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भेद मिटाने का सबसे बड़ा उत्सव

Publish Date:Mon, 13 Mar 2017 01:22 AM (IST) | Updated Date:Mon, 13 Mar 2017 01:36 AM (IST)
भेद मिटाने का सबसे बड़ा उत्सवभेद मिटाने का सबसे बड़ा उत्सव
होली त्योहार मात्र नहीं है, बल्कि समझ-बूझ के रंगों और एकता के समवेत स्वरों का सबसे बड़ा उत्सव है।

शास्त्री कोसलेंद्र दास

होली त्योहार मात्र नहीं है, बल्कि समझ-बूझ के रंगों और एकता के समवेत स्वरों का सबसे बड़ा उत्सव है। हमारे अमर इतिहास में होली जैसी खासियत किसी अन्य पर्व में नहीं है। फाल्गुन का महीना आते ही देश में होली की ऐसी मनोहारी बयार बहती है जो भेदभावों की जकड़न को तोड़कर मन की आनंद-गंगा को समुद्र से मिला देती है। संस्कृत के रससिद्ध कवियों ने ही नहीं, बल्कि अनेक देशज भाषाओं के भक्त-कवियों ने भी राधा-कृष्ण के रंगों से भरे प्रेम का लोकोत्तर वर्णन किया है। इस प्रेम में होली के ऐसे मनोरम चित्र खींचे हैं कि वे कवि स्वयं राधा का वेष धरकर श्याम रंग में सराबोर हैं। इस रंग की यह खासियत है कि आज भले ही बदलते परिवेश की काली परछाई इन रंगों को बदरंग करने पर तुली हो, लेकिन यह श्याम रंग ऐसा सनातन है कि उसे बिन आंखों वाले सूरदास तक पहचान लेते हैं। वैदिक काल से चले आ रहे चार त्योहारों में होली एक है। सुदीर्घ परंपरा को अपने भीतर समेटे होली ‘आनंद-उत्सव’ है। अल्पज्ञात तथ्य है कि होली ऋषि और कृषि से जुड़ा उत्सव है। होली पर प्राचीन काल के गुरुकुलों में ऋषि ‘सामवेद’ के मंत्रों का गान करते थे। दूसरी ओर फसल पक आने पर कृषक रंग-बिरंगी चटकीली ‘होली’ खेलते थे। परंपरा ने होली का संबंध ‘अग्नि’ से जोड़ा। भला धरती माता के दिए धान्य को ऐसे थोड़े ही खाया जा सकता है? खेतों में पक कर तैयार हुई चने, जौ और गेहूं की बालियों को सर्वप्रथम ‘अग्नि’ को समर्पित किया जाता है। फिर होली की अग्नि ज्वाला में नए अनाज को पकाकर उन पकी हुई बालियों को प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। अब भले इसका स्वरूप बदल गया हो, पर आज भी हर जगह नए अन्न को अग्नि को चढ़ाकर उस सिके हुए अन्न को प्रसाद के रूप में खाया जाता है।
वह होली भी कोई होली है जो आज खेलें और कल ही उतर जाए? होली तो ऐसी खेलनी चाहिए कि अनेक जन्मों की अशांति खत्म होकर सिर्फ आनंद रस ही बरसने लगे। जीवन में होली हो तो फिर ऐसी हो कि श्यामसुंदर का लगाया रंग कभी न छूटे। मीरा की होली ऐसी ही थी। वह अपने गिरधर गोपाल के अलावा किसी ओर से होली खेलना ही नहीं चाहती थीं? होली इतने सतरंगी रंग हमारे जीवन में बिखेरती है कि उन रंगों की खुमारी ताउम्र उतरे ही नहीं। होली के पास ऐसी खनकती सुरीली ढेर सारी रागनियां हैं जिन्हें जिंदगी से जोड़कर हम अपने तन-मन के वृंदावन में उस कन्हैया के साथ प्रेम रंग खेल सकते हैं। जरूरत है बस होली के रंगों में छिपे निहितार्थ को पहचानने की। यदि हम होली और उसके लाल, पीले, हरे और गुलाबी रंगों की वास्तविकता को पहचानने में सफल हो जाएं तो होली केवल आज ही नहीं, बल्कि सदा के लिए हमारे भीतर और बाहर को रंगीन बनाने वाली हो जाएगी। प्रणय और चिरंतन यौवन को बढ़ाती होली से खुद को मिलाकर हम ऐसे शाश्वत वसंत में जी सकते हैं जहां हमेशा रंगों की बहार है। ये ‘रंग’ कुछ और नहीं, बल्कि ‘रस’ है, पर दुखद सत्य है कि अब धरती की रसशक्ति कहीं मर रही