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इंटरनेट सुरक्षा का कठिन सवाल

Publish Date:Fri, 28 Jul 2017 03:50 AM (IST) | Updated Date:Fri, 28 Jul 2017 03:55 AM (IST)
इंटरनेट सुरक्षा का कठिन सवालइंटरनेट सुरक्षा का कठिन सवाल
उच्चतम न्यायालय के पुराने फैसले आज के दौर में बहुत प्रासंगिक नहीं हैं।

विराग गुप्ता

पिछले कुछ दिनों से उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ में निजता, डाटा और बच्चों की सुरक्षा समेत अनेक मामलों पर लंबी बहस चल रही है। निजता के बारे में छह दशक पहले एमपी शर्मा और खड़क सिंह मामलों में उच्चतम न्यायालय के दो पुराने फैसलों पर बहस उपलब्ध है, लेकिन उनका संबंध तो सरकार की निगरानी और छापे मारने के अधिकार से था जिन पर अब कोई सवालिया निशान है ही नहीं। 1950 में इंटरनेट और कंप्यूटर डाटा के बारे में संविधान या अन्य कानूनों में प्रावधान ही नहीं था। इस वजह से उच्चतम न्यायालय के पुराने फैसले आज के दौर में बहुत प्रासंगिक नहीं हैं। संविधान पीठ में जज चंद्रचूड़ ने सही सवाल उठाया कि जब एप्प द्वारा निजी जानकारी हासिल करने पर कोई आपत्ति नहीं है तो फिर आधार पर सरकार के अधिकार और डाटा के कथित दुरुपयोग पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं? इंटरनेट कंपनियों की गैर-कानूनी चौधराहट रोकने के बजाय निजी संवेदनशील डाटा पर सरकार को असीमित अधिकार देने का तर्क कैसे दिया जा सकता है? यूआइडी के पूर्व चेयरमैन और आधार के प्रणेता नंदन नीलेकणी ने भी अब डाटा पर जनता के अधिकार की मांग की है, लेकिन आधार अधिनियम का कानून बनाते समय अगर उन्होंने स्पष्ट अनुशंसा की होती तो आज शायद इतना विवाद नहीं पैदा होता। सरकार के मंत्रालयों में इस मामले में सहमति नहीं दिखती। आधार मामले में निजता के अधिकार पर सवाल खड़े करने वाली सरकार वाट्सएप्प मामले में हलफनामा दायर करके डाटा के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार मान लेती है।
भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी कानून में निजता, सरकारी डाटा और निजी डाटा की सुरक्षा और व्यावसायिक इस्तेमाल रोकने के लिए संसद ने पर्याप्त कानूनी प्रावधान बनाए हैं। एप्पल, गूगल, फेसबुक, ट्विटर एवं वाट्सएप्प जैसी कंपनियां व्यापार के माध्यम से बड़े पैमाने पर लाभ कमा रही हैं, परंतु भारत में इन कंपनियों के दफ्तर नहीं होने से उन पर भारत के कानून लागू नहीं होते। कुछ माह पहले भी उच्चतम न्यायालय ने लंबी सुनवाई के बाद माना था कि संता-बंता के आपत्तिजनक चुटकुलों को इंटरनेट पर प्रसारित होने से रोकने के लिए आदेश कैसे दिया जा सकता है? उच्चतम न्यायालय द्वारा इसके पहले लिंग जांच संबंधी विज्ञापन रोकने के लिए इंटरनेट कंपनियों को आदेश दिए गए थे जिनका अभी तक पूरी तरह से पालन कराने में सरकार विफल रही है। इंटरनेट कंपनियों पर भारत के कानून कैसे लागू हों, इस पर बहस करने के बजाय उच्चतम न्यायालय में निजता के मौलिक अधिकार पर अकादमिक बहस से समस्या कैसे सुलझेगी?
भारत में पोर्नोग्राफिक कंटेंट का निर्माण या प्रसारण गैर-कानूनी है। इसके लिए पांच साल की सजा और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है। आइटी एक्ट और 2011 में बनाए गए नियमों के अनुसार पोर्नोग्राफिक कंटेंट और अश्लील वेब साइट्स को रोकने के लिए इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स या इंटरमीडियरी की कानूनी जवाबदेही है। पोर्नोग्राफी मामले में पिछले चार वर्षों से उच्चतम न्यायालय में सुनवाई चल रही है, जहां सरकार ने बताया कि पिछले महीने पोर्नोग्राफी की 3500 वेब साइट्स