PreviousNext

दादरी और सुरक्षा का सबक

Publish Date:Fri, 16 Oct 2015 12:32 AM (IST) | Updated Date:Fri, 16 Oct 2015 01:10 AM (IST)
दादरी और सुरक्षा का सबक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आखिरकार दादरी की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे 'वाकई दुखद' बताया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी कहा है कि कथित रूप से गोमांस खाने-रखने के आरोप में

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आखिरकार दादरी की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे 'वाकई दुखद' बताया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी कहा है कि कथित रूप से गोमांस खाने-रखने के आरोप में दादरी में एक मुस्लिम व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या गलत है और इसके जिम्मेदार लोगों को सजा देने की जरूरत है। दोनों ही नेताओं ने इस मामले से केंद्र सरकार और भाजपा का लेना-देना होने से इंकार किया। दादरी के मामले में एक राष्ट्रीय बेचैनी है और सत्ताधारी दल होने के नाते भाजपा पूरे देश में फैल रहे असहिष्णुता के जहर से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती।

दादरी की घटना बिहार चुनाव के लिए भी एक मुद्दा है। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा के एक गांव में हिंदुओं की एक उत्तेजित भीड़ ने इखलाक की हत्या की। गोमांस खाना अपराध नहीं है। इखलाक का परिवार भीड़ वाली सबसे निंदनीय हिेंसा का शिकार बना। यह चिंताजनक है कि इस मामले से यह संकेत मिला कि सरकार ने हर नागरिक फिर वह चाहे किसी भी धर्म या जाति का हो, की सुरक्षा के अपने उत्तरदायित्व का पालन नहीं किया। राजनीतिक वर्ग हिचकिचाता रहा और साफ-साफ तरीके से हत्या की निंदा करने की जगह राज्य व्यवस्था की प्रतिक्रिया टालने और दबाने वाले अंदाज में थी ताकि महत्वपूर्ण बिहार चुनाव से ठीक पहले बहुमर्त ंहदू मानसिकता को प्रकट रूप से चोट न पहुंचाई जाए। यह राजनीतिक अवसरवाद का सबसे स्वार्थी तरीका है-शरारती तरीके से धार्मिक पहचान का उपयोग करना और उसे मथते रहना।

यह एक ऐसी कमजोरी है जो भारत की गिरती राजनीतिक संस्कृति में गहरे तरीके से घुलमिल गई है। दादरी की घटना गांधी जयंती से पहले हुई और इससे भारत की छवि धूमिल हुई। इससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा काफी समय तक खोखला नजर आता रहेगा। सरकार संवैधानिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने में विफल रही। वैसे तो यह नैतिक और सैद्धांतिक अपराध है, लेकिन इस बात से अलग दादरी हत्या का थोड़ा ज्यादा गहरा राष्ट्रीय सुरक्षा आयाम है जिसकी निष्पक्ष समीक्षा जरूरी है। अगस्त, 1947 में आजादी मिलने के बाद आज भारत की आंतरिक सुरक्षा पर पिछले सात दशकों से थोड़े भिन्न तरीके का खतरा है। भारत में आंतरिक सामाजिक-राजनीतिक मतभेद और कलह का फायदा उठाने और इसके जरिये आंतरिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने की कोशिश करने वाली बाहरी ताकतें कई रूपों से आघात करती रही हैं। इनमें आजादी के बाद शुरुआती दशकों में प्रमुख भूमिका निभाने वाला चीन प्रमुख है। चीन ने आतंकी संगठनों का समर्थन किया। हाल के कुछ वर्षों से वह भारत के खिलाफ धार्मिक कट्टरपंथ और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी कृत्यों को कुटिल समर्थन दे रहा है। पाकिस्तानी रणनीति की उग्रता पिछले 25 साल के दौरान घरेलू, क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रम की वजह से बढ़ती रही है। इनमें कई घटनाएं शामिल हैं। 1981 के दशक में अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा मुजाहिदीन-जिहादी संस्कृति का पोषण, 1991 के दशक में भारत में विभाजित करने वाली सांप्रदायिक राजनीति, जिसकी परिणति अयोध्या ढांचा गिराए जाने के रूप में हुई, सितंबर 2001 में 9/11 की घटना और आतंक के खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व वाले वैश्विक युद्ध से हुआ विनाश इन्हीं घटनाओं की दास्तान सुनाता है।

