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दिल से कहेंगे, दिल से सुनेंगे

Publish Date:Sun, 08 Jul 2012 08:29 PM (IST) | Updated Date:Sun, 08 Jul 2012 08:29 PM (IST)
दिल से कहेंगे, दिल से सुनेंगे

ब्रजेश कुमार, सासाराम : महान विचारक सुकरात ने कहा था, अगर हमारे पास जुबान न होती, तब हम एक-दूसरे से बात करने के लिए हाथ, सिर, शरीर के बाकी अंगों के संचालन से संवाद की कोशिश करते, जैसा कि मूक-बधिर लोग करते हैं। आधुनिक समय में इसे साइन भाषा कहते हैं। लेकिन रोहतास जिले में मूक-बधिरों के लिए दो वर्ष पहले तक इस शैली को सीखने-समझाने की व्यवस्था नहीं थी। परंतु अब उम्मीद की लौ जली है, एक बैंककर्मी के चार मूक-बधिर संतानों ने मूक-बधिर स्कूल की नींव रखी। जहां ये बच्चे 'दिल से कहने व सुनने के' गुर बखूबी सीख रहे हैं।

कैसे पड़ी बुनियाद

स्थानीय एसबीआई के कर्मी रामविलास मंडल की पांच संतानों में चार मूक-बधिर हुए। परंतु इस कमी को दूर करने के लिए उन्होंने अपने बेटों मनोज कुमार, आलोक कुमार, राहुल कुमार व बेटी राजश्री को पटना, दरंभगा, दिल्ली अवस्थित मूक- बधिर विद्यालयों में साइन भाषा की शिक्षा दिलवायी। बच्चों ने स्नातक और कंप्यूटर की शिक्षा प्राप्त की। मनोज तो पढ़ लिखकर दिल्ली में एक निजी कंपनी में नौकरी भी करने लगे। परंतु आलोक ने शहर में मूक बधिर विद्यालय खोलने का निर्णय किया। पिता कहते हैं कि मैंने आलोक का उत्साह बढ़ाया, ताकि जो माता-पिता अपने मूक बधिर बच्चों को बाहर भेजने की स्थिति में नहीं हैं, उन्हें यहां साइन लैंग्वेज की शिक्षा दी जा सके। शहर के महाजन टोली में 2010 में मूक बधिर एंजल (परी) स्कूल खुला जो अब सफलता पूर्वक चल रहा है। यहां नाम मात्र के शुल्क पर दो दर्जन से अधिक बच्चों को आठवें वर्ग तक की पढ़ाई करवायी जा रही है।

जली उम्मीद की लौ

अंजली, हसीना परवीन, अंजु, रौशनी, रितिक, सहरेज जैसे विद्यार्थियों का उत्साह यहां देखते बनता है। अभिभावक भी मानते हैं कि स्कूल में छात्रों में सकारात्मक परिवर्तन हुआ है। शिवसागर से आने वाले छात्र सौरभ प्रताप प्रभाकर (10 वर्ष) के पिता कृष्णा प्रताप प्रभाकर भी स्वीकार करते हैं कि साइन भाषा की पढ़ाई से बेटे को गणित, अंग्रेजी, हिन्दी का बेहतर ज्ञान हुआ है। गुलाम गौस कहते हैं कि उनकी जन्म से गूंगी-बहरी दो बेटियां यहां पढ़ाई कर रही हैं, अब उम्मीद की लौ जली है कि उनके आगे का जीवन बेहतर होगा।

कहते हैं समावेशी शिक्षा समन्वयक

बिहार शिक्षा परियोजना के समावेशी शिक्षा के जिला समन्वयक नवीन कुमार कहते हैं कि उनके यहां भी गूंगे-बहरे बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था है। प्रखंडवार कैंप लगाकर या जिला कार्यालय के संसाधन कक्ष में उन्हें शिक्षा दी जाती है।

कहते हैं चिकित्सक

इएनटी डाक्टर आरएल सिंह कहते है कि जेनेटिक कारणों से या दवा के साइड इफेक्ट से कुछ बच्चे जन्म से बहरे-गूंगे हो जाते है। इन बच्चों के लिए स्पेशल विद्यालय होना बेहद जरूरी है।

क्या है इंडियन साइन लैंग्वेज

किसी देश के गूंगे बहरे लोगों के समूह द्वारा देशज साइन लैंग्वेज का विकास किया जाता है। इस तरह प्रत्येक देश की साइन लैंग्वेज होती है। यह भाषा उनकी संवाद क्षमता के साथ बेहतर ढंग से जीवनयापन के लिए भी जरूरी है। इंडियन साइन लैंग्वेज में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी अल्फाबेट शामिल हैं।

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