है। घर और समाज के भीतर का रसमय स्वभाव धीरे-धीरे बदल रहा है। कभी-कभी तो विश्वचित्त ही विकारग्रस्त लगता है। इस अवस्था का सीधा असर पड़ा है हमारे कला-साहित्य पर। हम सहज, प्राकृतिक, कोमल और शांत को छोड़कर कृत्रिम, अप्राकृतिक, उलझे हुए तथा उग्र को ही महत्वपूर्ण मान रहे हैं। इसे विद्रोह और आधुनिकता कहा जा रहा है। इस नए बोध की हिंसक लालसाएं उग्र, उत्तेजक और असहज की मांग कर रही हैं। ऐसे वातावरण के प्रतिकार में होली की गहरी जरूरत है।
हमारा मन हिंसक हो रहा है। छोटी-छोटी बात पर हिंसा सामान्य बात है। अंधी भोग लिप्सा, सत्ता लालसा और प्रतिशोध भाव से पीड़ित, धर्म और जाति के नाम पर विभाजित हमारे समाज का मन बीमार होता जा रहा है। अब तो ‘किसान’ और ‘नारी’ के बाद हमारी ‘भाषा’ भी छल-छद्म की सर्वाधिक शिकार बन रही है। जैसे मन चाहे बोलो और जो जी में आए लिख डालो। सोशल मीडिया में छाई नई तरह की राजनीति दिन-प्रतिदिन हिंसात्मक धूर्तता का व्यूह रच रही है। आश्चर्य है कि इस कलुषित राजनीति को सिद्धांतवाद का जामा पहना दिया जाता है। इससे हमारे समाज की कोमलता खोकर कुटिल हो रही है। भाषा भावाभिव्यक्ति का साधन है, भाव छिपाने का नहीं, पर इसके माध्यम से मनुष्य की चिंतनशक्ति को भ्रांत करके उसका नियमन और संचालन करना क्या सराहनीय होगा? अन्यथा हमें बौद्धिक प्रदूषण के हालात से निपटने के लिए उन सांस्कृतिक अनुष्ठानों का संकल्प करना होगा जहां सब कुछ सकारात्मक है। यह इच्छाशक्ति उन ऋषियों से आई जिन्होंने कहा कि अच्छे विचार चारों ओर से हम तक आने दो। ऐसी ज्ञान प्रक्रिया में हमारे पुरखों ने होली जैसे रसभरे पर्व को खोजा था। उसके निहितार्थ हमारे संस्कारों में आज तक बसे रहने चाहिए। यही हमारी सफलता होगी।
होली की भावभूमि राग, पूर्वराग, अनुराग और महाराग पर रची है। फाल्गुन आते ही बासंती बयार गांव-गांव और नगर-नगर में घूमने लगती है। ढोलक की थाप मन मोहती है। महाकवि जयदेव के ‘गीत-गोविंद’ में तो यही होली रास-लीला की ऋतु है जिसमें नंदलाला भर-भर पिचकारी रंग गोपियों पर डालते हैं। ये गोपियां मात्र शरीर नहीं, बल्कि आत्मा हैं जो रंग सिर्फ देह को भिगोए वह ब्रज की होली नहीं। ब्रज के रंग में तो आत्मा रंगी जाती है, सिर्फ शरीर नहीं। भला होली हर साल क्यों आती है? यह प्रश्न मन में उठाता है। फिर समझ आता है कि होली हमारे मन की दरिद्रता को मिटाने आती है। इसका प्रभाव हमारी नई पीढ़ी के नैतिक चरित्र और मानवीय प्रकृति पर पड़ता है। वह युवाओं को ‘अधिक उपार्जन’ के बजाय ‘अधिक आनंद’ से जीने का संदेश देती है। होली संतोष और अपरिग्रह के भीतर एक निर्मल सुख पैदा करती है। ऐसा सुख जो नारी को प्रेमिका ही नहीं, मां और पुत्री के रूप में देखकर खिलखिला उठे। यह दूसरे में खुद को देखने का महापर्व है। रंग लगाओ और खुशियां बांटो। आनंद को बांटने और बढ़ाने का अवसर है होली। कोई दूसरा नहीं, बल्कि सबको अपना मानने का मोहक पर्व। हमारी सदा-सुहागन संस्कृति को रंगने वाली होली के रंगों को विधाता ने घृणा, द्वेष और वैमनस्य के अंधेरे को मिटाने के लिए ही तो बनाया है। होली केवल आने-जाने वाला उत्सव नहीं है, यह तो हमारे साहित्य और जीवन में पूरी तरह से रचा-बसा चैतन्य काल है।
[ लेखक जयपुर स्थित राजस्थान संस्कृत विवि में दर्शनशास्त्र के सहायक आचार्य हैं ]

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