भारत जिस छद्म युद्ध का सामना कर रहा है उसका स्वरूप जटिल है, जिसमें बाहरी और अंदरूनी तत्व एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक से दूसरे को मदद मिलती है। 9/11 और अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र को अपनी जद में लेने वार्ली ंहसा के बाद से यह दावा किया जाता है और यह सही भी है कि इस्लामी विचार वाले दुनिया भर के युवकों की बड़ी संख्या जिहाद की तरफ जा रही है, लेकिन कोई भारतीय मुसलमान अलकायदा या तालिबान के प्रति सहानुभूति रखने वाले संगठन का हिस्सा नहीं है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में विभिन्न्ता के चलते ऐसी प्रकृति बन गई है जिससे भारतीय मुसलमानों को कट्टरता से दूरी बनाए रखने का सामाजिक-राजनीतिक अवसर मिलता है।

आइएस (इस्लामिक स्टेट) एक नया विचारधारा वाला संगठन है, जो दुनिया भर के युवकों को भ्रमित करने और उन्हें अपने साथ जोडऩे में काफी सक्रिय है। नृशंस हत्या करने का उसका पिछला रिकॉर्ड और दुनिया भर में जिहाद की अपील कुंठित और आसानी से प्रभावित हो जाने वाले युवकों की बड़ी संख्या को अपनी ओर आकर्षित करती है। उसने साइबर स्पेस और सोशल मीडिया का उपयोग अपने संगठन में लोगों को भर्ती करने और अपनी बातों का प्रचार करने में किया है। आइएस में पूरी दुनिया से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं और यह सिलसिला यूरोप और उत्तरी अमेरिका से लेकर एशिया तक चलता रहा है। इस वायरस से भारतीय मुसलमान अब तक अधिकांशत: अप्रभावित ही रहे हैं। वर्तमान भारतीय सामाजिक-राजनीतिक प्रकृति और गहराई से जुड़ी सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों के लचीलेपन की दृष्टि से यह बहुत ही उल्लेखनीय और प्रशंसनीय स्थिति है। लेकिन घृणा फैलानी वाली भीड़ ने इखलाक की जिस तरह हत्या की और राज्य व्यवस्था ने जिस तरह अल्पकालिक चुनावी फायदा उठाने का प्रयास किया वह धीमी गति से होने वाले विनाश के लिए एक खुराक की तरह है। अधिकांश हिंदू समुदाय इस तरह के विद्वेष से अलग रहता है, लेकिन विनाशकारी तरीकों को अगर नहीं रोका गया तो यह उस लचीली सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति में जहर भर देगा जिसने भारतीय समाज की रचना करने वाली अनगिनत विभिन्नताओं में सहमति और सहिष्णुता को संभव बनाया है। अयोध्या ढांचे के विध्वंस और गुजरात दंगों ने भारतीय मुसलमानों को अलग-थलग कर दिया था। यह स्वीकार करना होगा कि इस तरह की घटनाओं से भारत का अंदरूनी सामाजिक लचीलापन कमजोर होता है।

भारत की आंतरिक सुरक्षा और भिन्न-भिन्न पहचान वाले 120 करोड़ से अधिक नागरिकों का मिल-जुलकर रहना घरेलू सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों से संभव हुआ है। इसे दादरी में गंभीर ढंग से चुनौती दी गई है। अगर आइएस और इसके समर्थकों ने भारतीय मुसलमानों को लक्ष्य बनाया और वे उनमें से कुछ लोगों को अपने साथ जोडऩे में कामयाब हो गए तो क्या होगा? आधुनिक तकनीक ने द्वेष फैलाने वाले तरीकों को कई गुना बढ़ा दिया है। बिहार के बाद भी कई चुनाव होंगे और राजनीतिक दलों के लिए वे सभी महत्वपूर्ण होंगे, लेकिन दादरी की सीख यह है कि स्वार्थी और अदूरदर्शी चुनावी लाभ की कोशिश राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को काफी कमजोर कर देगी। यह मुहम्मद इखलाक का परिवार है जो अपनी भारतीय पहचान को अब भी बार-बार बता रहा है और जिसने संविधान में अपनी आस्था प्रकट की है। लखनऊ या दिल्ली में सरकारों को संविधान की भावना को अपनी पूरी ईमानदारी के साथ लागू करना चाहिए।

[लेखक सी. उदयभाष्कर, जाने-माने रक्षा विश्लेषक हैं और इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के निदेशक रह चुके हैं]

मोबाइल पर भी अपनी पसंदीदा खबरें और मैच के Live स्कोर पाने के लिए जाएं m.jagran.com पर
Web Title:Dadri and lesson of safety(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)

कमेंट करें

संस्कृति की मानहानिटकराव वाला फैसला
यह भी देखें