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कोसी में मौत की बारिश कर जाती है काली घटा

Publish Date:Saturday,May 12,2012 08:04:25 PM | Updated Date:Saturday,May 12,2012 08:04:37 PM

राजीव कुमार, पूर्णिया

कोसी में काली घटा काल बनकर आती है और आकाश से मौत की बारिश कर जाती है। पिछले पांच वर्षो के दौरान कोसी के जिलों में वज्रपात से 147 लोगों की मौत हुई है। इनमें सबसे अधिक 52 लोगों की मौत पूर्णिया जिले में तथा कटिहार में 24 एवं अररिया में 27 लोगों की मौत का मामला सामने आया है।

मौसम विभाग के अधिकारी वज्रपात की घटनाओं में वृद्धि का कारण प्रभावित इलाकों में नदियों का जाल तथा वहां के वातावरण एवं मिंट्टी में नमी की मात्रा ज्यादा होना मानते हैं। दरअसल, हिमालय की तराई वाले इस इलाके में जब हवा का दवाब कम हो जाता है और तापमान बढ़ जाता है, तब बादल थंडर क्लाउड बन जाता है और आकाश से मौत की बारिश होती है।

सर्वाधिक प्रभावित इलाका : वज्रपात से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में पूर्णिया के बायसी, अमौर एवं रूपौली प्रखंड हैं जबकि अररिया का जोकीहाट व किशनगंज का कोचाधामन प्रखंड भी इससे प्रभावित है। आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पूर्णिया जिले में 2008 में वज्रपात से सात लोगों की मौत हुई। वहीं 2009 में 10 एवं 2010 में 14 तथा 2011 में यह संख्या 22 तक पहुंच गई। 2012 में अब तक छह लोगों की मौत हो चुकी है। कटिहार जिले में 2009 में तीन, 2010 में सात, 2011 में 13 एवं 2012 में अब तक चार लोगों की मौत हो चुकी है। अररिया जिले में 2009 में छह, 2010 में सात एवं 2011 में 10 तथा 2012 में चार लोगों की मौत हो गई है। किशनगंज में 2009 में पांच, 2010 में छह एवं 2011 में नौ तथा 2012 में तीन लोगों की मौत अब तक वज्रपात से हो चुकी है।

मई व जुलाई में अधिक वज्रपात : वज्रपात से जितने लोगों की मौत हुई है उसमें से 95 फीसद लोगों की मौत मई से जुलाई माह के बीच हुए वज्रपात से हुई है। पूर्णिया के मीरगंज के रंगपुरा रमना टोला में 11 मई 2012 को वज्रपात में एक बालक की मौत हो गई। वहीं 24 जून 2011 को अमौर प्रखंड के पोठिया गंगेली में तीन बच्चियों की मौत हो गई। इसी प्रकार 20 जून 2011 को रूपौली प्रखंड के बैरियां गांव में पांच बच्चियों की मौत वज्रपात से हो गई।

40 डिग्री से अधिक तापमान पर वज्रपात : मौसम विभाग के आंकड़े इस बात की भी गवाही दे रहे हैं कि जब-जब पूर्णिया का तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंचा है वज्रपात की घटना जरूर हुई है। 20 जून 2011 को रूपौली में जब वज्रपात की घटना हुई थी, तब तापमान 40.9 डिग्री था। वहीं 24 जून 2011 को तापमान 40.7 डिग्री था। इसी तरह 11 मई 2012 को जब पूर्णिया का तापमान 40 डिग्री पहुंचा तो बायसी एवं अमौर में वज्रपात से चार लोगों की मौत हो गई।

आपदा कोष की राशि में वृद्धि : आपदा प्रबंधन विभाग वज्रपात से होने वाली मौत पर उनके परिजनों को पूर्व में डेढ़ लाख की राशि सरकारी सहायता के तौर पर उपलब्ध कराता था। इसमें पचास हजार की राशि मुख्यमंत्री राहत कोष से एवं एक लाख की राशि आपदा कोष से दी जाती थी। सरकार ने अब आपदा कोष की राशि एक लाख से बढ़ाकर 1.30 लाख कर दी है। अब वज्रपात में मारे गये लोगों के परिजनों को 1.80 लाख की राशि सहायता के तौर पर दी जाएगी।

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''नमी की मात्रा जिन क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है वहां थंडर क्लाउड का ज्यादा निर्माण होता है। यह थंडर क्लाउड आपस में टकराकर मौत की बारिश करते हैं।''

डॉ. आर. पी दास, मौसम वैज्ञानिक

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