को ब्लॉक किया गया। पोर्नोग्राफी के अरबों डॉलर के विश्व बाजार में भारत की पांचवीं रैंक है। शायद इसीलिए ब्लॉक की गई तमाम वेब साइट्स नए नाम से फिर बाजार में आ जाती हैं। आइएसपी से कानून का पालन कराके पोर्नोग्राफी पर रोक लगाने में विफल सरकार ने स्कूलों में जैमर लगाने का बात कही है। क्या देश भर के स्कूलों में जैमर लगाने के लिए सरकार के पास संसाधन हैं? सवाल यह भी है कि क्या बच्चों को मोबाइल या फिर घर के कंप्यूटर पर पोर्नोग्राफी देखने से रोका जा सकता है? नॉर्टन की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारत में सार्वजनिक स्थानों पर इंटरनेट की फ्री वाई-फाई सुविधा का हर तीसरे व्यक्ति द्वारा नग्नता देखने के लिए इस्तेमाल होता है। सरकारी दफ्तर, स्कूल-कॉलेजों और अन्य सार्वजनिक स्थानों के कंप्यूटर और वाई-फाई में पोर्नोग्राफिक वेब साइट्स को यदि ब्लॉक कर दिया जाए तो स्कूल और बसों में जैमर लगाने की जरूरत ही क्यों पड़ेगी? अधकचरे प्रतिबंधों से पुलिसिया भ्रष्टाचार के साथ सीसीटीवी और जैमर इत्यादि का कारोबार बढ़ जाता है। बतौर उदाहरण सब जानते हैं कि दिल्ली में 25 साल से कम उम्र के युवा शराब नहीं पी सकते, पर कम्युनिटी अगेंस्ट ड्रंकेन ड्राइविंग द्वारा कराए गए हाल के एक सर्वे के अनुसार पब में जाने वाले 80 फीसद से अधिक युवा 25 साल से कम उम्र के होते हैं।
भारत में कांट्रैक्ट एक्ट के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा किए गए अनुबंध या एग्रीमेंट्स गैर-कानूनी हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय में गोविंदाचार्य मामले में सरकार द्वारा दिए गए हलफनामे के अनुसार 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया ज्वाइन नहीं कर सकते और 13 से 18 उम्र के बच्चे माता-पिता के संरक्षण में ही सोशल मीडिया का हिस्सा बन सकते हैं। सोशल मीडिया कंपनियां अपना कारोबार बढ़ाने के लिए गलत जन्म तारीख के माध्यम से बच्चों को फर्जी एकाउंट बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। बीबीसी और टीसीएस द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार 10 से 12 वर्ष की आयु के तीन चौथाई बच्चे और 13 से 18 वर्ष की आयु के 96 फीसद बच्चे सोशल मीडिया से जुड़ गए हैं। सोशल मीडिया से यौन पिपासु अपराधियों द्वारा बच्चों का पोर्नोग्राफी, ड्रग्स एवं रेव पार्टियों के लिए इस्तेमाल के साथ पोर्नोग्राफी से दुष्कर्म और टीन पे्रग्नेंसी के मामलों में खासी बढ़ोतरी हो रही है। आखिर पोर्नोग्र्राफी के बाजार से बड़ा मुनाफा कमाने वाली इंटरनेट कंपनियों की कारस्तानी का खामियाजा देश और समाज क्यों भुगते? कानून के सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार जो करे सो भरे। टेलीकॉम कंपनियों की 30 से 70 फीसद तक की आमदनी पोर्नोग्राफी डाटा की बिक्री से होती है। देश में सभी बड़े व्यापारी अब जीएसटी का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए विवश हैं। यदि इंटरनेट कंपनियां और भारत में व्यापार कर रहीं सभी वेब साइट्स के लिए जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता का नियम लागू हो जाए तो पोर्नोग्राफी के गैर-कानूनी कारोबार की कमर ही टूट जाएगी। उच्चतम न्यायालय के अजब आदेशों से तो कानून और संविधान का माखौल ही बनता रहेगा।
[ लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं ]

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Web Title:Hard question of Internet Security(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

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