्टिविज्म को अकादमिक गतिविधि से अलग करके देखना जरूरी है। राजनीतिबाजी छात्रों के मुख्य कार्य को नि:संदेह बाधित करती है। अत: जिन छात्रों, प्रोफेसरों को राजनीतिक गतिविधियां चलानी हों वे विश्वविद्यालय परिसर से बाहर करें। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह अर्थ कहीं नहीं होता कि किसी संस्थान के असली कार्य को विकृत किया या बंधक बनाया जाए।

सरकारी विश्वविद्यालयों, अकादमिक संस्थाओं के संसाधनों, सुविधाओं के बल पर राजनीतिक एक्टिविज्म चलाना रोकना होगा। इसके साथ ही राजनीति-प्रेरित बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय नीति-निर्मात्री क्रिया-कलापों से दूर रखा जाना चाहिए। उन्हें देश-विरोधी बातें भी खुलकर कहने की आजादी रहे, किंतु वैसे ही लोगों को सरकारी सलाहकार बना लेना, पुरस्कार देना, आदि तो जरूरी नहीं। अत: तमाम सरकारी दस्तावेजों, अनुशंसात्मक कार्यक्रमों आदि की समीक्षा होनी चाहिए कि उसमें देश-विरोधी, विखंडनकारी, सामुदायिक विद्वेष, विरोध उकसाने जैसी चीजें कितनी हैं। जैसा फई प्रसंग ने दिखाया था, हर तरह की भारत-विरोधी गतिविधियां मानवाधिकार, बहुसंस्कृतिवाद, शांति-शिक्षा आदि छलपूर्ण आवरणों में ही चलती हैं। इनकी पहचान कर राष्ट्रीय दस्तावेजों, शैक्षिक योजनाओं आदि से इन्हें हटाया जाना किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित नहीं करेगा, लेकिन यह सरकार का कर्तव्य है कि राष्ट्रीय दस्तावेजों को वस्तुत: राष्ट्रीय बनाए। उन्हें संकीर्ण मतवादों, पार्टीबंदी, घातक प्रचार आदि से मुक्त करे।

[लेखक एस. शंकर स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

मोबाइल पर भी अपनी पसंदीदा खबरें और मैच के Live स्कोर पाने के लिए जाएं m.jagran.com पर
Web Title:Ideological side of safety(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

कमेंट करें

यह भी देखें